शनिवार, 30 जुलाई 2016

सरस्वती - कण्ठाभरण (ग्रन्थ) - राजा भोज परमार | Saraswati Kanthabharan of Gurjar Raja Bhoj Parmar

 सरस्वती - कण्ठाभरण ग्रन्थ : गुर्जर सम्राट भोज परमार 


गुर्जर सम्राट भोज परमार  ( ईस्वी - 1010 ) अपने ग्रन्थ सरस्वती - कण्ठाभरण ग्रन्थ मे  भारत के विभिन्न प्रदेशो मे प्रचलित भाषाओ का उल्लेख करते हे लिखते हे  कि

"" अपभ्रंशेन तुष्यन्ति स्वेन नान्येन गुर्जरा : " 

अर्थात :

गुर्जर अपनी गुर्जरी अपभ्रंश भाषा से ही सन्तुष्ट रहते हे  , वे अन्य भाषा पसन्द नही करते हे ।


गुर्जर सम्राट राजा भोज परमार / Gurjar Samrat Raja Bhoj Parmar

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

महान धनुर्धर प्राचीन हूण गुर्जरो की शासन व्यवस्था का विवरण (ईसापूर्व)

महान धनुर्धर प्राचीन हूण गुर्जरो की शासन व्यवस्था  ( ईसापूर्व )

हूण गुर्जर साम्राज्य । Hun Gurjar | Hoon Gurjar | History | Huna Gurjar 

हूण गुर्जर वीरों की शासन व्यवस्था का विवरण 


1. शान -'यू :

राजा वाची चीनी शब्द शान - यू का हूण भाषा रूप  जैंगी कहा जाता है। शायद इसकी रूपान्तर " चंगीज" हुआ । राजा की पूरी उपाधि थी

" तेंग्री - कुदू - शान - यू " ( दैव पुत्र महान )

आज भी मंगोल ओर तुर्की भाषा मे देवता वाचक ""तेंग्री " शब्द मोजूद है । शान- यू  प्रभावशाली योध्दा ओर नेता होता , लेकिन उसके ऊपर हूण ओर्दू का नियन्त्रण रहता था

2. दूगी :--

इसका अर्थ होता हे धर्मात्मा या न्यासी । शान-यू के नीचे दूगी हुआ करते थे , जिनमे एक को पूर्वी - दूगी ओर दूसरे को पश्चिम - दूगी कहते थे ।

 पूर्वी दूगी का दर्जा ऊॅचा समझा जाता था,  ओर आमतौर से वह युवराज माना जाता था ।
हूण साम्राज्य के पूर्व भाग पर पूर्वी - दूगी का शासन था ओर पश्चिम पर पश्चिमी दूगी का ।

 राज्य के मध्य भाग पर अर्थात हूण - जन क्षैत्र पर स्वयं शान - यू सीधे शासन करता था ।

3. रूक - ले  ( कुनलू ) :----

यह भी दक्षिण ओर उतर दो होते थै , उत्तर का दर्जा ऊॅचा होता था

4 . इनके नीचे उतर ओर दक्षिण के दो सेनापति होते थे
5. इनके नीचे वाम दक्षिण के दो दिवान होते थे । आगे भी दो वाम दक्षिण कुतलू जेसे दस हजारी ओर हजारी तक के चोबीस सेनिक अधिकारी होतै थे । हूण - शासन मे सेनिक- असेनिक अधिकार का भेद नही था  ।

इनके अतिरिक्त हूण - शासको की उपाधि श्रृंगो से समझी जाती थी ,  जो शायद समय - समय पर उनके श्रंगार होते हो  ।

 दोनो दूनी ओर दोनो रूकले चतुःश्रृंग कहे जाते थे ।

उनके नीचे षट -'श्रृंग अधिकारी थे ।
दोनो कुतलू शासन प्रबंध को देखते थे ।

दूगी आदि  24  श्रेष्ठ अधिकारीयो के अपने क्षैत्र थे,  जिनके भीतर ही वह अपने ओर्दू तथा पशुओं को लेकर  विचरण कर सकते थे उनको अपने हजारी,  शतिक ओर दक्षिक आदि अफसरो के नियुक्ति के अधिकार थे ।

शान - यू की रानी की पदवी इन - ची ( येडःची )  थी ।

 हूणो के तीन - चार ऊंचे कुलो मे से उसे  लिया जाता था । शान - यू का अपना कुल भी बहुत सम्मानित समझा जाता था ।
 हूणो की जो श्रैणिया ओर पदवीयां स्थापित की थी ।

वह तुर्को ओर मंगोलो के समय तक मानी जाती रही
हजारी,  पंच हजारी,  दस हजारी दर्जे स्वीकार किये गये थे ।

सन्दर्भ :--
1 . A Thousand Years of  Tatars : E.  H . Parker, Shanghai - 1895
2. हुन्नू इ गुन्नी : क. इनस्त्रान्त्सेफ,  लेनिनग्राद - 1926
3. Histoire des Huns : Desqugue - Paris : 1756

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

रानी का वाव - गुर्जर चालुक्या / सोलंकी वंश | Rani ka Vav - Gurjar Chalukya / Solanki Dynasty

रानी का वाव (पाटन, गुर्जरदेश) - गुर्जर चालुक्य वंश 

रानी उदयमति गुर्जरानी | गुर्जरानी | चालुक्या वंश | सोलंकी वंश | गुर्जरेश्वर भीमदेव चालुक्य |पाटन गुजरात | गुर्र देश | गुर्जरात्रा | गुर्जराष्ट्र | भारत का मध्यकालीन इतिहास | 
Rani ka vav - Gurjar Solanki Dynasty 


