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बुधवार, 1 मार्च 2017

गुजरात, गुर्जरात्रा, गुर्जरदेश - Gujarat, Gurjaratra, Gurjardesh

गुजरात,  गुर्जरात्रा, गुर्जरदेश - Gujarat, Gurjaratra, Gurjardesh


गुजरात शब्द सस्कृत के शब्द गुजरात्रा अथवा प्राकृत के गुजराता से निकला हे जिसका अर्थ है गुर्जरो का दैश अथवा गुर्जरो दवारा रक्षित क्षेत्र ।

Ancient Gujarat / प्राचीन गुजरात


गुजरात  ( काठियावाड - भारत ) , गुजरात,  गुजरावाला , गुजरखान ( पाकिस्तान ), गुजरस्थान (गजनी  के पास अफगानिस्थान),  गुजरस्तान (जॉर्जिया ), गुर्जर घार (ग्वालियर ), गुर्जरी बाजार ( पटना - बिहार,  मेरठ - उ.प्र.) गुर्जर ताल  ( बाडमेर - राजस्थान, जौनपुर - उ.प्र  ), गुर्जर नदी  ( बलूचिस्तान -पाकिस्तान ) पोषवाल मन्डी ( जददा-सउदी अरब ) गुर्जर खासी  ( अफगानिस्थान ) खटाना खील व कसाना खील कबाइलि प्रान्त ( अफगानिस्थान ) भाजन गुर्जरी(जलगांव -महाराष्ट्र ) गुर्जर पाल  (भोपाल -मध्यप्रदेश ) गुर्जर नगर  (जम्मू ) गुर्जर घाटी ( जयपुर- राजस्थान ) आदि गुर्जरो के प्रतीक चिन्ह हे।

 पचंतन्त्र मे कथा आती हे जिसके अनुसार गुर्जर दैश जहा ऊटो का मेला लगता था । यह वर्णन मिलता हे कि एक रथकार इस गुर्जर देश मे ऊंट लेने के लिए गया ।
 ( समचीनो यं वयापार: तब सम्पतिश्चैद् कुतो अपिधनिका यत्किचिदद्रव्यमादाय  मया गुर्जदेशे गन्तव्यं करभग्रहणाय। ततशय गुर्जरदेशे गत्वोष्टिं गहीत्वा स्वगृहमागत : । )

गुजरात से लेकर काश्मीर तक का पूरा इलाका "गुर्जर दैश" के नाम से जाना जाता था ।

Ref:
1.  पंचतंत्र अप कथा -14
2. कीलहार्न सस्करण अप-पृष्ठ - 32 ( सर जान मार्शल )






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बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

जुनबिल हूण ( गुर्जर की खाप श्वेत हूण की एक शाखा ) | Zunbil Hun (Branch of White Hun Gurjars)

जुनबिल हूण ( गुर्जर की खाप श्वेत हूण की एक शाखा )

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Zunbil huna Gurjar | Gurjar Vs Arab Wars


जुनबिल हूणो ने लगभग ढाई सौ सालो तक हिन्दुकुश पर्वत के उत्तर में राज किया। ये भाग आजका अफगानिस्तान का बडा भूभाग है।
इन्हें जुन्बिल क्यों कहा जाता था ? गुर्जर हूणो की यह शाखा एक जून देवता की पूजा करती थी यह जून देव सूर्यदेव यानी मिहिर का दूसरा रूप है। जून भगवान की पूजा करने के कारण ही ये जुन्बिल कहलाये।
तत्कालीन जुन्बिल साम्राज्य में जून का एक बेहद सुन्दर व बडा मन्दिर भी था जिसे बाद में अरब आक्रमणकारियो ने तोड दिया था। यह हूणो की वह शाखा थी जो जाबुलिस्तान में थी व इनकी एक शाखा ने गुर्जरदेश में जाबुलपुर यानी जालौर बसाया। 610 ई० से 710 ई० तक जुन्बिलो व अरब आक्रमणकारियो के बीच युद्ध चले । जुन्बिलो ने कई भीषण युद्धो में हराकर अरबो को भगाया मगर ईस्लामिक साम्राज्य की बढती ताकत धार्मिक उन्माद से हर बार आ रही थी ।

जुनबिल हूणो को आज इतिहास में भुला दिया गया है जो कि गुर्जरो के पराक्रम को कम करने का कुत्सित प्रयास है।
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सोमवार, 2 जनवरी 2017

उमराव सिंह परमार गूर्जर, माणकपुर 1857 का गदर | Umrao Singh Parmar Gurjar (Manakpuria) - 1857 Revolt

उमराव सिंह परमार गूर्जर, माणकपुर 1857 का गदर | Umrao Singh Parmar Gurjar (Manakpuria) - 1857 Revolt

Umrao Singh Manikpuria / उमराव सिंह मनिकपुरिया


उत्तर प्रदेश के सहारनपुर क्षेत्र के लोगों ने सबसे पहले 1822-1825 ई0 राजा विजय सिंह गुर्जर व कल्याण सिंह गुर्जर के नेतृत्व में अंग्रेंजी राज को भारत को उखाड़े फैंकने का श्रीगणेश किया था। ऐसे ही 'धनसिंह कोतवाल के नेतृत्व मे 1857 की क्रान्ति की शूरूआत हुई। जैसे ही 1857 की क्रान्ति की ज्वाला धधकी सहारनपुर के गुर्जर अंग्रेंजी हकूमत से उनके साथ हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिये उतावले हो गये । माणकपुर के निवासी उमराव सिंह को जो इस क्षेत्र के प्रभावशाली एवं दबंग व बहादुर व्यक्ति थे वहां की गुर्जर जनता ने उसे अपना राजा घोषित कर दिया ।उनका गोत्र परमार था l जिस प्रकार दादरी के गुर्जर राजा उमराव सिंह भाटी दादरी, राव कदम सिंह गूर्जर परीक्षितगढ़ की राजाज्ञाएं निकलती थी उसी प्रकार माणकपुर के उमराव सिंह गुर्जर की भी राजाज्ञाएं निकलने लगी। ’फिरंगी को मार भगाओ, देश को आजाद कराओ । इन्हें मालगुजारी मत दो, थाणे तहसील पर कब्जा करो, संगठित हो जाओ। इन राजाज्ञाओं का व्यापक असर क्षेत्र पर होने लगा । मालगुजारी राजा उपराव सिंह को दी जाने लगी । नुकड़, सरसावा, मंगलौर, पुरकाजी, बूढ़ा खेड़ी, सोढ़ौली, रणधावा, फतेहपुर, बाबूपुर, साॅपला, गदरदेड़ी, लखनौती पुरकाजी आदि गांवों के गूर्जरों ने संगठित होकर उमराव सिंह के नेतृत्व में सहारनपुर जिले के प्रशासन को एकदम ठप्पा कर दिया और प्रशासन पर क्रान्किारियों का कब्जा हो गया । गुर्जरों के साथ रांघड़ मुसलमान व पुण्डीर भी कन्धे से कंधा मिलाकर अंग्रेंज सरकार से टक्कर ले रहे थे । गंगोह की गुर्जर जनता ने फलुवा गुर्जर को अपना नेता बना कर इस क्षेत्र में भारी उपद्रव व अशान्ति पैदा कर दी थी।

