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बुधवार, 15 जून 2016

सफलता की कुंजी - गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

सफलता की कुंजी - गुर्जर सम्राट मिहिर भोज

Gurjar Samrat Mihir Bhoj Wallpaper HD

गुर्जर सम्राट मिहीर भोज बहुत पराक्रमी राजा थे, हर युद्ध मे विजय होते थे उनकी बुद्धिमानी के दूर दूर तक चर्चे थे , एक बार उनके दरबार मे एक अरब यात्री सुलेमान आया और राजा से उनकी सफलता का राज पूछा
सुलेमान ने पुछा हे राजन गुर्जेशवर सम्राट आप हमे बतायें कैसे हर काम मे सफल हुआ जा सकता है,कैसे आपने इतने राज्य जीत लिये,सफलता का राज क्या है?

सम्राट भोज ने उनसे कहा आप आज हमारे महल मे आराम किजिये सुबह होने पर आपको सफलता की कुंजी दे दी जायेगी

सुबह होने पर राजमहल के सामने सम्राट ने तीन मिट्टी के ढेर लगवाये और उन्मे तीन चाबिंया(कुंजी) छुपा दी सुलेमान से कहा इस ढेर मे तीन चाबियां छुपी है उन तीनो मे से एक सफलता की कुंजी है आप जायें और ढुंढ ले।

सुलेमान पहले ढेर मे देखने लगा उसे तुरन्त कुंजी मिल गयी वो बहुत खुश हुअा, फिर दुसरे ढेर मे ढुंढने लगा लेकिन बहुत समय लग रहा था कुछ घंटे बाद उसको दुसरी कुंजी भी मिल गयी लेकिन वो थकावट महसूस कर रहा था।

अब बारी तिसरी और अंतिम कुंजी की थी, सुलेमान कुंजी खोजने लगा,  सारा ढेर खत्म होने को आया था लेकिन कुंजी नही मिली,उसने राजा से कहा लगता है यंहा कोई कुंजी नही है राजन, परन्तु गुर्जर सम्राट ने कहा सुलेमान यंही है वो, देखो ढेर मे,  अब सुलेमान थक कर चूर हो चुका था उसने अंतिम बार ढेर को टटोला तभी उसको कुंजी दिखाई दी

सुलेमान ने राजा भोज से पुछा अब बताये कोनसी है इनमे से सफलता की कुंजी

सम्राट मिहीर भोज ने कहा सफलता की तीन कुंजी "भाग्य" " मेहनत" " आत्मविश्‍वास" है साथ मे भाग्य, आत्मविश्‍वास है यही वो तीन है
तुम्हारा "भाग्य" अच्छा था जो तुम्हे पहले ढेर मे कुंजी पहले ही प्रयास मे मिल गयी,दुसरे ढेर मे "मेहनत" थी समय लगा लेकिन मेहनत काम आयी  लेकिन तिसरे ढेर मे भाग्य ने तुम्हारा साथ नही दिया तुम्हे बहुत मेहनत करनी पडी,लेकिन तुम प्रयास करते रहे अंत मे तुम्हे सफलता जरूर मिली तुम्हे विश्वास था के कुंजी मिलेगी जरुर चाहे कितना ही समय लग जाये तुम परेशान थे तुम ने जितने की आस छोड दी थी लेकिन कुंजी वही थी अपने स्थान पर और तुमने मेहनत की "आत्मविश्‍वास" बनाये रखा अधिक मेहनत की अंत मे तुम सफल हुये।

ऎसे ही जिंदगी मे कुछ लोग पहले ही प्रयास मे सफल हो जाते है,कुछ दुसरे प्रयास मे परन्तु कुछ को लक्ष्य के लिये बहुत अ्धिक मेहनत करनी पडती है लेकिन वो भी अंत मे जीत ही जाते है।

इसी तरह राजा मिहीर ने बताया
मै हर युद्ध मे सफल होता हुं
क्युके कुछ राज्य तो मै खेल खेल मे जीत लेता हुं
कुछ बडे राज्य मै अपनी विशाल सेना के कारण जीत लेता हुं
कुछ राज्य मै अपने प्रयासों से जीत लेता हुं
भाग्यवान तो मै हुं ही जो एक राजा के घर जन्म लिया
वीर तो मै हुं ही जो गुर्जरी मां का दुध पीया
देशभक्ति तो मेरे रक्त मे है जो गुर्जर देश का इतना विस्तार किया।