 "रानी का वाव" का निर्माण चालुक्य गुर्जर वंश के शासक की स्मृति में उनकी विधवा रानी उदयमति द्वारा निर्मित, यह शानदार चरण में अच्छी तरह से भारत की ऐतिहासिक चमत्कार के लिए कहा जा रहा है।
जमीन के नीचे आप 27 मीटर कदम लेते हैं, हर कदम पहले खंबों मंडप है जहां आप अपनी समृद्ध मूर्तियां प्रशंसा कर सकते हैं। वहाँ भी एक गुप्त सुरंग (अब कीचड़ और पत्थरों से अवरुद्ध) उस के पास के शहर की ओर जाता है

एक सीढ़ी युक्‍त कुआं, रानी की वाव का निर्माण रानी उदयामती द्वारा अपने पति गुर्जरेश्वर भीमदेव चालुक्या की प्‍यार भरी स्‍मृति में 1063 में कराया गया था।  ज्‍यादा तर सीढ़ी युक्‍त कुओं में सरस्वती नदी के जल के कारण कीचड़ भर गया है।

अभी भी वाव के खंभे अभी तक गुर्जर चालुक्या वंश (सोलंकी वंश) और उनके वास्तुकला के चमत्कार के समय में ले जाते हैं। वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। गुर्जर हूण और गुर्जर प्रतिहार की तरह गुर्जर चालुक्या भी वराह उपासक थे। वराह गुर्जरो के राजशाही चिन्ह रहा है। जिसे विष्णु का अवतार कहा जाता है।
हाल ही में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में इसको शामिल किया गया है।

• गुर्जरानी का वाव के अन्य चित्र :

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty 

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

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Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty


Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

गुरुवार, 30 जून 2016

महाबली जोगराज सिंह गुर्जर | Mahabali Jograj Singh Gurjar - Bloody War of 1398 aginst Timur E Lung

महाबली जोगराज सिंह गुर्जर और तैमूर लंग का युद्ध - 1398 का खूनी संग्राम

जोगराज सिंह गुर्जर | महाबली दादावीर | तैमुर लंग | तैमूर लंग से युद्ध | रामप्यारी गुर्जरी | हरबीर सिंह गुलिया | 1398 का युद्ध । Jograj Singh Gurjar Vs Timur Lung | Taimur Langda | Rampyari Gurjari | Harbir Singh Gulia | War of 1398 |
Mahabali Veer Gurjar - Jograj Singh Panwar (Khubbad clan of Parmar Dynasty )


उत्तर भारत का भीम, दादावीर महाबली जोगराज सिंह गुर्जर पंवार (खुब्बड)
• कद :    7 फुट 9 इंच
• वजन : 320 किलो (64 धड़ी अर्थात 8 मण)
• पिता :  मानसिंह पंवार गुर्जर
• जन्म  : 1375, गाँव कुंजा सुन्हटी, [[हरिद्वार]] 
 • मृत्यू  : ऋषिकेश
• उत्तराधिकारी : लंढोरा, राज्य गुर्जरगढ (आाघुनिक नाम सहारनपुर)

'''सर्वखाप सेना के प्रधान सेनापति महाबली दादावीर जोगराज पंवार जी महाराज'''

परिचय 

हरियाणा के प्रसिद्ध इतिहासकार स्वामी ओमानन्द जी के एक आलेख में तैमूर के युद्ध का वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है वीर गुर्जर जाति में पीछे भी अनेक वीर हुए हैं जिनमें जोगराज गुर्जर जिला सहारनपुर बहुत ही प्रसिद्ध हुआ है। वह हरियाणें की सर्वखाप पंचायत का मुख्य सेनापति था। वह बड़ा बलवान और वीर था। उसका शरीर अत्यंत सुन्दर और सुदृढ़ था। उसमें 64 धड़ी (320 किलो) अर्थात 8 मण पक्का भार था। इसने '''ज्वालापुर''' के निकट पथरी रणक्षेत्र में  'तैमूरलंग' से भयंकर युद्ध किया था। 


जोगराज खूबड़ परमार वंश' गुर्जर जाति के यौद्धेय थे| इन्होने दादा मानसिंह के यहां सन 1375 ईस्वी में हरिद्वार के पास गाँव कुंजा सुन्हटी में अवतार लिया था| बाद में यह गाँव मुगलों ने उजाड़ दिया तो वीर जोगराज सिंह के वंशज उस गांव से चल लंढोरा (जिला सहारनपुर) में आकर आबाद हो गये, जहां कालांतर में लंढोरा गुर्जर राज्य की स्थापना हुई। ये अपने समय के उत्तर भारत के भीम कहे जाते थे, इनका कद 7 फुट 9 इंच और वजन 8 मन (320 किलो) था। ये विख्यात पहलवान थेइनकी दैनिक खुराक 4 सेर अन्न, सब्बी-फल, 1 सेर गऊ का घी और 20 सेर गऊ का दूध था । 

खापसेना की महिला-विंग की 5 सेनापति :

• दादीराणी रामप्यारी गुर्जरी
• दादीराणी हरदेई जाट
• दादीराणी देवीकौर
• दादीराणी चन्द्रो ब्राह्मण 
• दादीराणी रामदेई त्यागी