नुकड़ तहसील, थाणा, मंगलौर में भी वही हाल, सरसावा पर भी अधिकार सहारनपुर के सुरक्षा अधिकारी स्पनकी तथा रार्बटसन के साथ राजा उमराव सिंह के नेतृत्व में डटकर टक्कर हुई । इस अंग्रेंज अधिकारियों ने गुर्जरों का दमन करने के लिए सेना का प्रयोग किया । गांवों पर बाकायदा तैयारी कर के सेना, स्पनकी और राबर्टसन के नेतृत्व में चढ़ाई करती थी, लेकिन गुर्जर बड़े हौंसले से टक्कर लेते थे उपरोक्त जिन गांवों का विशेषकर जिक्र किया है उनके जवाबी हमले भी होते रहे । आधुकिनतम हथियारों से लैस अंग्रेंजी सेना व उनके पिटू भारतीय सेना ने इन गांवों को जलाकर राख कर दिया, इनकी जमीन जायदाद जब्त की गई । माणिकपुर के राजा उमराव सिंह, गंगोह के फतुआ गुर्जर तथा इनके प्रमुख साथियों को फांसी दी गई और अनेक देशभक्त गुर्जरों को गांवों में ही गोली से उड़ा दिया गया, या वृक्षों पर फांसी का फन्दा डालकर लटका दिया ।

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रविवार, 31 जुलाई 2016

पं बालकृष्ण गौड द्वारा गुर्जर शिलालेखो का विवरण | Description of Gurjar inscription by Pandit Balkrishna God

पं बालकृष्ण गौड द्वारा गुर्जर शिलालेखो का विवरण


पं बालकृष्ण गौड लिखते है कि जिसको कहते है रजपूति इतिहास
तेरहवीं सदी से पहले इसकी कही जिक्र तक नही है और कोई एक भी ऐसा शिलालेख दिखादो जिसमे रजपूत शब्द का नाम तक भी लिखा हो। लेकिन गुर्जर शब्द की भरमार है, अनेक शिलालेख तामपत्र है, अपार लेख है, काव्य, साहित्य, भग्न खन्डहरो मे गुर्जर संसकृति के सार गुंजते है ।अत: गुर्जर इतिहास को राजपूत इतिहास बनाने की ढेरो सफल-नाकाम कोशिशे कि गई।
पं बालकृष्ण गौड द्वारा गुर्जर शिलालेखो का विवरण | Description of Gurjar inscription by Pandit Balkrishna God 




• कर्नल जेम्स टोड कहते है कि राजपूताना कहलाने वाले इस विशाल रेतीले प्रदेश अर्थात राजस्थान में, पुराने जमाने में राजपूत जाति का कोई चिन्ह नहीं मिलता परंतु मुझे सिंह समान गर्जने वाले गुर्जरों के शिलालेख मिलते हैं।

• प्राचीन काल से राजस्थान व गुर्जरात का नाम गुर्जरात्रा (गुर्जरदेश, गुर्जराष्ट्र) था जो अंग्रेजी शासन मे गुर्जरदेश से बदलकर राजपूताना रखा गया ।

• कविवर बालकृष्ण शर्मा लिखते है :

चौहान पृथ्वीराज तुम क्यो सो गए बेखबर होकर ।
घर के जयचंदो के सर काट लेते सब्र खोकर ॥
माँ भारती के भाल पर ना दासता का दाग होता ।
संतति चौहान, गुर्जर ना छूपते यूँ मायूस होकर ॥


गुर्जर हूण वीरो की विजयनी सैना | Victorious Army of Huna Veer Gurjars

गुर्जर हूण वीरो की विजयनी सैना 

गुर्जर हूण वीरो की विजयनी सैना | Victorious Army of Huna Veer Gurjars

हूण पशुजीवी ही नही थे आयुध जीवी भी थे । बडे - बडे व दूर - दूर तक लम्बे धावे मारना इनका शोक था  ।

हूण वीरो की लडाई की एक बडी चाल थी,  दुश्मन के सामने पराजित होने का अभिनय कर के भाग पडना । ओर जब दुश्मन उनका पीछा करते कुछ दूर निकल जाता  , तो सुशिक्षित,  सुसंगठित जहां - तहां छिपे हुये हूणवीरो के दस्ते शत्रु की पीठ पर आक्रमण कर देते  ।

हूणवीर माउदून ने चीन के युद्ध मे एक बार इस तरह 3  लाख  20 हजार चीनी सेनिको को अपने जाल मे फसा लिया था  ।

चीन सम्राट अपनी सेना के साथ आधुनिक ता - तुड - फू ( शेनसी  ) से एक मील दूर एक दृढ दुर्ग- बद स्थान पर पहुच चुका था  , लेकिन  उसकी अधिकांश सेना पीछे रह गयी थी  ।

हूण वीर " माउदून " अपने 3 लाख सैनिको के साथ चीनियो पर टूट पडा ओर चीनी सम्राट चारो तरफ से घिर गया । चीनी सेना 7 दिन तक घिरी रही  । बडी मुश्किल से चीनी अपने सम्राट को घेर मे से बाहर निकाल पाये । माउदून के घेरे का एक कोना ढीला था । इस निर्बल कोने से चीनी सम्राट निकल भागने मे समर्थ हुआ । माउदून ने पीछा नही किया ।
समझोते मे चीनियो को बहुत अपमानजनक बाते स्वीकार करनी पडी । हूणवीर  माउदून के साथ चीनी सम्राट का समझोता हुआ ओर चीनियो को अपनी एक राजकुमारी  , रैशम तथा बहुमूल्य हीरे जवाहरात,  रत्न,  चावल,  अगूंरी शराब तथा बहुत तरह के खाद्य पदार्थ  भेंट देने के लिये मजबूर होना पडा  ।

इस तरह चीनी राजकुमारीयो का शक्तिशाली हूण वीरो से ब्याह करने की प्रथा चली ।
क्योकि राजकुमारी का लडका मातृपक्ष का पक्षपाती होगा  ।

