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बुधवार, 1 मार्च 2017

गुर्जर प्रतिहार हूण हैं , कैसे? - Gurjar Pratihar 's Were Hun origin

गुर्जर प्रतिहार हूण हैं , कैसे?

Mihir Varah Huna Gurjar /मिहिर वराह हूण गुर्जर

जानने के लिये पढे पूरा लेख

गुर्जर-प्रतिहारो की हूण विरासत

(Key Words- Huna, Gurjara, Pratihara, Boar, Varaha, Sun, Mihira, Alakhana, Sassnian fire altar, Gadhiya coin)

इतिहासकार वी ए. स्मिथ1, विलियम क्रुक2 एवं रुडोल्फ होर्नले3 गुर्जर प्रतिहारो को हूणों से सम्बंधित मानते हैं| स्मिथ कहते हैं की इस सम्बन्ध में सिक्को पर आधारित प्रमाण बहुत अधिक प्रबल हैं|4 वे कहते हैं कि हूणों तथा भीनमाल के गुर्जरों, दोनों ने ही सासानी पद्धति के के सिक्के चलाये|5होर्नले गुर्जर-प्रतिहारो को ‘तोमर’ मानते हैं तथा पेहोवा अभिलेख के आधार पर उन्हें जावुला ‘तोरमाण हूण’ का वंशज बताते हैं|6 पांचवी शताब्दी के लगभग उत्तर भारत को विजय करने वाले हूण ईरानी ज़ुर्थुस्थ धर्म और संस्कृति से प्रभावित थे|5 वो सूर्य और अग्नि के उपासक थे जिन्हें वो क्रमश मिहिर और अतर कहते थे| वो वराह की सौर (मिहिर) देवता के रूप में उपासना करते थे|7  हरमन गोएत्ज़  इस देवता को मात्र वराह न कहकर ‘वराहमिहिर’ कहते हैं| मेरा मुख्य तर्क यह हैं कि हूण और प्रतिहारो के इतिहास में बहुत सी समान्तर धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्पराए हैं, जोकि उनकी मूलभूत एकता का प्रमाण हैं| कई मायनो में प्रतिहारो का इतिहास उनकी हूण विरासत को सजोये हुए हैं| प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हूणों से हुई थी तथा उन्होंने हूणों की विरासत को आगे बढाया इस बात के बहुत से प्रमाण हैं|

सबसे पहले हम हूणों के सौर देवता वराह की प्रतिहारो द्वारा उपासना के विषय में चर्चा करेंगे|  भारत में वराह पूजा की शुरुआत मालवा और ग्वालियर इलाके में लगभग 500 ई. में उस समय हुई,8 जब हूणों ने यहाँ प्रवेश किया|  यही पर हमें हूणों के प्रारभिक सिक्के और अभिलेख मिलते हैं| भारत में हूण शक्ति को स्थापित करने वाले उनके नेता तोरमाण के शासनकाल में इसी इलाके के एरण, जिला सागर, मध्य प्रदेश में वराह की विशालकाय मूर्ति स्थापित कराई थी9 जोकि भारत में प्राप्त सबसे पहली वराह मूर्ति हैं| तोरमाण के शासन काल के प्रथम वर्ष का अभिलेख इसी मूर्ति से मिला हैं|10 जोकि इस बात का प्रमाण हैं कि हूण और उनका नेता तोरमाण भारत प्रवेश के समय से ही वाराह के उपासक थे|

पांचवी शातब्दी के अंत में भारत में प्रवेश करने वाले श्वेत हूण ईरानी ज़ुर्थुस्थ धर्म से प्रभावित थे| भारत में प्रवेश के समय हूण वराह की सौर देवता के रूप में उपासना करते थे| इतिहासकार हरमन गोएत्ज़ इस देवता  को वराहमिहिर कहते हैं| गोएत्ज़ कहते हैं, क्योकि हूण मिहिर ‘सूर्य’ उपासक थे, इसलिए वाराह उनके लिए सूर्य के किसी आयाम का प्रतिनिधित्व करता था|11  ईरानी ग्रन्थ ‘जेंदा अवेस्ता’ के ‘मिहिर यास्त’ में कहा गया हैं कि मिहिर ‘सूर्य’ जब चलता हैं तो वेरेत्रघ्न वराह रूप में उसके साथ चलता हैं|12 ईरानी ज़ुर्थुस्थ धर्म में वेरेत्रघ्न ‘युद्ध में विजय’ का देवता हैं| अतः हूणों की वराह पूजा के स्त्रोत ईरानी ग्रन्थ ‘जेंदा अवेस्ता’ के ‘मिहिर यस्त’ तक जाते है|

