गुर्जर प्रतिहार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गुर्जर प्रतिहार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 15 जून 2016

सफलता की कुंजी - गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

सफलता की कुंजी - गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

Gurjar Samrat Mihir Bhoj Wallpaper HD

गुर्जर सम्राट मिहीर भोज बहुत पराक्रमी राजा थे, हर युद्ध मे विजय होते थे उनकी बुद्धिमानी के दूर दूर तक चर्चे थे , एक बार उनके दरबार मे एक अरब यात्री सुलेमान आया और राजा से उनकी सफलता का राज पूछा
सुलेमान ने पुछा हे राजन गुर्जेशवर सम्राट आप हमे बतायें कैसे हर काम मे सफल हुआ जा सकता है,कैसे आपने इतने राज्य जीत लिये,सफलता का राज क्या है?

सम्राट भोज ने उनसे कहा आप आज हमारे महल मे आराम किजिये सुबह होने पर आपको सफलता की कुंजी दे दी जायेगी

सुबह होने पर राजमहल के सामने सम्राट ने तीन मिट्टी के ढेर लगवाये और उन्मे तीन चाबिंया(कुंजी) छुपा दी सुलेमान से कहा इस ढेर मे तीन चाबियां छुपी है उन तीनो मे से एक सफलता की कुंजी है आप जायें और ढुंढ ले।

सुलेमान पहले ढेर मे देखने लगा उसे तुरन्त कुंजी मिल गयी वो बहुत खुश हुअा, फिर दुसरे ढेर मे ढुंढने लगा लेकिन बहुत समय लग रहा था कुछ घंटे बाद उसको दुसरी कुंजी भी मिल गयी लेकिन वो थकावट महसूस कर रहा था।

अब बारी तिसरी और अंतिम कुंजी की थी, सुलेमान कुंजी खोजने लगा,  सारा ढेर खत्म होने को आया था लेकिन कुंजी नही मिली,उसने राजा से कहा लगता है यंहा कोई कुंजी नही है राजन, परन्तु गुर्जर सम्राट ने कहा सुलेमान यंही है वो, देखो ढेर मे,  अब सुलेमान थक कर चूर हो चुका था उसने अंतिम बार ढेर को टटोला तभी उसको कुंजी दिखाई दी

सुलेमान ने राजा भोज से पुछा अब बताये कोनसी है इनमे से सफलता की कुंजी

सम्राट मिहीर भोज ने कहा सफलता की तीन कुंजी "भाग्य" " मेहनत" " आत्मविश्‍वास" है साथ मे भाग्य, आत्मविश्‍वास है यही वो तीन है
तुम्हारा "भाग्य" अच्छा था जो तुम्हे पहले ढेर मे कुंजी पहले ही प्रयास मे मिल गयी,दुसरे ढेर मे "मेहनत" थी समय लगा लेकिन मेहनत काम आयी  लेकिन तिसरे ढेर मे भाग्य ने तुम्हारा साथ नही दिया तुम्हे बहुत मेहनत करनी पडी,लेकिन तुम प्रयास करते रहे अंत मे तुम्हे सफलता जरूर मिली तुम्हे विश्वास था के कुंजी मिलेगी जरुर चाहे कितना ही समय लग जाये तुम परेशान थे तुम ने जितने की आस छोड दी थी लेकिन कुंजी वही थी अपने स्थान पर और तुमने मेहनत की "आत्मविश्‍वास" बनाये रखा अधिक मेहनत की अंत मे तुम सफल हुये।

ऎसे ही जिंदगी मे कुछ लोग पहले ही प्रयास मे सफल हो जाते है,कुछ दुसरे प्रयास मे परन्तु कुछ को लक्ष्य के लिये बहुत अ्धिक मेहनत करनी पडती है लेकिन वो भी अंत मे जीत ही जाते है।

इसी तरह राजा मिहीर ने बताया
मै हर युद्ध मे सफल होता हुं
क्युके कुछ राज्य तो मै खेल खेल मे जीत लेता हुं
कुछ बडे राज्य मै अपनी विशाल सेना के कारण जीत लेता हुं
कुछ राज्य मै अपने प्रयासों से जीत लेता हुं
भाग्यवान तो मै हुं ही जो एक राजा के घर जन्म लिया
वीर तो मै हुं ही जो गुर्जरी मां का दुध पीया
देशभक्ति तो मेरे रक्त मे है जो गुर्जर देश का इतना विस्तार किया।