इन सब ने देशरक्षा के लिए शत्रु से लड़कर प्राण देने की प्रतिज्ञा की।

जोगराज के नेतृत्व में बनी 40000 हजार ग्रामीण महिलाओं को युद्ध विद्या का प्रशिक्षण व् निरीक्षण जा जिम्मा रामप्यारी चौहान गुर्जरी व् इनकी चार सहकर्मियों को मिला था। इन 40000 महिलाओं में गुर्जर, जाट, अहीर, हरिजन, वाल्मीकि, त्यागी, तथा अन्य वीर जातियों की वीरांगनाएं थी। इस महिला सेना का गठन इन पांचों ने मिलकर ठीक उसी ढंग से किया था जिस ढंग से सेना का था। प्रत्येक गांव के युवक-युवतियां अपने नेता के संरक्षण में प्रतिदिन शाम को गांव के अखाड़े पर एकत्र हो जाया करते थे और व्यायाम, मल्ल विद्या तथा युद्ध विद्या का अभ्यास किया करते थे। गांव के पश्चात खाप की सेना विशेष पर्वों व आयोजन पर अपने कौशल सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित किया करती थी। सर्व खाप पंचायत के सैनिक प्रदर्शन यदा-कदा अथवा वार्षिक विशेष संकट काल में होते रहते थे| लेकिन संकट का सामना करने को सदैव तैयार रहते थे। इसी प्रकार रामप्यारी गुर्जरी व् अन्य चारों महिला सेनापतियों की महिला सेना पुरूषों की भांति सदैव तैयार रहती थी। 
ये महिलाएं पुरूषों के साथ तैमूर के साथ युद्ध में कन्धे से कन्धा मिला कर लड़ी। महिला सेनापतियों खासकर दादीराणी रामप्यारी गुर्जरी के रण-कौशल को देखकर तैमूर दांतों के नीचे अंगुली दबा गया था। उसने अपने जीवन में ऐसी कोमल अंगों वाली, बारीक आवाज वाली बीस वर्ष की महिला को इस प्रकार 40 हजार औरतों की सेना का मार्गदर्शन करते हुए ना कभी नहीं देखा था और ना सुना था। तैमूर इनकी वीरता देखकर वह घबरा उठा था। 

सेनापतियों व उप सेनापतियों का निर्वाचन 

प्रधान व् उप-प्रधान सेनापतियों के नीचे पांच सेनापति चुने गए 

* सेनापतियों का निर्वाचन :
• गजेसिंह जाट गठवाला
• तुहीराम गुर्जर
• मेदा रवा 
• सरजू ब्राह्मण 
• उमरा तगा (त्यागी)
•दुर्जनपाल अहीर

उपसेनापतियों का निर्वाचन 

• मामचन्द गुर्जर (जोगराज सिंह का बांया हाथ)
• धारी गडरिया (धाड़ी) 
• भौन्दू सैनी 
• हुल्ला नाई 
• भाना जुलाहा (हरिजन)
• अमनसिंह पुंडीर गुर्जर 
• नत्थू पार्डर गुर्जर 
• दुल्ला (धाड़ी) 
• कुन्दन जाट

सहायक सेनापति: भिन्न-भिन्न जातियों के 20 सहायक सेनापति चुने गये 
वीर कवि: प्रचण्ड विद्वान् चन्द्रदत्त भट्ट (भाट) को वीर कवि नियुक्त किया गया जिसने तैमूर के साथ युद्धों की घटनाओं का आंखों देखा इतिहास लिखा था। 

जोगराजसिंह गुर्जर के ओजस्वी भाषण 

प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर के ओजस्वी भाषण के कुछ अंश: “वीरो! भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को जो उपदेश दिया था उस पर अमल करो। हमारे लिए स्वर्ग (मोक्ष) का द्वार खुला है। ऋषि मुनि योग साधना से जो मोक्ष पद प्राप्त करते हैं, उसी पद को वीर यौद्धेय रणभूमि में बलिदान देकर प्राप्त कर लेता है। भारत माता की रक्षा हेतु तैयार हो जाओ। देश को बचाओ अथवा बलिदान हो जाओ, संसार तुम्हारा यशोगान करेगा। आपने मुझे नेता चुना है, प्राण रहते-रहते पग पीछे नहीं हटाऊंगा। पंचायत को प्रणाम करता हूँ तथा प्रतिज्ञा करता हूँ कि अन्तिम श्वास तक भारत भूमि की रक्षा करूंगा। हमारा देश तैमूर के आक्रमणों तथा अत्याचारों से तिलमिला उठा है। वीरो! उठो, अब देर मत करो। शत्रु सेना से युद्ध करके देश से बाहर निकाल दो।”

“मैंने अपनी सारी आयु में अनेक धाड़े मारे हैं। आपके सम्मान देने से मेरा खून उबल उठा है। मैं वीरों के सम्मुख प्रण करता हूं कि देश की रक्षा के लिए अपना खून बहा दूंगा तथा सर्वखाप के पवित्र झण्डे को नीचे नहीं होने दूंगा। मैंने अनेक युद्धों में भाग लिया है तथा इस युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दे दूंगा।” यह कहकर उसने अपनी जांघ से खून निकालकर खून के छींटे दिये। और म्यान से बाहर अपनी तलवार निकालकर कहा “यह शत्रु का खून पीयेगी और म्यान में नहीं जायेगी।” इस वीर यौद्धेय धूला के भाषण से पंचायती सेना दल में जोश एवं साहस की लहर दौड़ गई और सबने जोर-जोर से मातृभूमि के नारे लगाये। "
यह भाषण सुनकर वीरता की लहर दौड़ गई। 80,000 वीरों तथा 40,000 वीरांगनाओं ने अपनी तलवारों कोचूमकर प्रण किया कि हे सेनापति हम प्राण रहते-रहते आपकी आज्ञाओं का पालन करके देश रक्षा हेतु बलिदान हो जायेंगे।