सुलेमान ने अपने अरब देश जाकर अरब शासको को चेताया के उस महान राजा से मत टकराये अन्यथा मुंह की खानी पडेगी
सुलेमान ने अपनी पुस्तकों मे गुर्जर सम्राट का गुणगान किया।

शनिवार, 4 जून 2016

आभानेरी की गुर्जर बावडी का इतिहास | Gurjar Bawdi of Abhaneri

आभानेरी की गुर्जर बावडी - शिल्प की स्वर्णनगरी


आभानेरी | गुर्जर बावडी | मिहिर बावडी | चांद बावडी । गुर्जर सम्राट मिहिर भोज | गुर्जर प्रतिहार राजवंश

Gurjar Bawdi , (Mihir Bawdi, Chand Bawdi) of Aabhaneri



शिल्पकला का जीवंत नमूना आभानेरी की गुर्जर बावडी आदिवराह गुर्जर सम्राट मिहिरभोज महान के द्वारा बनायी गई थी। जो दूनिया की सबसे गहरी बावडी है। कला, संस्कृति, इतिहास एवं पर्यटन क्षेत्रों की बात की जाये, तो भारत भूमि का मुकाबला तो दूर, कोई आस-पास भी खडा हुआ नजर नहीं आता। 'अतिथि देवो भवः' सभ्यता वाले हमारे देश में कदम-कदम पर ऐतिहासिक स्थल, विजय स्तम्भ, महल, मीनारें, बावडियाँ, हर स्थल से जुडी पौराणिक गाथा, हर एक स्थान का धार्मिक महत्त्व आदि देखने या सुनने में आता है। इन स्थानों पर लोगों को धर्म से जोडने के लिए अनेकों राजाओं ने मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे एवं अन्य धार्मिक स्थान बनाये हैं। इन धार्मिक-ऐतिहासिक स्थानों की उपस्थिति को अपने मन में बिठाकर लोग एक-दूसरे का सम्मान करते हैं एवं अपने बच्चों को भी इसी तरह की शिक्षा देते हैं।

आभानेरी की गुर्जर बावडी :

आठवी-नवीं शताब्दी में निर्मित इस बावडी का निर्माण गुर्जर प्रतिहार राजवंश के गुर्जर सम्राट मिहिरभोज महान  (जिन्हें आदिवराह व प्रभास भी कहते हैं, गुर्जरेश) ने करवाया था, और उन्हीं के नाम पर इस बावडी को मिहिर बावडी,गुर्जर बावडी,चांद बावडी भी कहा जाता है। दुनिया की सबसे गहरी यह बावडी चारों ओर से लगभग 35 मीटर चौडी है तथा इस गुर्जर बावडी में ऊपर से नीचे तक पक्की सीढियाँ बनी हुई हैं, जिससे पानी का स्तर चाहे कितना ही हो, आसानी से भरा जा सकता है। 13 मंजिला यह बावडी 100 फ़ीट से भी ज्यादा गहरी है, जिसमें भूलभुलैया के रूप में 3500 सीढियाँ (अनुमानित) हैं। इसके ठीक सामने प्रसिद्ध हर्षद माता का मंदिर है। इस बावडी को इतना गहरा इसलिए बनाया गया कि इसमें यदि कोई वस्तु गिर भी जाये, तो उसे वापस पाना असम्भव है।

Mihir Bawdi, (Gurjar Bawdi, Chand Bawdi) - Gurjar Samrat Mihir Bhoj of Gurjar Pratihar Dynasty 