सुलेमान ने अपने अरब देश जाकर अरब शासको को चेताया के उस महान राजा से मत टकराये अन्यथा मुंह की खानी पडेगी
सुलेमान ने अपनी पुस्तकों मे गुर्जर सम्राट का गुणगान किया।

सोमवार, 13 जून 2016

राष्ट्ररक्षक वीर गुर्जर - सम्राट मिहिर भोज गुर्जर प्रतिहार

राष्ट्ररक्षक वीर गुर्जर  - सम्राट मिहिर भोज गुर्जर प्रतिहार

Gurjar Samrat Mihir Bhoj | गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

गुर्जर प्रतिहार राजाओ द्वारा अरब के प्रबल विरोध का ही ये परिणाम था कि रेगिस्तान प्रायद्वीप से निकल कर एक झपाटै मे पशिच्म मे सूदूर स्पेन तक इस्लामी साम्राज्य का विस्तार कर डालने वाली विश्व विजयनी अरब सेनाओ को भारत मे सिंध मे आकर थम जाना पडा ओर अगले तीन सो वर्षो तक वे इस प्रदेश मे सफलता न पा सकी ।
प्रतिहार गुर्जरो का समस्त राष्ट्र ऋणी है क्योकि उन्होंने भारत की सकंट काल मे रक्षा की ।
अब सिंध मे अरबो का अधिकार केवल मन्सूरा ओर मुल्तान इन दो स्थानो पर ही रह गया । जंहा पर उन्होने गुर्जर सम्राट के आक्रमणों से बचने के लिये "अल महफूज " नामक रक्षा -प्रकार बनवाये थे। ओर उन्ही मे छिपकर गुर्जरो के हमलो से अपनी रक्षा करते थे।इन दोनो स्थानो को छोडकर शेष समस्त सिंध गुर्जर साम्राज्य मे मिला लिया गया था ।
इसके लिये गुर्जेशवर सम्राट ने सैनिक अभियान भेजकर अरब सेनाओ को पराजित किया । सिंध का अरब शासक शासक इमरान -बिन-मूसा गुर्जरो की सेनाओ से पूरी तरह पराजित हुआ ओर इस प्रकार गुर्जर साम्राज्य की सीमाऐ सिंधु नदी से सैकडो मील पश्चिम तक पहुंच गयी थी । इस प्रकार भारत अगली शताब्दीयो तक अरब आक्रमणों से मुक्त हो गया ।
गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का राज्य काबुल से रांची व आसाम तक हिमालय से नर्मदा नदी व आंध्र तक, काठियावाड से बगांल तक सुदृढ सुसंगठित ओर धन - धान्य पूर्ण था ।

• संदर्भ :
हरियाणा के प्राचीन लक्षण स्थान, स्वामी ओउमानन्द सरस्वती -- पृष्ठ - 93


• Free Download HD Wallpapers of Gurjar Samrat Mihir Bhoj :

Gurar Kings Wallpaper | Gujjar Wallpaper | Gurjar Images | Rulers Wallpaper | Ancient | Mihir Bhoj Images | Mihir Bhoj Wallpapers | Gurjar Pratihar Wallpapers | Gurjara | 

Gurjar Samrat Mihir Bhoj Wallpapers 
Gurjar Samrat Mihir Bhoj Hd kings Wallpapers 

Gurjar Samrat Mihir Bhoj Hd kings Wallpapers 

Gurjar Samrat Mihir Bhoj Hd kings Wallpapers 
Gurjar Samrat Mihir Bhoj Hd kings Wallpapers