चीन सम्राट  हूड-ती के मरने के बाद उसकी विधवा रानी को -ठूँ अपने पुत्र  ( वैन - ती  ) को बैठा कर बारह साल  ( 187 - 179  ईसापूर्व ) तक स्वय राज करती रही । हूण वीरो मे पितृ - सताक समाज होने के कारण कुछ सुभीता था,  जिसके कारण कितने ही चीनी भाग कर उनके राज्य मे चले आते थे ।

 ऐसे ही किसी दरबारी की बातो मे पडकर माउदून ने रानी को सदेंश-पत्र- भेजकर अपने हाथ ओर ह्रदय को देने का प्रस्ताव किया ।
दरबारीयो ने युध्द की आग भडकाने की कोशिश करी , लेकिन किसी समझदार ने चीनी रानी को समझाया

  " कि अभी भी हमारी आम जनता हमारी ही सडको पर चीनी सम्राट के युध्द से भागने के गीत गाते फिरते हे "

 चीनी रानी ने कूटनीतिक रूप से हूणवीर सम्राट   माउदून को बहुत नरम सा  पत्र लिखा -- " मेरे  दाँत ओर केश परम भटारक ( आप ) को प्राप्त करने के योग्य नही हे "  साथ ही दो राजकीय रथ  , बहुत से अच्छे घोडे तथा दूसरी बहुमूल्य भैंट भेजी ।

 तब जाकर " माउदून " को दरबारीयो की अनावश्यक युध्द करवाने की चाल समझ आई ओर इस पर हूण वीर माउदून अत्यंत लज्जित हुआ ओर उसने बहुत से हूणी घोडे भेज कर चीनी रानी से  क्षमा मागी ।
हूणवीर माउदून ने बहुत लम्बे समय तक  ( 36 साल ) राज्य किया ।

सन्दर्भ :--
1. A Thousands years of Tattars :- E.  H. Parker,  Shanghai - 1895
2. Histoire d ' Attila et De ses successures : Am. Thierry -- Paris - 1856 
3. History of the Hing - nu in their Relations with China :-- Wylie - Journal of Anthropological institute -- London,  Volume III - 1892 -93

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

महान धनुर्धर प्राचीन हूण गुर्जरो की शासन व्यवस्था का विवरण (ईसापूर्व)

महान धनुर्धर प्राचीन हूण गुर्जरो की शासन व्यवस्था  ( ईसापूर्व )

हूण गुर्जर साम्राज्य । Hun Gurjar | Hoon Gurjar | History | Huna Gurjar 

हूण गुर्जर वीरों की शासन व्यवस्था का विवरण 


1. शान -'यू :

राजा वाची चीनी शब्द शान - यू का हूण भाषा रूप  जैंगी कहा जाता है। शायद इसकी रूपान्तर " चंगीज" हुआ । राजा की पूरी उपाधि थी

" तेंग्री - कुदू - शान - यू " ( दैव पुत्र महान )

आज भी मंगोल ओर तुर्की भाषा मे देवता वाचक ""तेंग्री " शब्द मोजूद है । शान- यू  प्रभावशाली योध्दा ओर नेता होता , लेकिन उसके ऊपर हूण ओर्दू का नियन्त्रण रहता था

2. दूगी :--

इसका अर्थ होता हे धर्मात्मा या न्यासी । शान-यू के नीचे दूगी हुआ करते थे , जिनमे एक को पूर्वी - दूगी ओर दूसरे को पश्चिम - दूगी कहते थे ।

 पूर्वी दूगी का दर्जा ऊॅचा समझा जाता था,  ओर आमतौर से वह युवराज माना जाता था ।
हूण साम्राज्य के पूर्व भाग पर पूर्वी - दूगी का शासन था ओर पश्चिम पर पश्चिमी दूगी का ।

 राज्य के मध्य भाग पर अर्थात हूण - जन क्षैत्र पर स्वयं शान - यू सीधे शासन करता था ।

3. रूक - ले  ( कुनलू ) :----

यह भी दक्षिण ओर उतर दो होते थै , उत्तर का दर्जा ऊॅचा होता था

4 . इनके नीचे उतर ओर दक्षिण के दो सेनापति होते थे
5. इनके नीचे वाम दक्षिण के दो दिवान होते थे । आगे भी दो वाम दक्षिण कुतलू जेसे दस हजारी ओर हजारी तक के चोबीस सेनिक अधिकारी होतै थे । हूण - शासन मे सेनिक- असेनिक अधिकार का भेद नही था  ।

इनके अतिरिक्त हूण - शासको की उपाधि श्रृंगो से समझी जाती थी ,  जो शायद समय - समय पर उनके श्रंगार होते हो  ।

 दोनो दूनी ओर दोनो रूकले चतुःश्रृंग कहे जाते थे ।

उनके नीचे षट -'श्रृंग अधिकारी थे ।
दोनो कुतलू शासन प्रबंध को देखते थे ।

दूगी आदि  24  श्रेष्ठ अधिकारीयो के अपने क्षैत्र थे,  जिनके भीतर ही वह अपने ओर्दू तथा पशुओं को लेकर  विचरण कर सकते थे उनको अपने हजारी,  शतिक ओर दक्षिक आदि अफसरो के नियुक्ति के अधिकार थे ।

शान - यू की रानी की पदवी इन - ची ( येडःची )  थी ।

 हूणो के तीन - चार ऊंचे कुलो मे से उसे  लिया जाता था । शान - यू का अपना कुल भी बहुत सम्मानित समझा जाता था ।
 हूणो की जो श्रैणिया ओर पदवीयां स्थापित की थी ।

वह तुर्को ओर मंगोलो के समय तक मानी जाती रही
हजारी,  पंच हजारी,  दस हजारी दर्जे स्वीकार किये गये थे ।

सन्दर्भ :--
1 . A Thousand Years of  Tatars : E.  H . Parker, Shanghai - 1895
2. हुन्नू इ गुन्नी : क. इनस्त्रान्त्सेफ,  लेनिनग्राद - 1926
3. Histoire des Huns : Desqugue - Paris : 1756

सोमवार, 13 जून 2016

राष्ट्ररक्षक वीर गुर्जर - सम्राट मिहिर भोज गुर्जर प्रतिहार

राष्ट्ररक्षक वीर गुर्जर  - सम्राट मिहिर भोज गुर्जर प्रतिहार

Gurjar Samrat Mihir Bhoj | गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