भारत में हूणों ने शैव धर्म अपना लिया और वे ब्राह्मण धर्म के सबसे कट्टर समर्थक के रूप में उभरे|13 यहाँ तक की बौद्ध चीनी यात्री हेन सांग (629-647 ई.) ने हूण सम्राट मिहिरकुल पर बौधो का क्रूरता पूर्वक दमन करना का आरोप लगाया हैं|14 कल्हण कृत राजतरंगिणी के अनुसार मिहिरकुल हूण ने कश्मीर में मिहिरेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया तथा गंधार क्षेत्र में ब्राह्मणों को 1000 ग्राम दान में दिए|15 जे. एम. कैम्पबेल के अनुसार मिहिरकुल से जुड़ी कहानिया उसे एक भगवान जैसे शक्ति और सफलता वाला, निर्मम, धार्मिक यौद्धा दर्शाती हैं| राजतरंगिणी की प्रशंशा तथा हेन सांग की रंज भरी स्वीकारोक्तिया में यह निहित हैं कि उसे भगवान माना जाता था|16 जैन ग्रंथो में महावीर की मृत्यु के 1000 वर्ष बाद उत्तर भारत में शासन करने वाले ‘कल्किराज़’ के साथ मिहिरकुल के इतिहास में समानता के आधार पर के. बी. पाठक मिहिरकुल को ब्राह्मण धर्म के रक्षक ‘कल्कि अवतार’ के रूप में भी देखते हैं|17 ऐसा प्रतीत होता हैं कि उत्तर भारत की विजय से पूर्व गंधार क्षेत्र में ही हूण ब्राह्मण धर्म के प्रभाव में आ चुके थे क्योकि तोरमाणके सिक्के पर भी भारतीय देवता दिखाई पड़ते हैं| कालांतर में हूणों के ईरानी प्रभाव वाले कबीलाई देवता वराहमिहिर को भगवान विष्णु के वराह अवतार के रूप में अवशोषित कर लिया गया|18 अतः तोरमाण द्वारा एरण में स्थापित वाराह की विशालकाय मूर्ति से प्राप्त उसके शासन काल के प्रथम वर्ष का अभिलेख वराह अवतार की स्तुति से प्रारम्भ होता हैं|

 हूणों के नेता तोरमाण की भाति महानतम गुर्जर-प्रतिहार सम्राट भोज वराह का उपासक था|  भोज के अनेक ऐसे सिक्के प्राप्त हुए हैं जिन पर वराह उत्कीर्ण है|19 भोज ने आदि वराह की उपाधि धारण की थी20, संभवतः वह वराह अवतार माना जाता था |  गुर्जर प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज में भी वराह की पूजा होती थी और वहा वराह मंदिर भी था| अधिकतर वराह मूर्तिया, विशेषकर वो जोकि विशुद्ध वाराह जानवर जैसी हैं, गुर्जर-प्रतिहारो के काल की हैं| 21तोरमाण हूण द्वारा एरण में स्थापित वाराह मूर्ति भी विशुद्ध जानवर जैसी हैं|

ब्राह्मणों के प्रभाव में हूण और उनके वंशज गुर्जर-प्रतिहार वराह को विष्णु अवतार के रूप में देखने लगे| वराह अवतार को मुख्य रूप से हूणों और गुर्जर-प्रतिहारो से जोड़ा जाना चाहिए|22 उत्तर भारत में वाराह अवतार की अधिकतर मूर्तिया 500-900 ई. के मध्य की हैं, जोकि हूणों और गुर्जर प्रतिहारो का काल हैं|23