 सूरत-ए-मैदान-ए-जंग 

पंजाब को उजाड़ कर और दिल्ली को तबाह करके अब तैमूर लंग ने अपनी टिडडी दल की तरह चलने वाली फौज का मुंह जाट-गुर्जर बाहुल्य क्षेत्र मेरठ-हरिद्वार की तरफ कर दिया। यहां महाबली जोगराजसिंह पंवार गुर्जर के नेतृत्व में सेना इस राक्षस के मान मर्दन के लिए पहले से ही विधिवत तैयार हो चुकी थी। 

मेरठ युद्ध 

तैमूर ने अपनी बड़ी संख्यक एवं शक्तिशाली सेना, जिसके पास आधुनिक शस्त्र थे, इस क्षेत्र में तैमूरी सेना को सेना ने दम नहीं लेने दिया। दिन भर युद्ध होते रहते थे। रात्रि को जहां तैमूरी सेना ठहरती थी वहीं पर सेना गुरिल्ला धावा बोलकर उनको उखाड़ देती थी। वीर देवियां अपने सैनिकों को खाद्य सामग्री एवं युद्ध सामग्री बड़े उत्साह से स्थान-स्थान पर पहुंचाती थीं। शत्रु की रसद को ये वीरांगनाएं छापा मारकर लूटतीं थीं। आपसी मिलाप रखवाने तथा सूचना पहुंचाने के लिए 500 घुड़सवार अपने कर्त्तव्य का पालन करते थे। इस प्रकार गुरिल्ला मार, रसद पर हमलों व् रसद न पहुंचने से तैमूरी सेना भूखी मरने लगी। इससे तंग आकर व् दरकिनार करने की कोशिश करते हुए तैमूर यहां से हरिद्वार की ओर बढ़ा।

हरिद्वार युद्ध 

मेरठ से आगे मुजफ्फरनगर तथा सहारनपुर तक पंचायती सेनाओं ने तैमूरी सेना से भयंकर युद्ध किए तथा इस क्षेत्र में तैमूरी सेना के पांव न जमने दिये। प्रधान एवं उपप्रधान और प्रत्येक सेनापति अपनी सेना का सुचारू रूप से संचालन करते रहे। एक तरफ भारत माता की रक्षा करने वाले धर्मयुद्ध करने वाले, आत्म रक्षा के लिए लड़ने वाले रणबांकुरे यौद्धेय और वीरांगनाओं की सेना जो अपने प्रधान सेनापति के नेतृत्व में तैयार थी और दूसरी तरफ राक्षस रूपी तैमूर की खूनी और इंसानियत का सर्वनाश करने वाली लुटेरों की भीड़ रूपी सेना थी। उस से दो-दो हाथ करने को, भूखे भेडिए की तरह भयंकर रौद्र रूप धारण किए हुए थी जोगराज की वीर सेना।  बहादुर धर्म रक्षक सेना राक्षस तैमूर का मानमर्दन करने के लिए प्रतीक्षा कर रही थी। दोनों ओर से रण की धोषणा की प्रतीक्षा किए बिना घोर घमासान युद्ध तैमूर ने ही शुरू कर दिया। बस फिर क्या था। किसी विश्वमहायुद्ध सा विशाल व् भंयकर दृश्य पथरी रणक्षेत्र में प्रगट हो गया। कई दिन घोर घामासान युद्ध हुआ। 
हरिद्वार से 5 कोस दक्षिण में तुगलुकपुर-पथरीगढ़ (ज्वालापुर) में पंचायती सेना ने तैमूरी सेना के साथ तीन घमासान युद्ध किए:

सेना के 25,000 वीर यौद्धेय सैनिकों के साथ तैमूर के घुड़सवारों के बड़े दल पर भयंकर धावा बोल दिया जहां पर तीरों तथा भालों से घमासान युद्ध हुआ। इसी घुड़सवार सेना में तैमूर भी था। हरबीरसिंह ने आगे बढ़कर शेर की तरह दहाड़ कर तैमूर की छाती में भाला मारा जिससे वह घोड़े से नीचे गिरने ही वाला था कि उसके एक सरदार खिज़र ने उसे सम्भालकर घोड़े से अलग कर लिया। 
उसी समय प्रधान सेनापति जोगराज सिंह ने अपने 22000 मल्ल यौद्धेयओं के साथ शत्रु की सेना पर धावा बोलकर उनके 5000 घुड़सवारों को काट डाला। जोगराजसिंह ने स्वयं अपने हाथों से अचेत हरबीरसिंह को उठाकर यथास्थान पहुंचाया। परन्तु कुछ घण्टे बाद यह वीर यौद्धेय वीरगति को प्राप्त हो गया। जोगराजसिंह को इस यौद्धेय की वीरगति से बड़ा धक्का लगा।

युद्ध के कई मोर्चों पर वीरता से आगे बढ़ते हुए एक जगह हरिद्वार के जंगलों में तैमूरी सेना के 2805 सैनिकों के रक्षादल पर उपप्रधान सेनापति धूला धाड़ी वीर यौद्धेय ने 190 अति-बहादुर सैनिकों के साथ धावा बोल दिया। शत्रु के काफी सैनिकों को मारकर ये सभी 190 सैनिक एवं धूला धाड़ी अपने देश की रक्षा हेतु वीरगति को प्राप्त हो गये। 