चाँदनी रात में एकदम दूधिया सफ़ेद रंग की तरह दिखाई देने वाली यह बावडी अँधेरे-उजाले की बावडी नाम से भी प्रसिद्ध है। तीन मंजिला इस बावडी में नृत्य कक्ष व गुप्त सुरंग बनी हुई है, साथ ही इसके ऊपरी भाग में बना हुआ परवर्ती कालीन मंडप इस बावडी के काफ़ी समय तक उपयोग में लिए जाने के प्रमाण देता है। इसकी तह तक जाने के लिए 13 सोपान तथा लगभग 1300 सीढियाँ बनाई गई हैं, जो कि कला का अप्रतिम उदाहरण पेश करती हैं। स्तम्भयुक्त बरामदों से घिरी हुई यह बावडी चारों ओर से वर्गाकार है। इसकी सबसे निचली मंजिल पर बने दो ताखों पर महिसासुर मर्दिनी एवं गणेश जी की सुंदर मूर्तियाँ भी इसे खास बनाती हैं। मिहिर बावडी की सुरंग के बारे में भी ऐसा सुनने में आता है कि इसका उपयोग युद्ध या अन्य आपातकालीन परिस्थितियों के समय राजा या सैनिकों द्वारा किया जाता था। लगभग पाँच-छह वर्ष पूर्व हुई बावडी की खुदाई एवं जीर्णोद्धार में भी एक शिलालेख मिला है जिसमें कि राजा चांद ( प्रभास) का उल्लेख मिलता है। गुर्जर बावडी एवं हर्षद माता मंदिर दोनों की ही खास बात यह है कि इनके निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों पर शानदार नक्काशी की गई है, साथ ही इनकी दीवारों पर हिंदू धर्म के सभी 33 करोड देवी-देवताओं के चित्र भी उकेरे गये हैं। बावडी की सीढियों को आकर्षक एवं कलात्मक तरीके से बनाया गया है और यही इसकी खासियत भी है कि बावडी में नीचे उतरने वाला व्यक्ति वापस उसी सीढी से ऊपर नहीं चढ सकता। आभानेरी गुप्त युग के बाद तथा आरम्भिक मध्यकाल के स्मारकों के लिए प्रसिद्ध है जिसके भग्नावशेष विदेशी आक्रमण के हमले में खण्डित होकर इधर-उधर फ़ैले हुए हैं।
Gurjar Samrat Mihir Bhoj of Gurjar Pratihar Empire | गुर्जर सम्राट मिहिर भोज 



मंगलवार, 31 मई 2016

तेली मंदिर का इतिहास - गुर्जर सम्राट मिहिर भोज | History of Teli Mandir of Gurjar Samrat Mihir Bhoj

गुर्जर प्रतिहार शैली के तेली मंदिर का इतिहास 

तेली मंदिर | ग्वालियर | गुर्जर सम्राट मिहिर भोज । गुर्जर प्रतिहार राजवंश । 

TeliTemple in the reign of Gurjar Samrat Mihir Bhoj of Gurjar Pratihar Empire.



इस मंदिर का निर्माण गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के सबसे प्रतापी शासक गुर्जर सम्राट मिहिरभोज के शासन काल मे तेल के व्‍यापार धन से हुआ था। तेल के व्यापीरीयों को समर्पित यह मंदिर तेली का मंदिर कहलाता है।तेल व्यापारी से संबंधित एक कहावत बहोत ही मशूहर है। कहा राजा भोज कहां गंगु तेली ग्‍वालियर किले पर स्थित समस्‍त स्‍मारकों में यह मंदिर सबसे उंचा है। इसकी उंचाई करीब 30 मीटर है। मंदिर की भवन योजना में गर्भग्रह तथा अंतराज प्रमुख हैं। इसमें प्रवेश के लिए पूर्व पूर्व की ओर से सीढियां हैं। मंदिर की एक विशेषता इसकी गजपृष्‍टाकार छत है, जोकि द्रविड शैली में बनी हुई है। उत्‍तर भारत में यह भवन निर्माण कला विरले ही देखने को मिलती है। मंदिर की साज सज्‍जा विभिन्‍न उत्‍तर भारतीय मंदिरों की साज सज्‍जा के समान है। इसकी बाहरी दीवारें विभिन्‍न प्रकार की मूर्तिकला से सुसज्ज्जित हैं। अत: इस मंदिर में उत्‍तर भारतीय एवं दक्षिण भारतीय वास्‍तुकला का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। मंदिर के पूर्वी भाग में निर्मित दो मंडपकिाएं एवं प्रवेश द्वार सन 1881 में अंग्रेजों के शासन काल में मेजर कीथ द्वारा बनवाए गए थे।