गुर्जर प्रतिहार राजाओ द्वारा अरब के प्रबल विरोध का ही ये परिणाम था कि रेगिस्तान प्रायद्वीप से निकल कर एक झपाटै मे पशिच्म मे सूदूर स्पेन तक इस्लामी साम्राज्य का विस्तार कर डालने वाली विश्व विजयनी अरब सेनाओ को भारत मे सिंध मे आकर थम जाना पडा ओर अगले तीन सो वर्षो तक वे इस प्रदेश मे सफलता न पा सकी ।
प्रतिहार गुर्जरो का समस्त राष्ट्र ऋणी है क्योकि उन्होंने भारत की सकंट काल मे रक्षा की ।
अब सिंध मे अरबो का अधिकार केवल मन्सूरा ओर मुल्तान इन दो स्थानो पर ही रह गया । जंहा पर उन्होने गुर्जर सम्राट के आक्रमणों से बचने के लिये "अल महफूज " नामक रक्षा -प्रकार बनवाये थे। ओर उन्ही मे छिपकर गुर्जरो के हमलो से अपनी रक्षा करते थे।इन दोनो स्थानो को छोडकर शेष समस्त सिंध गुर्जर साम्राज्य मे मिला लिया गया था ।
इसके लिये गुर्जेशवर सम्राट ने सैनिक अभियान भेजकर अरब सेनाओ को पराजित किया । सिंध का अरब शासक शासक इमरान -बिन-मूसा गुर्जरो की सेनाओ से पूरी तरह पराजित हुआ ओर इस प्रकार गुर्जर साम्राज्य की सीमाऐ सिंधु नदी से सैकडो मील पश्चिम तक पहुंच गयी थी । इस प्रकार भारत अगली शताब्दीयो तक अरब आक्रमणों से मुक्त हो गया ।
गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का राज्य काबुल से रांची व आसाम तक हिमालय से नर्मदा नदी व आंध्र तक, काठियावाड से बगांल तक सुदृढ सुसंगठित ओर धन - धान्य पूर्ण था ।

• संदर्भ :
हरियाणा के प्राचीन लक्षण स्थान, स्वामी ओउमानन्द सरस्वती -- पृष्ठ - 93


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गुर्जरो का साम्राज्य (640 ई.) | Gurjar Empires in 640 A.D.

गुर्जरो का साम्राज्य  (640 ई.)

Gurjar Empire at Harsha Times

हर्ष के समय गुर्जरो का ही ऐसा राज्य था जो कि हर्ष के आदिपत्य से बाहर था

मिस्टर ए.वी.हेवेल आर्यन रूल इन इंडिया के पृष्ठ  191 पर लिखते हे।
" Before the end of his region.  Harsha 's  rule was suprime in Aryawat from sea to sea, as south as Narmada river.  Excepts over the Kingdom of GURJARS. Which included Rajasthan,Northan Gujrat and part of the Pun jab. "

अनुवाद :

" हर्ष का साम्राज्य तमाम आर्यावर्त मे फैल चुका था । समुद्र के एक किनारे से नर्मदा के दक्षिण तक हर्ष का ही राज्य था। सिर्फ राजस्थान, उत्तरीय  गुजरात व पजांब मे गुर्जरो का राज्य उससे बाहर था ।"

गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्या द्वितीय | Gurjar Samrat Pulkesin Chalukya

गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्य द्वितीय 

गुर्जर सम्राट । पुलकेशिन । चालुक्या वंश । गुर्जर । गुर्जर देश । गुर्जरात्रा । गुजरात । सौलंकी 
Gurjar Samrat Pulkesin Chalukya | चालुक्य

सत्याश्रय, श्रीपृथ्वीवल्लभ , परमेश्वर परमभट्टारक जैसी उपाधियाँ पाने वाले यह गुर्जर सम्राट भारतीय इतिहास में एक महान शासक माने जाते हैं।
इतिहासकारो का मानना है कि हूण गुर्जरो के विखण्डन से चालुक्य, प्रतिहार, चौहान, तंवर,चेची,सोलंकी,चप या चपराणा, चावडा आदि राजवंश व गुर्जर कुषाण साम्राज्य के विखण्डन से मैत्रक, गहलोत,परमार,हिन्दुशाही खटाणा, भाटी आदि नये राजवंश जन्म लेते हैं।
गुर्जरो के इतिहास लेखक यानी भाट भी यहीं बताते हैं
चालुक्य राजवंश भी गुर्जर हूण राजवंश की शाखा माना जाता है। चालुक्य साम्राज्य को ही सर्वप्रथम गुर्जरत्रा, गुर्जरात,गुर्जराष्ट्र व गुर्जर देश से सम्बोधित किया गया जो कि इनके गुर्जर होने का बडा प्रमाण है।
चालुक्य राजवंश की नींव विष्णुवर्धन ने रखी। पुलकेशिन चालुक्य भी इसी राजवंश का सबसे महान शासक सिद्ध हुआ।
पुलकेशिन व हर्षवर्धन दोनो समकालीन थे, महान सम्राट थे, यौद्धा थे, न्यायप्रिय,उदारशील,प्रजावत्सल शासक थे। दोनो को ही बराबर माना जाता है।
जहाँ हर्षवर्धन उत्तर भारत के एकछत्र राजा थे वहीं पश्चिमोत्तर व दक्षिणी भारत के गुर्जर सम्राट पुलकेशिन थे।
गुर्जर चालुक्य राजवंश की राजधानी आन्ध्र प्रदेश की बादामी थी। चालुक्य गुर्जर स्वयं को गुर्जर सम्राट ,गुर्जराधिराज, गुर्जर नरपति, गुर्जरेन्द्र व गुर्जर नरेश से सम्बोधित करते थे ।
राजा तो ये आन्ध्र प्रदेश के थे तो आन्ध्रपति या आन्ध्र नरेश लिख सकते थे। इनका शाही निशान वराह था जो कि गुर्जर हूण व गुर्जर प्रतिहारो का भी शाही निशान था । इनके सिक्के हूण गुर्जरो के सिक्को की नकल है व उन सिक्को का नाम भी हूण ही है।
गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्य सम्राट कीर्तिवर्मन के पुत्र थे। राजा बनने के लिये।इनका विवाद अपने चाचा सम्राट मंगलेश से भी हुआ क्योंकि कीर्तिवर्मन की मृत्यु के बाद अल्पायु पुलकेशिन के संरक्षण का भार चाचा मंगलेश को सौंपा गया था। मंगलेश राजगद्दी पर स्वयं बैठना चाहते थे, इस विवाद में मारे गये।
चालुक्य साम्राज्य गुर्जर मण्डल का सबसे बडा राज्य था। इस गुर्जर गणराज्य या मण्डल में गुर्जरो के मैत्रक, चप या चावडा, प्रतिहार आदि बडे छोटे कई गुर्जर राज्य संयुक्त होकर रहते थे।

पुलकेशिन का वास्तविक नाम ऐरेया था,राज्यरोहण के समय पुलकेशिन द्वितीय नाम रखा गया। इनका शासनकाल 609ई० से 642 ई० माना जाता है।
इन्होने लाट,सौराष्ट्र जीतकर गुर्जरत्रा की सीमा को विस्तार देना शुरू किया। कोंकण के मौर्य, पल्लव,गंग,चोल,कदंब आदि राजवंशो को हराकर।पूरे दक्षिणी भारत में गुर्जरत्रा साम्राज्य खडा कर दिया ।

गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्य की सबसे बडी उपलब्धि कन्नौज के प्रतापी सम्राट हर्षवर्धन को नर्मदा के कछारो में हराना था। इस प्रकार उन्होने सम्राट हर्षवर्धन के विजयरथ को रोक लिया। यह युद्ध पूरे गुर्जरत्रा ने लडा था जिसमें कई गुर्जर नरेश शामिल थे।

इस युद्ध के बाद गुर्जर सम्राट पुलकेशिन ने परमेश्वर की उपाधि धारण की।
हर्षवर्धन को उत्तरपथ का स्वामी होने के कारण उत्तरपथेश्वर कहा जाता था व हर्षवर्धन को पराजित करके पुलकेशिन को दक्षिणपथ का स्वामी होने के कारण दक्षिणपथेश्वर कहा गया।
इसी समय चीनी यात्री हवेनसांग भारत आता है वह गुर्जर सम्राट पुलकेशिन की बहुत प्रशंसा करता है व हर्षवर्धन व पुलकेशिन को समान शासक बताता है। वह लिखता है कि पुलकेशिन एक न्यायप्रिय, सभी धर्मो का संरक्षणकर्त्ता,उदार,बुद्धिमान,प्रजावत्सल व कलाव साहित्य का अनुरागी शासक है।
पुलकेशिन की मृत्यु पल्लव नरेश नरसिहँवर्मन से युद्ध करते हुए ६४२ ई० में होती है। इनके बाद इनका तीसरा पुत्र विक्रमादित्य प्रथम राजसिँहासन पर बैठता है।


चंदेल गुर्जर वंश | History of Chandel Gurjar Dynasty

चन्देल गुर्जर वंश का इतिहास

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चन्देल गुर्जर वंश मध्यकालीन भारत का प्रसिद्ध गुर्जर राजवंश था। जिसने 08वीं से 12वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से यमुना और नर्मदा के बीच, बुंदेलखंड तथा उत्तर प्रदेश के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर राज किया। चंदेल वंश के शासकों का बुंदेलखंड के इतिहास में विशेष योगदान रहा है। उन्‍होंने लगभग 400 साल तक बुंदेलखंड पर शासन किया। चन्देल गुर्जर शासको न केवल महान विजेता तथा सफल शासक थे, अपितु कला के प्रसार तथा संरक्षण में भी उनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा। चंदेल गुर्जरो का शासनकाल आमतौर पर बुंदेलखंड के शांति और समृद्धि के काल के रूप में याद किया जाता है। चंदेलकालीन स्‍थापत्‍य कला ने समूचे विश्‍व को प्रभावित किया उस दौरान वास्तुकला तथा मूर्तिकला अपने उत्‍कर्ष पर थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं खजुराहो के मंदिर।
खजुराहो का कंदरीय महादेव मंदिर
Khujrao Temple of Chandel Gurjar Dynasty | खुजराहो का मंदिर


• उत्पत्ति एवं परिचय 

इस वंश की उत्पत्ति का उल्लेख कई लेखों में है। कीर्तिवर्मन् के देवगढ़ शिलालेख में और चाहमान गुर्जर पृथ्वीराज तृतीय के लेख में "चन्देल" शब्द का प्रयोग हुआ है। गुर्जर वंश में नृप नंनुक हुआ जिसके पुत्र वा पति और पौत्र जयशक्ति तथा विजयशक्ति थे। विजय के बाद क्रमश: राहिल, हर्ष, यशोवर्मन् और धंग , गुर्जर राजा हुए। वास्तव में गुर्जर सम्राट नंनुक से ही इस वंश का आरंभ होता है और अभिलेख तथा किंवदंतियों से प्राप्त विवरणों के आधार पर उनका संबंध आरंभ से ही खजुराहो से रहा तथा गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के अधीन रहे। अरब इतिहास के लेखक कामिल ने भी इनको "कजुराह" में रखा है। धंग से इस वंश के संस्थापक नंनुक की तिथि निकालने के लिय यदि हम प्रत्येक पीढ़ी के लिये 20-25 वर्ष का काल रखें तो धंग से छह पीढ़ी पहले नंनुक की तिथि से लगभग 120 वर्ष पूर्व अर्थात् 954 ई. - 120 = 834 ई. (लगभग 830 ई.) के निकट रखी जा सकती है। "महोबा खंड" में चंद्रवर्मा के अभिषेक की तिथि 225 सं. रखी गई है। यदि गुर्जर नरेश नंनुक का विरुद अथवा दूसरा नाम मान लिया जाय और इस तिथि को हर्ष संवत् में मानें तो नंनुक की तिथि (606 + 225) अथवा 831 ई. आती है। अत: दोनों अनुमानों से नंनुक का समय 831 ई. माना जा सकता है।

वाक्पति ने विंध्या के शत्रुओं को हराकर अपना राज्य विस्तृत किया। तृतीय गुर्जर नरेश जयशक्ति ने अपने ही नाम से अपने राज्य का नामकरण जेजाकभुक्ति किया। कदाचित् यह गुर्जर प्रतिहार सम्राट् मिहिर भोज का सामंत राजा था और यही स्थिति उसके भाई विजयशक्ति तथा पुत्र राहिल की भी थी। हर्ष और उसके पुत्र यशोवर्मन् के समय परिस्थिति बदल गई। गुर्जरों और राष्ट्रकूटों के बीच निरंतर युद्ध से अन्य शक्तियाँ भी ऊपर उठने लगीं। इसके अतिरिक्त गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के पुत्र महेंद्रपाल के बाद कन्नौज के सिंहासन के लिये गुर्जर सम्राट भोज द्वितीय तथा क्षितिपाल में संघर्ष हुआ। खजुराहो के एक लेख में हर्ष अथवा उसके पुत्र यशोवर्मन् द्वारा पुन: क्षितिपाल को सिंहासन पर बैठाने का उल्लेख है- (पुनर्येन श्री क्षितिपालदेव नृपसिंह: सिंहासने स्थापित:।)