तीसरे युद्ध में प्रधान सेनापति जोगराजसिंह ने अपने वीर यौद्धेयओं के साथ तैमूरी सेना पर भयंकर धावा करके उसे अम्बाला की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। तथापि जोगराज सिंह स्वयं भी बुरी तरह जख्मी हो चूका था, परन्तु 45 संगीन घाव लगने पर भी अन्त तक होश में रह कर सेना का भली भांति संचालन करता रहा और वह वीर होश में रहा। पंचायती सेना के वीर सैनिकों ने तैमूर एवं उसके सैनिकों को हरिद्वार के पवित्र गंगा घाट (हर की पौड़ी) तक नहीं जाने दिया। तैमूर हरिद्वार से पहाड़ी क्षेत्र के रास्ते अम्बाला की ओर भागा। उस भागती हुई तैमूरी सेना का वीर सैनिकों ने अम्बाला तक पीछा करके उसे अपने देश हरयाणा से बाहर खदेड़ दिया तथा समस्त हरियाणा व हरिद्वार तक के क्षेत्रों को सर्वनाश से बचा लिया।

वीरगति को प्राप्ति 


वीर सेनापति दुर्जनपाल अहीर मेरठ युद्ध में अपने 200 वीर सैनिकों के साथ दिल्ली दरवाज़े के निकट स्वर्ग लोक को प्राप्त हुये। 
जोगराज की मृत्यु कालांतर में रहस्य बनी रही, परन्तु एक लोकमत कहता है कि वीर यौद्धेय प्रधान सेनापति जोगराजसिंह गुर्जर युद्ध के पश्चात् ऋषिकेश के जंगल में स्वर्गवासी हुये थे।

वीर यौद्धेय हरबीरसिंह गुलिया पर शत्रु के 60 भाले तथा तलवारें एकदम टूट पड़ीं जिनकी मार से यह यौद्धेय अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा।

इस युद्ध में केवल 5 सेनापति बचे थे तथा अन्य सब देशरक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुये। 

इन युद्धों में तैमूर के ढ़ाई लाख सैनिकों में से हमारे वीर यौद्धेयओं ने 1,60,000 को मौत के घाट उतार दिया था और तैमूर की आशाओं पर पानी फेर दिया। 

जोगराज सेना के 35000 वीर एवं वीरांगनाएं देश के लिये वीरगति को प्राप्त हुए थे। 

इस युद्ध के बाद वीर जोगराज सिंह का क्या बना यह इतिहास के अन्धकारमय भू-गर्भ में छिपा पड़ा है। परन्तु आगे चल कर जोगराज सिंह के वंशजों ने लंढोरा जिला सहारनपुर में गुर्जर रियासत की स्थापना की जिसका विस्तार सहारनपुर से करनाल तक हुआ| 19वी सदी तक सहारनपुर को गुर्जरगढ कहा जाता था। हरिद्वार की पौड़ी तले होने की वजह से गुर्जर रियासत के वंशज हरिद्वारी राजा भी कहलाते थे।


संदर्भ 

Mangal Sen Jindal (1992): "History of Origin of Some Clans in India" Page-48

Cothburn O'Neal. Conquest of Tamerlane.(Avon, 1952. ASIN: B000PM1IG8),29
articles of famous Historian of Haryana |last= Omanand |first=Swami

सोमवार, 27 जून 2016

Gurjar Samrat Mihir Bhoj Wallpapers in HD

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बुधवार, 15 जून 2016

सफलता की कुंजी - गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

सफलता की कुंजी - गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

Gurjar Samrat Mihir Bhoj Wallpaper HD

गुर्जर सम्राट मिहीर भोज बहुत पराक्रमी राजा थे, हर युद्ध मे विजय होते थे उनकी बुद्धिमानी के दूर दूर तक चर्चे थे , एक बार उनके दरबार मे एक अरब यात्री सुलेमान आया और राजा से उनकी सफलता का राज पूछा
सुलेमान ने पुछा हे राजन गुर्जेशवर सम्राट आप हमे बतायें कैसे हर काम मे सफल हुआ जा सकता है,कैसे आपने इतने राज्य जीत लिये,सफलता का राज क्या है?

सम्राट भोज ने उनसे कहा आप आज हमारे महल मे आराम किजिये सुबह होने पर आपको सफलता की कुंजी दे दी जायेगी

सुबह होने पर राजमहल के सामने सम्राट ने तीन मिट्टी के ढेर लगवाये और उन्मे तीन चाबिंया(कुंजी) छुपा दी सुलेमान से कहा इस ढेर मे तीन चाबियां छुपी है उन तीनो मे से एक सफलता की कुंजी है आप जायें और ढुंढ ले।

सुलेमान पहले ढेर मे देखने लगा उसे तुरन्त कुंजी मिल गयी वो बहुत खुश हुअा, फिर दुसरे ढेर मे ढुंढने लगा लेकिन बहुत समय लग रहा था कुछ घंटे बाद उसको दुसरी कुंजी भी मिल गयी लेकिन वो थकावट महसूस कर रहा था।

अब बारी तिसरी और अंतिम कुंजी की थी, सुलेमान कुंजी खोजने लगा,  सारा ढेर खत्म होने को आया था लेकिन कुंजी नही मिली,उसने राजा से कहा लगता है यंहा कोई कुंजी नही है राजन, परन्तु गुर्जर सम्राट ने कहा सुलेमान यंही है वो, देखो ढेर मे,  अब सुलेमान थक कर चूर हो चुका था उसने अंतिम बार ढेर को टटोला तभी उसको कुंजी दिखाई दी