Gurjar Samrat Mihir Bhoj Hd kings Wallpapers

Gurjar Samrat Mihir Bhoj Hd kings Wallpapers






बुधवार, 1 जून 2016

गुर्जर रणनृत्य कला | Gurjar War-Dance Art

गुर्जर रण नृत्य कला - Gurjar War Dance Art

गुर्जर रणनृत्य कला का इतिहास । Gurjar War Dance Art

भडौच के गुर्जर प्रतिहार, वल्लभी के गुर्जर मैत्रक, वातापी के चालुक्य, भीनमाल के चपराणे, चित्तौड के मोरी, अजमेर के चेची व फिर चौहान, भटनेर के भाटी , बयाना के भडाणा , दिल्ली के तंवर ,जालौर के प्रतिहार, वेंगी के चालुक्य ये सब गुर्जरो की शाखाए केवल गुर्जरत्रा तक सीमित थी। इन सबमें केवल बादामी के गुर्जर चालुक्य साम्राज्य के स्वामी थे।
वह काल विश्व इतिहास में उथल पुथल का था, संस्कृति व सभ्यताओ पर अतिक्रमण का था।
अरब से उठने वाली इस्लामिक लपटो ने बहुत सी संस्कृतियो व सभ्यताओ को निगल कर उन स्थानो को इस्लामिक रंग में रंग दिया था। यह सब ज्यादातर तलवार व भय के बल पर हो रहा था। जो काम इसाइयो ने सदियो पहले यूरोप में किया था वहीं काम एशिया में अरब के खलीफा कर रहे थे।
अरब ने ईरान की विश्वप्रसिद्ध सभ्यता का खात्मा करके नया ईरान गढ दिया था, वहाँ के कुछेक पारसियो ने पलायन करके भारत में शरणागत होकर अपनी बेहद प्राचीन संस्कृति को लुप्त होने से बचा लिया।
इराक की महान सभ्यता अब इस्लामिक संस्कृति का केन्द्र बन गयी थी।
मिस्त्र की सभ्यता अब बदल गयी थी, तुर्की कबीले इस्लाम के नये सिपाहसलार थे, कुवैत,लीबिया पूरा का पूरा मध्य एशिया इस्लामिक संस्कृति में रंगता जा रहा था व अरब के खलीफा एक नये साम्राज्य के मालिक बन गये थे जो जिधर को रूख करता वहाँ की प्राचीन सभ्यता व विरासत को नष्ट करके नया रंगरूप दे देते।
बर्बरता,नरसंहार,बलात्कार,मारकाट,हाहाकार ये सब ही दिखाई देता था एशिया महाद्वीप में।
जो भी इस्लाम स्वीकारता वहीं एक नया युद्ध छेड देता किसी अन्य देश के खिलाफ जैसे कि तुर्की, मंगोल व अफगानिस्तान उदाहरण हैं।
खलीफाओ ने अरबी साम्राज्य को बेहद बडा व मजबूक बनाने के बाद आखिरकार भारत की ओर रूख किया। अरबी साम्राज्य बहुत ही बडा व संसाधनो से परिपूर्ण हो गया था। कई देश इसके अन्दर थे। अरबी सैनिको की वेशभूषा अस्त्र शस्त्रो से लैस थी वे हर प्रकार के हथियारो से शत्रु पर आक्रमण करते थे। लाखो की संख्या में सैनिक, बहुत से सैनिक दल, हजारो घुडसवार सब तरह की सैन्य शक्तियाँ अरबो के पास थी। यूरोप भी घुटने टेक रहा था तुर्की सैन्यदल के सामने। सब का लक्ष्य एक ही था।
भारत सदा से ही एक उत्सुकता का केन्द्र व पहेली की तरह रहा है जिसे हर कोई जानना समझना चाहता है।
अरबी यौद्धा किसी भी प्रकार से भारत को जीतना चाहते थे व बुतपरस्ती को खत्म करके इस्लामिक देश बनाना चाहते थे।
भारत पर आक्रमण केवल पश्चिमोत्तर भूमि से किया जा सकता है जहाँ राजस्थान व गुजरात व दूर चलकर पंजाब है। गुजरात व राजस्थान को तब गुर्जरत्रा यानी गुर्जरदेश कहा जाता था जिसकी रक्षा का दायित्व वीर गुर्जरो पर था। ये इन्हीं की भूमि कही जाती थी।
अरबो की विशाल आँधी के सामने कुछ हजार वीर गुर्जर अपने रणनृत्य का प्रदर्शन करते हुए भिडे जिसे इतिहास राजस्थान के युद्ध जोकि गुर्जरो व अरबो के बीच हुए के नाम से जानता है। ये एक दो युद्ध नहीं बल्कि युद्धो की पूरी लम्बी श्रंखला थी जो सैकडो वर्षो तक वीर गुर्जरो व अरब आक्रान्ताओ के बीच चली। जिसमें गुर्जरो ने अभूतपूर्व साहस व पराक्रम दिखाते हुए अरबो को बाहर खदेडा । भारत की हजारो साल से बनने वाली सभ्यता व संस्कृति को अरबो द्वारा होने वाली हानि से गुर्जरो ने बचाया व लगभग साढे तीन सौ सालो तक गुर्जर भारत के रक्षक व प्रहरी बने रहे । प्रतिहार यानी रक्षक/द्वारपाल।
इन आरम्भिक युद्धो में वीर गुर्जरो का नेतृत्व गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रतिहार प्रथम ने किया । नागभट्ट के नेतृत्व में चित्तौड के मोरी गुर्जर, बादामी के चालुक्य गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य ,चौहाण गुर्जर ,भडाणा गुर्जर , मैत्रक गुर्जर सबने अरबो को हर बार बुरी तरह हर बार पराजित किया।
गुर्जर सम्राट नागभट्ट ने अरबी आक्रमण से होने वाली उथल पुथल व अस्त व्यस्तता का अवसर उठाते हुए बहुत से राज्यो को अपने अधीन करके गुर्जर साम्राज्य की स्थापना की।
गुर्जर सम्राट नागभट्ट ने उज्जैन को नयी राजधानी बनाया। नागभट्ट ने भारतीय संस्कृति व सभ्यता के लिये जो किया वह अतुलनीय है। इसीलिये इन्हें राष्ट्रनायक की उपाधि से विभूषित किया जाता है। राष्ट्र रक्षक वीर गुर्जर यह कथन उन्हीं के कारण चरितार्थ हुआ। इसी समय गुर्जरो ने एक नये युद्धनृत्य की रचना की जिसे गुर्जर रणनृत्य कहा जाता है। गुर्जरो के संख्या बल में कम होने के कारण व शत्रुओ की विशाल सेना से भिडने से पूर्व यह नृत्य किया जाता था जिससे शत्रु को भ्रम होता था कि गुर्जर सेना बहुत अधिक है।
बाद में गुर्जर प्रतिहार वंश में कई बेहद प्रतापी व पराक्रमी शासक हुए जैसे कि गुर्जर सम्राट वत्सराज, गुर्जर सम्राट नागभट्ट द्वितीय, आदिवराह गुर्जर सम्राट मिहिरभोज महान, गुर्जर सम्राट महेन्द्रपाल, गुर्जर सम्राट महिपाल प्रथम आदि।
गुर्जर सम्राट नागभट्ट का नाम सदा भारतीय संस्कृति संरक्षण के लिये याद किया जाता रहा रहेगा।
वे भारतीय इतिहास के महान यौद्धा व शासक थे।
यह 730 ई० के काल की बात है।