 हर्ष के पुत्र यशोवर्मन् के समय चंदेलों का गौड़, कोशल, मिथिला, मालव, चेदि, के साथ संघर्ष का संकेत है।प्रशस्तिकार ने उसकी प्रशंसा बढ़ा चढ़ाकर की हो तब भी इसमें संदेह नहीं कि चंदेल गुर्जर राज्य धीरे धीरे शक्तिशाली बन रहा था। धंग के खजुराहों लेख में गुर्जर प्रतिहार सम्राट विनायकपाल का उल्लेख मिलता है। 
चंदेल गुर्जर शासको में धंगदेव सबसे प्रसिद्ध तथा शक्तिशाली राजा हुआ और इसने 50 वर्ष (950 से 1000 ई.) तक राज किया। उसके लंबे राज्यकाल में खजुराहो के दो प्रसिद्ध मंदिर विश्वनाथ तथा पार्श्वनाथ बने। पंजाब के राजा जयपाल की सहायता के लिये अजमेर और कन्नौज के गुर्जर राजाओं के साथ उसने गजनी के शासक सुबुक्तगीन के विरुद्ध सेना भेजी। उसके पुत्र गंड (1001-1017) ने भी अपने पिता की भाँति 'गुर्जर राजा आनंदपाल खटाणा' की महमूद गजनी के विरुद्ध सहायता की। महमूद के कन्नौज पर आक्रमण और राज्यपाल के हार के विरोध में गंड के पुत्र विद्याधर ने कन्नौज के राजा का वध कर डाला, पर 1023 ई. में गंड को स्वयं कालिंजर का गढ़ महमूद को दे देना पड़ा। महमूद के लौटने पर यह पुन: चंदेलों के पास आ गया। गंड के समय कदाचित् जगदंबी नामक वैष्णव मंदिर तथा चित्रगुप्त नामक सूर्यमंदिर बने। गंड के पुत्र विद्याधर (लगभग 1019-1029) को इब्नुल अथीर नामक मुसलमान लेखक ने अपने समय का सबसे शक्तिशाली राजा कहा है। उसके समय चंदेल गुर्जरो ने कलचुरी और परमारों गुर्जरो पर विजय पाई और 1019 तथा 1022 में महमूद का मुकाबला किया। चंदेल गुर्जर राज्य की सीमा विस्तृत हो गई थी। कहा जाता है कि कंदरीय महादेव का विशाल मंदिर भी इसी ने बनवाया
गुर्जर नरेश विद्याधर के बाद चन्देल राज्य की कीर्ति और शक्ति घटने लगी। गुर्जर नरेश विजयपाल चन्देल (लगभग 1029-51) इस युग का प्रमुख चंदेल राजा हुआ। कीर्तिवर्मन् (1070-95) तथा मदनवर्मन् (लगभग 1029-1162) भी प्रमुख चंदेल राजा हुए। कलचुरी सम्राट् दाहिले की विजय से 1040-70 तक के लंबे काल के लिये चंदेलों की शक्ति क्षीण हो गई थी। विल्हण ने कर्ण को कालिंजर का राजा बताया है।गुर्जर राजा कीर्तिवर्मन् ने चंदेलों की खोई हुई शक्ति और कलचुरियों द्वारा राज्य के जीते हुए भाग को पुन: लौटाकर अपने वंश की लुप्त प्रतिष्ठा स्थापित की। उसने सोने के सिक्के
 भी चलाए जिसमें कलचुरि आंगदेव के सिक्कों का अनुकरण किया गया है। केदार मिश्र द्वारा रचित "प्रबोधचंद्रोदय" (1065 ई.) इसी चंदेल गुर्जर सम्राट् के दरबार में खेला गया था। इसमें वेदांतदर्शन के तत्वों का प्रदर्शन है। यह कला का भी प्रेमी था और खजुराहों के कुछ मंदिर इसके शासनकाल में बने। कीर्तिवर्मन् के बाद सल्लक्षण बर्मन् या हल्लक्षण वर्मन्, जयवर्मनदेव तथा पृथ्वीवर्मनदेव ने राज्य किया। अंतिम चन्देल गुर्जर सम्राट्, जिसका वृत्तांत "चंदरासो" में उल्लिखित है, परमर्दिदेव अथवा परमाल (1165-1203) था। इसका चौहान वंश के गुर्जर सम्राट् पृथ्वीराज  से संघर्ष हुआ और 1208 में कुतबुद्दीन ने कालिंजर का गढ़ इससे जीत लिया, जिसका उल्लेख मुसलमान इतिहासकारों ने किया है। चंदेल गुर्जर राज्य की सत्ता समाप्त हो गई पर शासक के रूप में इस वंश का अस्तित्व कायम रहा। 16वीं शताब्दी में स्थानीय शासक के रूप में चंदेल गुर्जर राजा बुंदेलखंड में राज करते रहे पर उनका कोई राजनीतिक प्रभुत्व न रहा।