सुलेमान ने राजा भोज से पुछा अब बताये कोनसी है इनमे से सफलता की कुंजी

सम्राट मिहीर भोज ने कहा सफलता की तीन कुंजी "भाग्य" " मेहनत" " आत्मविश्‍वास" है साथ मे भाग्य, आत्मविश्‍वास है यही वो तीन है
तुम्हारा "भाग्य" अच्छा था जो तुम्हे पहले ढेर मे कुंजी पहले ही प्रयास मे मिल गयी,दुसरे ढेर मे "मेहनत" थी समय लगा लेकिन मेहनत काम आयी  लेकिन तिसरे ढेर मे भाग्य ने तुम्हारा साथ नही दिया तुम्हे बहुत मेहनत करनी पडी,लेकिन तुम प्रयास करते रहे अंत मे तुम्हे सफलता जरूर मिली तुम्हे विश्वास था के कुंजी मिलेगी जरुर चाहे कितना ही समय लग जाये तुम परेशान थे तुम ने जितने की आस छोड दी थी लेकिन कुंजी वही थी अपने स्थान पर और तुमने मेहनत की "आत्मविश्‍वास" बनाये रखा अधिक मेहनत की अंत मे तुम सफल हुये।

ऎसे ही जिंदगी मे कुछ लोग पहले ही प्रयास मे सफल हो जाते है,कुछ दुसरे प्रयास मे परन्तु कुछ को लक्ष्य के लिये बहुत अ्धिक मेहनत करनी पडती है लेकिन वो भी अंत मे जीत ही जाते है।

इसी तरह राजा मिहीर ने बताया
मै हर युद्ध मे सफल होता हुं
क्युके कुछ राज्य तो मै खेल खेल मे जीत लेता हुं
कुछ बडे राज्य मै अपनी विशाल सेना के कारण जीत लेता हुं
कुछ राज्य मै अपने प्रयासों से जीत लेता हुं
भाग्यवान तो मै हुं ही जो एक राजा के घर जन्म लिया
वीर तो मै हुं ही जो गुर्जरी मां का दुध पीया
देशभक्ति तो मेरे रक्त मे है जो गुर्जर देश का इतना विस्तार किया।

सुलेमान ने अपने अरब देश जाकर अरब शासको को चेताया के उस महान राजा से मत टकराये अन्यथा मुंह की खानी पडेगी
सुलेमान ने अपनी पुस्तकों मे गुर्जर सम्राट का गुणगान किया।

मंगलवार, 14 जून 2016

भड़ाना देश व भड़ाना राजवंश | Bhadana Gurjar Dynasty

भड़ाना देश और वंश का इतिहास 

History & Kings of Bhadana Gurjar Dynasty 

भारतीय इतिहास लेखन में बहुत से राजवंशों और समुदायों को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया है। ऐसे राजवंशों का उल्लेख यदाकदा इतिहास के संदर्भ ग्रन्थों में मिल जाता है, परन्तु इनके संगठित एवं क्रमबद्ध इतिहास का प्रायः अभाव है। ऐसा ही एक राजवंश है, ‘भड़ाना वंश’।

भड़ाना जिन्हें सामान्य तौर पर समकालीन ग्रन्थों में ‘भड़ानक’ कहा गया है, ग्यारहवीं व बारहवीं शताब्दी में एक विस्तृत क्षेत्र पर शासन करते थे। ‘भड़ानक’ मुख्य रूप से मथुरा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली क्षेत्र में निवास करते थे और यह क्षेत्र इनके राजनीतिक आधिपत्य के कारण ‘भड़ाना देश’ अथवा ‘भड़ानक देश’ कहलाता था। सम्भवतः भड़ानकों की बस्तियाँ दिल्ली के दक्षिण में फरीदाबाद जिले तक थीं, जहाँ आज भी ये बड़ी संख्या में निवास करते हैं। फरीदाबाद जिले में भड़ानों के बारह गांव आबाद हैं। इतिहासकार दशरथ शर्मा के अनुसार जब शाकुम्भरी के राजा पृथ्वीराज चौहान ने भड़ाना देश पर आक्रमण किया, उस समय पर इस राज्य की पूर्वी सीमा पर चम्बल नदी एवं कछुवाहों का ग्वालियर राज्य था,  पूर्वोत्तर दिशा में इसकी सीमाएँ यमुना नदी एवं गहड़वालों के कन्नौज राज्य तक थी। इसकी अन्य सीमाएँ शाकुम्भरी के चौहान गुर्जर राज्य से मिलती थी। भड़ाना या भड़ानक देश एक पर्याप्त विस्तृत राज्य था। स्कन्द पुराण के विवरण के अनुसार भड़ाना देश में 1,25,000 ग्राम थे। समकालीन चौहान गुर्जर राज्य में भी इतने ग्राम न थे।1

समकालीन विद्वान सिद्धसैन सूरी ने भी भड़ानक देश का लगभग यही क्षेत्र बताया है, उसने कहा है कि यह कन्नौज और हर्षपुर (शेखावटी में हरस) के बीच स्थित है। उसने कमग्गा (मथुरा के चालीस मील पश्चिम में कमन) और सिरोहा (ग्वालियर के निकट) का भड़ानक देश के पवित्र जैन स्थलों के रूप में उल्लेख किया है।2 सम्भवतः कमग्गा और सिरोहा इस राज्य के प्रमुख नगर थे। इनके अतिरिक्त अपभ्रंश पाण्डुलिपि ‘‘सम्भवनाथ चरित’’ के लेखक तेजपाल ने भड़ाना देश में स्थित श्रीपथ नगर का वर्णन किया है। इतिहासकार दशरथ शर्मा के अनुसार यह नगर इस राज्य की राजधानी था। इस श्रीपथ नगर की पहचान आधुनिक बयाना से की जाती है।3 इतिहासकारों के अनुसार पूर्व मध्यकालीन अपभ्रंश भाषा में भड़ानक को भयानया कहा गया है, और भयानया शब्द से ही उत्तर मध्यकाल में बयाना शब्द की उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार से आधुनिक बयाना ही भड़ाना देश का केन्द्र बिन्दु था। बयाना से 14 मील दक्षिण में ताहनगढ़ का मजबूत किला स्थित है जो इस राज्य की रक्षा छावनी थी।