मंगलवार, 31 मई 2016

तेली मंदिर का इतिहास - गुर्जर सम्राट मिहिर भोज | History of Teli Mandir of Gurjar Samrat Mihir Bhoj

गुर्जर प्रतिहार शैली के तेली मंदिर का इतिहास 

तेली मंदिर | ग्वालियर | गुर्जर सम्राट मिहिर भोज । गुर्जर प्रतिहार राजवंश । 

TeliTemple in the reign of Gurjar Samrat Mihir Bhoj of Gurjar Pratihar Empire.



इस मंदिर का निर्माण गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के सबसे प्रतापी शासक गुर्जर सम्राट मिहिरभोज के शासन काल मे तेल के व्‍यापार धन से हुआ था। तेल के व्यापीरीयों को समर्पित यह मंदिर तेली का मंदिर कहलाता है।तेल व्यापारी से संबंधित एक कहावत बहोत ही मशूहर है। कहा राजा भोज कहां गंगु तेली ग्‍वालियर किले पर स्थित समस्‍त स्‍मारकों में यह मंदिर सबसे उंचा है। इसकी उंचाई करीब 30 मीटर है। मंदिर की भवन योजना में गर्भग्रह तथा अंतराज प्रमुख हैं। इसमें प्रवेश के लिए पूर्व पूर्व की ओर से सीढियां हैं। मंदिर की एक विशेषता इसकी गजपृष्‍टाकार छत है, जोकि द्रविड शैली में बनी हुई है। उत्‍तर भारत में यह भवन निर्माण कला विरले ही देखने को मिलती है। मंदिर की साज सज्‍जा विभिन्‍न उत्‍तर भारतीय मंदिरों की साज सज्‍जा के समान है। इसकी बाहरी दीवारें विभिन्‍न प्रकार की मूर्तिकला से सुसज्ज्जित हैं। अत: इस मंदिर में उत्‍तर भारतीय एवं दक्षिण भारतीय वास्‍तुकला का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। मंदिर के पूर्वी भाग में निर्मित दो मंडपकिाएं एवं प्रवेश द्वार सन 1881 में अंग्रेजों के शासन काल में मेजर कीथ द्वारा बनवाए गए थे।