• शासन, संस्कृति एवं कला 

चंदेल शासन परंपरागत आदर्शों पर आधारित था। गुर्जर सम्राट यशोवर्मन् के समय तक चंदेल गुर्जर नरेश अपने लिये किसी विशेष उपाधि का प्रयोग नहीं करते थे। धंग ने सर्वप्रथम परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, परममाहेश्वर, गुर्जरेश्वर, कालंजराधिपति, का विरुद धारण किया। कलचुरि नरेशों के अनुकरण पर परममाहेश्वर श्रीमद्वामदेवपादानुध्यात तथा त्रिकलिंगाधिपति और गाहड़वालों के अनुकरण पर परमभट्टारक इत्यादि समस्त राजावली विराजमान विविधविद्याविचारवाचस्पति और कान्यकुब्जाधिपति का प्रयोग मिलता है।
हम्मीरवर्मन् की साहि उपाधि संभवत: मुस्लिम प्रभाव के कारण थी; गुर्जर राजवंश के अन्य व्यक्तियों को भी शासन में अधिकार के पद मिलते थे। कुछ अभिलेखों से प्रतीत होता है कि कुछ मंत्रियों को उनके पद का अधिकार वंशगत रूप में प्राप्त हुआ था। मंत्रियों के लिये मंत्रि, सचिव और अमात्य का प्रयोग बिना किसी विशेष अंतर के किया गया है। मंत्रिमुख्य के अतिरिकत अधिकारियों में सांधिविग्रहिक, प्रतिहार, कंचुकि, कोशाधिकाराधिपति, भांडागाराधिपति, अक्षपटलिक, कोट्टपाल, विशिष, सेनापति, हस्त्यश्वनेता, पुरबलाध्यक्ष आदि के नाम आते हैं। शासन के कुछ कार्य पंचकुल और धर्माधिकरण जैसे बोर्डो के हाथ में था। राज्य विषय, मंडल, पत्तला, ग्रामसमूह और ग्रामों में विभक्त था। शासन में सामंत व्यवस्था कुछ रूपों में उपस्थित थी। एक अभिलेख में एक मंत्री को मांडलिक भी कहा गया है। विशिष्ट सैनिक सेवा के लिये गाँव दिए जाते थे। युद्ध में मरे सैनिकों के लिये किसी प्रकार के पेंशन अथवा मृत्युक वृत्ति की भी व्यवस्था थी। चंदेल गुर्जर राज्य की भौगोलिक और प्राकृतिक दशा के कारण दुर्गों (किला) का विशेष महत्व था और उनकी ओर विशेष ध्यान दिया जाता था। अभिलेखों में राज्य द्वारा लिए गए करों की सूची में भाग, भोग, कर, हिरण्य, पशु, शुल्क और दंडादाय का उल्लेख है।
गुर्जरो मे मिहिर, गुर्जरेश्वर, गुर्जर नरेश, गुर्जर परमेश्वर, गुर्जरेश, का भी उपयोग मिलता है। कीर्तिवर्मन् पहला चंदेल गुर्जर नरेश था जिसने सिक्के बनवाए।
चंदेल गुर्जर राज्य में पौराणिक धर्म की जनप्रियता बढ़ रही थी। चंदेल गुर्जर राजा और उनके मंत्री तथा अन्य अधिकारियों के द्वारा प्रतिमा और मंदिर के निर्माण के कई उल्लेख मिलते हैं। विष्णु के अवतारों में वराह, वामन, नृसिंह, राम और कृष्ण की पूजा का अधिक प्रचलन था। चंदेल गुर्जर राज्य से हनुमान की दो विशाल प्रतिमाएँ मिली हैं और कुछ चंदेल गुर्जर सिक्कों पर उनकी आकृति भी अंकित हैं किंतु विष्णु की तुलना में शिव की पूजा का अधिक प्रचार था। धंग के समय से चंदेल गुर्जर नरेश शैव बन गए। शिवलिंग के साथ ही शिव की आकृतियाँ भी प्राप्त हुई हैं। शिव के विभिन्न स्वरूपों के परिचायक उनके अनेक नाम अभिलेखों में आए हैं। शक्ति अथवा देवी के लिये भी अनेक नामों का उपयोग हुआ है। अजयगढ़ में अष्टशक्तियों की मूर्तियाँ अंकित हैं। सूर्य की पूजा भी जनप्रिय थी। गणेश और ब्रह्मा की मूर्तियाँ यद्यपिं मिली हैं लेकिन उनके पूजकों के पथक् संप्रदायों के अस्तित्व का प्रमाण नहीं मिलता। अन्य देवता जिनके उल्लेख हैं या जिनकी प्रतिमाएँ मिलती हैं। उनके नाम हैं- लक्ष्मी, सरस्वती, इंद्र, चंद्र और गंगा। बुद्ध, बोधिसत्व और तारा की कुछ प्रतिमाएँ मिलती हैं। हिंदु धर्म की भाँति जैन धर्म का भी प्रचार था, विशेष रूप से वैश्यों में। किंतु सांप्रदायिक कटुता के उदाहरण नहीं मिलते। चंदेल गुर्जर नरेशों की नीति इस विषय में उदार थी।
चंदेल गुर्जर राज्य अपनी कलाकृतियों के कारण भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध हैं। चंदेल मंदिरों में से अधिकांश खजुराहों में हैं। कुछ महोबा में भी हैं। इनका निर्माण मुख्यत: 10वीं शताब्दी के मध्य से 11वीं शताब्दी के मध्य के बीच हुआ है। ये शैव, वैष्णव और जैन तीनों ही धर्मों के हैं। इन मंदिरों में अन्य क्षेत्रों की प्रवत्तियों का प्रभाव भी ढूँढ़ा जा सकता है किंतु प्रधान रूप से इनमें चंदेल कलाकार की मौलिक विशेषताएँ दिखलाई पड़ती हैं। एक विद्वान् का कथन है कि भवन-निर्माण-कला के क्षेत्र में भारतीय कौशल को खजुराहों के मंदिरों में सर्वोच्च विकास प्राप्त हुआ है। ये मंदिर विशालता के कारण नहीं बल्कि अपनी भव्य योजना और समानुपातिक निर्माण के लिये प्रसिद्ध हैं। मंदिर के चारों ओर कोई प्राचीर नहीं होती। मंदिर ऊँचे चबूतरे (अधिष्ठान) पर बना होता है। इसमें गर्भगृह, मंडप, अर्धमंडप, अंतराल और महामंडल होते हैं। इक मंदिरों की विशेषता इनके शिखर हैं जिनके चारों ओर अंग शिखरों की पुनरावृत्ति रहती है।
इन मंदिरों की मूर्तिकला भी इनकी विशेषता है। इन मूर्तियों की केवल संख्या ही स्वंय उल्लेखनीय है। इनके निर्माण में सूक्ष्म कौशल के साथ ही अद्भुत सजीवता दिखलाई पड़ती है। इन कृतियों के विषय भी विविध हैं : प्रधान देवी देवता, परिवारदेवता, गौण देवता, दिक्पाल, नवग्रह, सुरसुंदर, नायिका, मिथुन, पशु और पुष्पलताएँ तथा रेखागणितीय आकृतियाँ। इन मंदिरों में मिथुन आकृतियों की इतनी अधिक संख्या में उपस्थिति का कोई सर्वमान्य हल नहीं बतलाया जा सकता। महोबा से प्राप्त चार बौद्ध प्रतिमाएँ अतीव सुंदर हैं। इनमें से सिंहनाद अवलोकितेश्वर की मूर्ति तो भारतीय मूर्तिकला के सर्वोत्कृष्ट नमूनों में से एक है।
साहित्य के क्षेत्र में कोई विशेष उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। कुछ चंदेल अभिलेखकाव्य की दृष्टि से अच्छे हैं। चंदेल गुर्जरो के कुछ मंत्रियों और अधिकारियों को लेखों में कवि, बालकवि, कवींद्र, कविचक्रवर्तिन् आदि कहा गया है जिससे चंदेल गुर्जर राजाओं की कवियों को प्रश्रय देने की नीति का बोध होता है।
 
• चंदेल गुर्जर शासक
Chandel Gurjar Rulers 


* नन्नुक (831 -45) (संस्थापक)
* वाक्पति (845 -870)
* जयशक्ति चन्देल और विजयशक्ति चन्देल (870 -900)
* राहिल (900 -???)
* हर्ष चन्देल (900-925)
* यशोवर्मन् (925-950)
* धंगदेव (950-1003)
* गंडदेव (1003–1017)
* विद्याधर (1017–1029)
* विजयपाल (1030–1045)
* देववर्मन (1060-1070)
* कीरतवर्मन (1070-1100)
* सल्लक्षनवर्मन (1100-1115)
* जयवर्मन (1115-1120)
* प्रथ्वीवर्मन (1120-1129)
* मदनवर्मन (1129–1162)
* यशोवर्मन II (1165-1203)
* परर्मार्दिदेव (1203-1208)