भड़ाना समुदाय के विषय में हमें अनेक समकालिक साहित्यिक एवं अभिलेखीय स्रोतों से जानकारी प्राप्त होती है। कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार सम्राट महिपाल के दरबारी कवि राजशेखर ने अपने ग्रन्थ ‘काव्यमीमांशा’ में उन्हें अपभ्रंश भाषा बोलने वाला कहा है। इस अपभ्रंश भाषा को सूरसेनी अपभ्रंश भी कहा जाता है, क्योंकि भड़ाना देश एवं प्राचीन सूरसेनी जनपद का क्षेत्र लगभग एक ही था। यह सूरसेनी अपभ्रंश ही आधुनिक ब्रजभाषा की जननी है।

भड़ानक या भड़ाना देश के राजनीतिक इतिहास के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है। सम्भवतः यह राज्य ग्यारहवीं एवं बारहवीं शताब्दी में स्थिर रहा। बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भड़ानकों का शाकुम्भरी के चौहानों से राजनीतिक संघर्ष चला। चौहान दिग्विजय की भावना से प्रेरित थे और उत्तर भारत में एक साम्राज्य का निर्माण करना चाहते थे। इसलिए उनका उत्तर भारत की अन्य राजनीतिक शक्तियों के साथ युद्ध अवश्यंभावी था। उस समय उत्तर भारत में कन्नौज के गहढ़वाल़, बुन्देलखण्ड के चन्देल गुर्जर, मालवा के परमार गुर्जर, गुजरात के चालुक्य गुर्जर एवं भड़ाना गुर्जर उत्तर भारत में प्रमुख राजनीतिक शक्ति थे। चौहान गुर्जरो का इन सभी से युद्ध हुआ परन्तु सम्भवतः सबसे पहले उनका युद्ध भड़ानकों के साथ ही हुआ।

चौहानों ने भड़ाना देश पर कम से कम दो बार आक्रमण किया। भड़ानकों पर प्रथम आक्रमण के विषय में हमें चौहान गुर्जर राजा सोमेश्वर के सन् 1169ई0 के ‘बिजौलिया अभिलेख’ से पता चलता है। इस समय भड़ाना देश पर कुमार पाल प्रथम अथवा उसके उत्तराधिकारी अजय पाल का शासन था।4 अजय पाल एक शक्तिशाली एवं सम्प्रभुता सम्पन्न शासक था और वह महाराजाधिराज की उपाधि धारण करते था। उनके शासनकाल की जानकारी हमें उनकी महाबन प्रशस्ति (सन् 1150 ई0) से ज्ञात होती है। उनकी महाराजाधिराज की उपाधि से ऐसा प्रतीत होता है कि उनके अधीन अनेक छोटे राजा थे और वे एक विस्तृत क्षेत्र पर शासन करते थे। चौहानों और भड़ानकों में भीषण युद्ध हुआ परन्तु यह युद्ध निर्णायक साबित न हो सका, हालांकि बिजोलिया अभिलेख में चौहानों ने अपनी विजय का दावा किया है। अजयपाल के बाद हरिपाल भड़ाना राज्य का उत्तराधिकारी हुआ, एक अभिलेख के अनुसार 1170 ई0 में शासन कर रहा था।5

हरिपाल के पश्चात् साहन पाल उनका उत्तराधिकारी हुआ। उसका एक अभिलेख भरतपुर स्टेट के आघातपुर नामक स्थान से प्राप्त होता है। साहन पाल के शासन काल में चौहान गुर्जरो ने पृथ्वीराज तृतीय के नेतृत्व में दूसरी बार भड़ानकों पर आक्रमण किया। इस आक्रमण का उल्लेख समकालीन जैन विद्वान् जिनपाल ने 1182 ई0 में लिखित अपने ग्रन्थ ‘खरतारगच्च पत्रावली’ में किया है। जैन विद्वान् ने भड़ानकों की शक्तिशाली गज सेना की प्रशंसा की है, वह लिखता है कि भड़ानकों ने अपनी शक्तिशाली गज सेना के साथ भीषण युद्ध किया।6 भड़ानक बहादुरी से लड़े परन्तु चौहान विजयी रहे। इस हार के कारण भड़ानों की शक्ति क्षीण होने लगी।

साहन पाल के पश्चात् कुमार पाल द्वितीय भड़ानक देश की गद्दी पर बैठा। वह इस राज्य का अन्तिम शासक था। उसके शासनकाल में सन् 1192 ई0 में मौहम्मद गौरी ने भड़ाना राज्य पर आक्रमण किया और त्रिभुवन नगरी को जीत लिया।7 इस आक्रमण से भड़ानक देश का पतन हो गया और कुछ समय पश्चात् हम बयाना को दिल्ली सल्तनत के अंग के रूप में देखते हैं।

भड़ाना राज्य की ज्ञात वंशावली में, कुमार पाल प्रथम (12वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध), महाराजाधिराज अजयपाल (1150 ई0), हरिपाल (1170ई0), सोहन पाल (1196 ई0), कुमार पाल द्वितीय थे। भड़ाना राज्य का यदि मूल्यांकन किया जाये तो हम कह सकते हैं कि यह एक विस्तृत राज्य था जो कि दिल्ली के दक्षिण में अलवर, भरतपुर, मथुरा, करौली एवं धौलपुर क्षेत्र में फैला हुआ था। ‘स्कन्द पुराण’ के अनुसार इसमें 1,25,000 ग्राम थे। इस राज्य का शासक महाराजाधिराज की उपाधि धारण करता था। भड़ानक राज्य की गणना समकालीन शक्तिशाली राज्यों से की जा सकती है। जैन विद्वान ने भड़ानों की शक्तिशाली गज सेना की प्रशंसा की है। भड़ानक राज्य दो शताब्दियों तक स्थिर रहा और उसने तत्कालीन भारतीय राजनीति को प्रचुर मात्रा में प्रभावित किया।