Teli Mandir in 1881

समूचे उत्तर भारत में द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का समन्वय यहीं ग्वालियर किले पर तेली मंदिर के रूप में देखने को मिलता है । लगभग सौ फुट की ऊंचाई लिये किले का यह सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्राचीन मंदिर है। गंगोलाताल के समीप बना यह मंदिर विशाल जगती पर स्थापित है । शिखर ऊपर की संकरा एवं बेलन की तरह गोलाई लिये हुये है । मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है । भीतर आयताकार गर्भगृह में छोटा मंडप है । निचले भाग में 113 लघु देव प्रकोष्ठ हैं जिनमें देवी-देवताओं की मान्य प्रतिमाएें थीं । मंदिर के चारों ओर की बाह्य दिवारों पर विभिन्न आकार प्रकार के पशु-पक्षी, फूल-पत्ते, देवी-देवताओं की अलंकृत आकृतियां हैं । कहीं-कहीं आसुरी शक्तियों वाली आकृतियां एवं प्रणय मुद्रा में प्रतिमाएॅ भी अंकित हैं । प्रवेश द्वार के एक तरफ कछुए पर यमुना व दूसरी तरफ मकर पर विराजमान गंगा की मानवाकृतियां हैं । आर्य द्रविड़ शैली युक्त इस मंदिर का वास्तुशिल्प अद्वितीय है । मंदिर के शिखर के दोनों ओर चैत्य गवाक्ष बने हैं तथा मंदिर के अग्रभाग में ऊपर की ओर मध्य में गरूढ़ नाग की पूंछ पकड़े अंकित है ।
उत्तर भारतीय अलंकरण से युक्त इस मंदिर का स्थापत्य दक्षिण द्रविड़ शैली का है । वर्तमान में इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है । पर दरअसल यह एक विष्णु मंदिर था । कुछ इतिहासकार इसे शैव मंदिर मानते हैं । सन 1231 में यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था । तब 1881–1883 ई. के बीच अंग्रेज हुकमरानों ने मंदिर के पुरातात्विक महत्व को समझते हुये मेजर कीथ के निर्देशन में किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल(मंदिर)के साथ-साथ तेली का मंदिर का भी सरंक्षण करवाया था । मेजर कीथ ने इधर-उधर पड़े भग्नावशेषों को संजोकर तेली मंदिर के समक्ष विशाल आकर्षक द्वार भी बनवा दिया । द्वार के निचले हिस्से में लगे दो आंग्ल भाषी शिलालेखों में संरक्षण कार्य पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया है।
Teli Mandir of Gwalior | Gurjar Samrat Mihir Bhoj

वर्तमान में मंदिर का केवल पूर्वी प्रवेश द्वार है। मूल मंदिर को दिल्ली के सुलतानों के शासन काल में ध्वस्त कर दिया गया था । हालांकि बाद में ब्रिटिश काल में हुये मरम्मत से मंदिर का मूल स्वरूप नष्ट हो गया है, फिर भी मेजर कीथ मंदिरों के संरक्षण कार्य का बीड़ा उठाने के लिये प्रसंशा के पात्र हैं ।

रविवार, 29 मई 2016

गुर्जर प्रतिहार कालीन ओसियां जैन मंदिर | Oshiya Jain Temple of Gurjar Pratihar Dynasty

गुर्जर प्रतिहार कालीन - ओसियां जैन मंदिर


गुर्जर प्रतिहार कालीन - ओसियां जैन मंदिर । Gurjar pratihar's - Oshiya Jain Temple


जोधपुर से 65 किलोमीटर दूर औसियाँ जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन मंदिरों का निर्माण गुर्जर प्रतिहार शासकों द्वारा करवाया गया था।

गुर्जर सम्राट वत्सराज प्रतिहार (778-794 ईस्वी) के समय निर्मित महावीर स्वामी का मंदिर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है, इसके अतिरिक्त सच्चिया माता का मंदिर, सूर्य मंदिर, हरीहर मंदिर इत्यादि गुर्जर प्रतिहार कालीन स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। ये मंदिर गुर्जर प्रतिहार शैली में निर्मित है।