मंगलवार, 17 मई 2016

24 बगडावतों गुर्जर राजाओ की रानियों के नाम

24 बगडावतों गुर्जर राजाओ की रानियों के नाम :

१ तेजा रावत - रूपांदे (छछियार) , बागांदे (लांगडी) 
२ सवाई भोज - रम्भादे (माता साडू खटानी), 
पद्मादे (पोषवाल), जयमती(सोलंकी)
 
३ नेवा रावत - नेतलदे (नेकाडी), पद्मादे (छावड़ी)

 ४ सैजा रावत - खानलदे (बराला), मानबाई 

५ धन्ना रावत - झूमाबाई (नरसल), फूलांदे (दायमा) 

६ महा रावत - पानबाई , फूलांबाई (फागना)

 ७ बाह रावत - सलवण (खटानी), छगनबाई (चंदेल) 

८ अड़सी रावत - नारायणीबाई (खोज्या), फूंदीबाई (भालेसर)

९ बड़सी रावत - धन्नीबाई (भूमला), पन्ना बाई (डोई)
 
१० सांगा रावत - अंजनाबाई (बावला), सजनाबाई 

११ माँगा रावत - भूलांदे (भड़ाना), गेंदीबाई
 (लितर्या) 

१२ आसा रावत - करणादे (हरसल), खानोबाई (गोरसी) 

१३ कासा रावत - गोमादे (खोज्यां), गुलाबबाई

 १४ गुदड़ रावत - मोतीबाई (गीड़), दाखांदे (धोगड़) 

१५ खांतड़ रावत - झूमरीबाई , मैनादे 

१६ काल्हा रावत - भंवरीबाई (सनावा), कंवरीबाई (चांदना) 
१७ कुबाण रावत - नौसरबाई (बारवाल), अमरीबाई (तामड़)

१८ करण रावत - बच्छलदे (कँवर), नन्दूबाई (नेतरड़ा) 

१९ जीवण रावत - दाखांदे (चौपड़ा), देवलदे (भाटी) 

२० ख़ान रावत - गोकल दे (चांदना), बिरदीबाई (सोहळ्या) 

२१ लाला रावत - नुरकादे (सूती), मूर्तिबाई (पंचोली) 

२२ जोधा रावत - गंगा दे (भातड़या), जमनाबाई (भड़क) 

२३ आल्हा रावत - फूलबाई (फागना), जगनबाई (ख़ुरांच) 

२४ बाला रावत - ब्रह्महा दे (चकबा चौहान), गीताबाई (टाटङ) !

शनिवार, 14 मई 2016

गुर्जर साम्राज्य - Gurjar Empires and Dynasties

                        गुर्जर साम्राज्य / Gurjar Empires

प्राचीन काल मे जब भारत देश का शासक एक राजा होता था शासन प्रणाली का नाम राजतॅत्र था तो वीर गुर्जरो ने एक छत्र और न्याय प्रिय शासन किया । 

जिसमे ये ये गुर्जर साम्राज्य प्रमुख है और गुर्जर इतिहास को समझने के प्रमुख बिंदु भी :

गुर्जर साम्राज्य / Gurjar Empires

1. कुषाण साम्राज्य (0- 375 ई०) | प्रतापी सम्राट - कनिष्क

2. हूण साम्राज्य (490-542 ई०)  | प्रतापी सम्राट - मिहिरकुल

3. प्रतिहार साम्राज्य (650-1036)| प्रतापी सम्राट - मिहिरभोज

• कुषाण साम्राज्य :

" गुर्जर सम्राट कनिष्क " इस काल के सबसे महान सम्राट थे, जिसकी सिमाए उजबेकिस्तान के काला सागर से लेकर भारत मे बंगाल की खाडी तक फैली हुई थी ।

• हूण साम्राज्य  :

हूण वंश के सबसे प्रतापी सम्राट " गुर्जर मिहीरकुल हूण थे, भारतवर्ष मे बौध्द और जैन घर्म के अवसान तथा हिंदु घर्म के पुर्नउत्थान मे मुख्य भूमिका के कारण कल्की अवतार के रूप मे देखा जाता है ।

• गुर्जर प्रतिहार साम्राजय :

नागभट ने 650 ई. मे इस साम्राज्य की नींव रखी थी।

मिहिर भोज इस साम्राजय के सबसे महानत्तम सम्राट हुए । हिंदु घर्म और संस्क्रति की रक्षा करने के कारण इन्हे भगवान विष्णु के अादिवराह अवतार के रूप मे देखा जाता है

समस्त गुर्जर राजाओं ने मिलकर अरबों से भारतीय संस्कृति की रक्षा की थी जिसके कारण उन्हें प्रतिहार (रक्षक) की उपाधी प्रदान की थी। तत्पश्चात समस्त गुर्जर राजा संगठित हो गये और एक राजा को संपूर्ण गुर्जरत्रा (गुर्जरों द्वारा रक्षित क्षेत्र) की कमान दी गयी जिसे गुर्जर सम्राट अथवा गुर्जर-प्रतिहार सम्राट कहा जाता था। गुजरात को गुर्जरदेश और गुर्जरत्रा कहा जाता था| गुजरत्रा मे गुजरात और राजस्थान क्षेत्र आा था। ब्रिटिश काल के प्रारंभ मे राजस्थान के कुछ हिस्सो को राजपुताना कहा गया।

गुर्जरात्रा  = गुर्जर + त्रा (देश) से गुजरात पडा

Gurjaratra / Gurjardesh - गुर्जरात्रा / गुर्जरदेश

इन गुर्जर प्रतिहारों के अधीन कई गुर्जर राजवंश थे। जिनमें मुख्य -

• परमार गुर्जर, 

• चौहान गुर्जर, 

• गुहिल गुर्जर, 

• मौर्य (मोरी) गुर्जर, 

• चंदेल गुर्जर, 

• गुर्जरेश चालुक्य (सोलंकी),

•  तोमर गुर्जर (तंवर),

 • खटाणा गुर्जर (हिंदुशाही राजवंश), 

• चप गुर्जर (चावडा/चपराणा)

• चोल वंश

• मैत्रक वंश

• भाटी वंश

• कलचुरी वंश

• भडाणा गुर्जर 

इत्यादि!

गुर्जर सेना संख्या में अरबों की सेना की सेना के सामने कुछ नहीं थी परंतु गुर्जरों ने गुर्जर रणनृत्य कला के जरिये अरबों को कई बार धूल चटाई।

गुर्जर रणनृत्य कला पर आज भी रिसर्च जारी है।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करने के कारण ही गुर्जरों को वीर गुर्जर कहा जाता है।

अरबों को सफलकापूर्वक परास्त करने के कारण ही गुर्जरों को "राष्ट्र रक्षक वीर गुर्जर" कहा गया है।