भड़ानक या भड़ाना राज्य के पतन हो जाने पर भी भड़ानकों की शक्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई और वो आने वाले समय में भी अपने साहस और बहादुरी की पहचान बनाये रहे।

बारहवीं शताब्दी के अन्त में तराईन के द्वितीय युद्ध में चौहान गुर्जरो की तुर्कों से हार के फलस्वरूप उत्तर भारत में तुर्कों की सल्तनत की स्थापना हुई। तुर्क मध्य एशिया के निवासी थे और भारत में उनका शासन एक विदेशी शासन था। इस विदेशी शासन के प्रति गुर्जरो ने अनेक विद्रोह किये। भड़ानकों अथवा भड़ानों ने भी संगठित होकर दो बार विदेशी सल्तनत का विरोध किया। समकालीन मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार सुल्तान बलबन (1246-84 ई0) के शासनकाल में दिल्ली के समीप मेवातियों और भड़ाना गुर्जरो ने जोरदार विद्रोह किया था। बलबन ने बड़ी निर्दयता एवं क्रूरता से इस विद्रोह का दमन किया, हजारों मेवाती और भड़ाने मारे गए। आज भी दिल्ली के दक्षिण में फरीदाबाद से लेकर भरतपुर तक मुस्लिम मेव व भड़ाने गूजरों की आबादी बहुसंख्या में है।

फरीदाबाद के भड़ानकों ने सुल्तान शेरशाह सूरी (1540-45 ई0) के शासन काल में दूसरी बार सशस्त्र विद्रोह किया। इस बार विद्रोह की कमान स्वयं भड़ानों के हाथों में थी। दिल्ली की सीमा के निकट फरीदाबाद जिले के पाली और पाखल  ग्रामों के भड़ानों ने इस विद्रोह में प्रमुख भूमिका निभाई। पाली और पाखल के भड़ानों ने मजबूत गढियों का निर्माण कर अपने सैन्य संगठन को शक्तिशाली बना लिया था। भड़ानकों का साहस इतना बढ़ गया था कि उन्होंने दिल्ली के दरवाजों तक हमले किये। जिस समय शेरशाह सूरी दिल्ली की किले बन्दी कर उत्तर भारत में अपने पैर जमा रहा था उस समय भड़ानकों ने उसे बहुत परेशान किया। एक बार भड़ानकों ने शेरशाह के सैन्य शिविर पर छापा मार हमला बोल कर उसके हाथियों को छीन लिया और इन हाथियों को अरावली पहाडियों में छिपा दिया। जहाँ इन हाथियों को छिपाया गया था वह स्थान आज भी हथवाला के नाम से जाना जाता है। भड़ानकों में हाथियों के प्रति आसक्ति शायद उनकी गज सेना की परम्परा की देन थी। भड़ानकों के बढ़ते साहस ने सुल्तान को विचलित कर दिया। भड़ाना अपना खोया हुआ वैभव पाना चाहते थे। विद्रोह इतना शक्तिशाली था कि सुल्तान शेरशाह सूरी ने उसकी गम्भीरता को समझते हुए स्वयं शाही सेना की कमान सम्भाली और पाली और पारवल पर हमला बोल दिया। भड़ाने वीरता और साहस से लड़े परन्तु शाही सेना बहुत बड़ी और बेहतर रूप से संगठित थी, उसके पास तोपें थीं। अन्त में तोपों की सहायता से गढिया गिरा दी गई। हजारों भड़ाने मारे गए। आर0बी0 रसैल ने इस विषय में लिखा है
"The Gurjars of Pali and Pahal became exceedingly audacious while Sher Shah was fortifying Delhi and he marched to the hills and expelled them so that not a vestige was left."8पाली और पारवल ग्राम जिन्हें बाद में पुनः बसाया गया आज भी फरीदाबाद जिलें मौजूद हैं और वहाँ भड़ाना गोत्र के गुर्जर निवास करते हैं जिनकी जुबां पर आज भी उनके पूर्वजों के बलिदान की कहानी है।
           
1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में फरीदाबाद जिले के गुर्जरों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। फरीदाबाद और सोहना क्षेत्र के अन्य गुर्जरों के साथ भड़ाना गुर्जरों ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध अनेक क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। क्रान्ति की विफलता के बाद अन्य देशभक्त गुर्जरों के साथ अनेक भड़ाना वीरों को भी फाँसी दी गई।

• References (संदर्भ) 


1.      Page no. 101-102, Early Chauhan Dynasty, Dashrath Sharma, Jodhpur, 1992.

2.      Catalogue of MSS in Pattan Bhandara I.G.Os, p. 156, Verse 22 as quoted by Dashrath Sharma.

3.      Ibid, page 102-103, Dashrath Sharma.

4.      See his Mohaban Prasasti of the year, V. 1207, Epigraphica India pp. 289ff and II 276ff.

5.      Epigraphica Indica Vol. II page 275.

6.      Page 28 Singhi Jain Granth Mala edition as quoted by Dashrath Sharma.

7.      Taj-ul-Ma sir, Ed. II, pp. 204-43 as quoted by Dashrath Sharma.

8.      Page no. 170, Tribe and Caste of CentralProvince, Vol. 3, by R.V. Russel, Landon, 1916.