ओसियां ​​(Osiyan) एक प्राचीन पश्चिमी भारत में राजस्थान के जोधपुर जिले राज्य में स्थित शहर है। यह थार रेगिस्तान में नखलिस्तान की है, और अपने मंदिरों के लिए "राजस्थान का खजुराहो" के रूप में जाना जाता रहा है। शहर में एक पंचायत गांव और ओसियां ​​तहसील का मुख्यालय भी है। यह जोधपुर में जिला मुख्यालय के उत्तर में सड़क मार्ग से 69 किमी (43 मील) निहित है, मुख्य जोधपुर से दूर एक मोड़ पर - बीकानेर राजमार्ग।

ओसियां ​​को गुर्जर प्रतिहार शैली के 8वी से 11 वीं सदी के टूटे मंदिरों के घर के रूप में प्रसिद्ध है। शहर गुर्जर प्रतिहार राजवंश के दौरान मारवाड़ के राज्य का एक प्रमुख धार्मिक केंद्र था। समूह में 18 मंदिरों में से,
* सूर्य या सूर्य मंदिर
* काली मंदिर,
* सच्चियाय माता मंदिर
* और मुख्य जैन महावीर को समर्पित एक मंदिर उनकी कृपा और वास्तुकला में बाहर खड़ा है।

ये शहर के एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। इस स्थिति को बनाए रखा, सैकड़ों साल के लिए हिंदू धर्म और जैन धर्म का प्रमुख केंद्र रहा। यह शहर अचानक खत्म हो गया जब 1195 में गौर के मोहम्मद की सेनाओं द्वारा हमला किया गया था।






Osiya Jain Temples, Rajasthan















गुर्जर प्रतिहार कालीन ओसियां जैन मंदिर | Oshiya Jain Temple of Gurjar Pratihar Dynasty

गुर्जर प्रतिहार कालीन - ओसियां जैन मंदिर


गुर्जर प्रतिहार कालीन - ओसियां जैन मंदिर । Gurjar pratihar's - Oshiya Jain Temple


जोधपुर से 65 किलोमीटर दूर औसियाँ जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन मंदिरों का निर्माण गुर्जर प्रतिहार शासकों द्वारा करवाया गया था।

गुर्जर सम्राट वत्सराज प्रतिहार (778-794 ईस्वी) के समय निर्मित महावीर स्वामी का मंदिर स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है, इसके अतिरिक्त सच्चिया माता का मंदिर, सूर्य मंदिर, हरीहर मंदिर इत्यादि गुर्जर प्रतिहार कालीन स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। ये मंदिर गुर्जर प्रतिहार शैली में निर्मित है।

ओसियां ​​(Osiyan) एक प्राचीन पश्चिमी भारत में राजस्थान के जोधपुर जिले राज्य में स्थित शहर है। यह थार रेगिस्तान में नखलिस्तान की है, और अपने मंदिरों के लिए "राजस्थान का खजुराहो" के रूप में जाना जाता रहा है। शहर में एक पंचायत गांव और ओसियां ​​तहसील का मुख्यालय भी है। यह जोधपुर में जिला मुख्यालय के उत्तर में सड़क मार्ग से 69 किमी (43 मील) निहित है, मुख्य जोधपुर से दूर एक मोड़ पर - बीकानेर राजमार्ग।

ओसियां ​​को गुर्जर प्रतिहार शैली के 8वी से 11 वीं सदी के टूटे मंदिरों के घर के रूप में प्रसिद्ध है। शहर गुर्जर प्रतिहार राजवंश के दौरान मारवाड़ के राज्य का एक प्रमुख धार्मिक केंद्र था। समूह में 18 मंदिरों में से,
* सूर्य या सूर्य मंदिर
* काली मंदिर,
* सच्चियाय माता मंदिर
* और मुख्य जैन महावीर को समर्पित एक मंदिर उनकी कृपा और वास्तुकला में बाहर खड़ा है।

ये शहर के एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। इस स्थिति को बनाए रखा, सैकड़ों साल के लिए हिंदू धर्म और जैन धर्म का प्रमुख केंद्र रहा। यह शहर अचानक खत्म हो गया जब 1195 में गौर के मोहम्मद की सेनाओं द्वारा हमला किया गया था।






Osiya Jain Temples, Rajasthan