Teli Mandir in 1881

समूचे उत्तर भारत में द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का समन्वय यहीं ग्वालियर किले पर तेली मंदिर के रूप में देखने को मिलता है । लगभग सौ फुट की ऊंचाई लिये किले का यह सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्राचीन मंदिर है। गंगोलाताल के समीप बना यह मंदिर विशाल जगती पर स्थापित है । शिखर ऊपर की संकरा एवं बेलन की तरह गोलाई लिये हुये है । मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है । भीतर आयताकार गर्भगृह में छोटा मंडप है । निचले भाग में 113 लघु देव प्रकोष्ठ हैं जिनमें देवी-देवताओं की मान्य प्रतिमाएें थीं । मंदिर के चारों ओर की बाह्य दिवारों पर विभिन्न आकार प्रकार के पशु-पक्षी, फूल-पत्ते, देवी-देवताओं की अलंकृत आकृतियां हैं । कहीं-कहीं आसुरी शक्तियों वाली आकृतियां एवं प्रणय मुद्रा में प्रतिमाएॅ भी अंकित हैं । प्रवेश द्वार के एक तरफ कछुए पर यमुना व दूसरी तरफ मकर पर विराजमान गंगा की मानवाकृतियां हैं । आर्य द्रविड़ शैली युक्त इस मंदिर का वास्तुशिल्प अद्वितीय है । मंदिर के शिखर के दोनों ओर चैत्य गवाक्ष बने हैं तथा मंदिर के अग्रभाग में ऊपर की ओर मध्य में गरूढ़ नाग की पूंछ पकड़े अंकित है ।
उत्तर भारतीय अलंकरण से युक्त इस मंदिर का स्थापत्य दक्षिण द्रविड़ शैली का है । वर्तमान में इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है । पर दरअसल यह एक विष्णु मंदिर था । कुछ इतिहासकार इसे शैव मंदिर मानते हैं । सन 1231 में यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था । तब 1881–1883 ई. के बीच अंग्रेज हुकमरानों ने मंदिर के पुरातात्विक महत्व को समझते हुये मेजर कीथ के निर्देशन में किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल(मंदिर)के साथ-साथ तेली का मंदिर का भी सरंक्षण करवाया था । मेजर कीथ ने इधर-उधर पड़े भग्नावशेषों को संजोकर तेली मंदिर के समक्ष विशाल आकर्षक द्वार भी बनवा दिया । द्वार के निचले हिस्से में लगे दो आंग्ल भाषी शिलालेखों में संरक्षण कार्य पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया है।
Teli Mandir of Gwalior | Gurjar Samrat Mihir Bhoj

वर्तमान में मंदिर का केवल पूर्वी प्रवेश द्वार है। मूल मंदिर को दिल्ली के सुलतानों के शासन काल में ध्वस्त कर दिया गया था । हालांकि बाद में ब्रिटिश काल में हुये मरम्मत से मंदिर का मूल स्वरूप नष्ट हो गया है, फिर भी मेजर कीथ मंदिरों के संरक्षण कार्य का बीड़ा उठाने के लिये प्रसंशा के पात्र हैं ।

बुधवार, 25 मई 2016

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के सिक्के और धन व्यवस्था का इतिहास / Coins of Gurjar Samrat Mihir Bhoj

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के सिक्के और धन व्यवस्था का इतिहास 

Coin of Gurjar Samrat Mihir Bhoj
गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णू के अवतार के तौर पर जाना जाता है।इनके पूर्वज गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और गुर्जर साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।
मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी । इनके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यइनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी
भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में इन्हे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे गुर्जर सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।
विश्व की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें 8,00,000 से  ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिर भोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।
Coins of Gurjar Samrat Mihir Bhoj - Gurjar Pratihar Empire

गुर्जर प्रतिहारोने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है। यहां अनेको गुर्जर राजवंशो ने समयानुसार शासन किया और अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्य चकित किया। भारत देश हमेशा ही गुर्जर प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है कि गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य ने दस्युओं, डकैतों, इराकी,मंगोलो , तुर्कों अरबों से देश को बचाए रखा और
देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।
गुरूकुल झज्जर में रखी हुई है गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के शासन काल की मुद्राएँ।