गुर्जर-प्रतिहारो द्वारा हूणों के उपनाम ‘वराह’ का प्रयोग एक अन्य परंपरा हैं जो उनके हूण सम्बंध की तरफ एक स्पष्ट संकेत हैं| वराह जंगली सूअर को कहते हैं| पांचवी शताब्दी में मध्य एशियाई हूणों की एक शाखा ने ज़हां यूरोप पर आक्रमण किया. वही अन्य शाखा ने ईरान को पराजित कर भारत में प्रवेश किया| यूरोप में वाराह को हूणों का पर्याय माना जाता हैं|यूरोप में वराह को हूणों की शक्ति और साहस का प्रतीक समझा जाता हैं| 24 रोमानिया और हंगरी में वाराह की विशालकाय प्रजाति को आज भी “अटीला” पुकारते हैं|25“अटीला” (434-455 ई.) हूणों के उस दल का नेता था,जिसने पांचवी शताब्दी में रोमन साम्राज्य को पराजित कर यूरोप में तहलका मचा दिया था|26  यूरोप के बोहेमिया देश में हूणों से सम्बंधित एक प्राचीन राजपरिवार का नाम ‘बोयर’ हैं| 27 ‘बोयर’ का अर्थ हैं वराह जैसा आदमी| 28

तबारी ने श्वेत हूणों और तुर्कों के बीच हुए युद्ध का वर्णन किया हैं| तबारी के अनुसार श्वेत हूणों के अंतिम शासक का नाम वराज था|29 गफुरोव का मानना हैं कि ‘वराज़’ पूर्वी ईरान के शासको की उपाधि थी|30 मेस्सोन ने ‘वराज’ का अनुवाद ईरानी भाषा में ‘जंगली सूअर’ किया हैं|31

भारत मे भी हूणों के लिए वराह शब्द का प्रयोग हुआ हैं|अलबरूनी ने काबुल के तुर्क शाही वंश का संस्थापक बर्हतेकिन को बताया हैं|32  बर्हतेकिन बराह तेगिन का अरबी रूपांतरण प्रतीत होता हैं| छठी शताब्दी में भारत आये चीनी यात्री सुंग युन के के विवरण के आधार पर पर कहा जा सकता हैं कि तेगिन हूणों की एक उपाधि थी, तथा भारतीय सन्दर्भ में ‘तेगिन’ उपाधि पहले श्वेत हूण शासक ने धारण की थी|33 यह उपाधि हूण उपशासक द्वारा धारण की जाती थी जोकि प्रायः हूण शासक का भाई या पुत्र होता था|34 बराह हूण शासक का नाम हैं या उपाधि कहना मुश्किल हैं| किन्तु भारत में हूणों शासक के लिए बराह नाम के प्रयोग का यह एक उदहारण हैं|

काबुल में तुर्क शाही वंश के संस्थापक बराह तेगिन के बाद भारत में गुर्जर-प्रतिहार सम्राटो को वराह कहा गया हैं| गुर्जर-प्रतिहार सम्राट भोज की उपाधि “वराह” थी|  भोज महान के “वराह” चित्र वाले चांदी के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिन पर वराह चित्र के साथ आदि वराह अंकित हैं|35 अरबी  यात्री अल मसूदी (916 ई.) ने ‘मुरुज-उल-ज़हब’ नामक ग्रन्थ में  गुर्जर-प्रतिहार सम्राटों को “बौरा” यानि “वराह” कहा हैं36 अतः वराह हूणों की भाति गुर्जर-प्रतिहारो का भी उपनाम था| अरबी इतिहासकारों द्वारा गुर्जर-प्रतिहारो के लिए प्रयुक्त ‘बौरा’ तथा बोहेमिया मे हूण राजपरिवार के लिए प्रयुक्त बोयर में भी एक साम्यता हैं|

हूण सम्राट मिहिर कुल, गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज और आधुनिक गुर्जरों द्वारा मिहिर उपाधि का प्रयोग एक और इनके बीच की सांझी परंपरा हैं जोकि इन सबकी मूल भूत एकता का प्रमाण हैं| मिहिर ईरानी शब्द हैं जोकि सूर्य का पर्यायवाची हैं|37 हूण ‘मिहिर’ के उपासक थे|38 हूणों की उपाधि ‘मिहिर’थी| हूण सम्राट मिहिर कुल (502-542 ई.) का वास्तविक नाम गुल था तथा मिहिर उसकी उपाधि थी| कास्मोस इंडिकोप्लेस्टस ने तत्कालीन ‘क्रिस्चन टोपोग्राफी’ नामक ग्रन्थ में उसे ‘गोल्लस’ लिखा गया हैं|39 अतः उसे मिहिर गुल कहा जाना अधिक उचित हैं|40 कंधार क्षेत्र के ‘उरुजगन’ नामक स्थान से प्राप्त एक शिलालेख पर मिहिरकुल हूण को सिर्फ ‘मिहिर’ लिखा गया हैं|41

गुर्जर-प्रतिहार सम्राट भोज महान (836- 885 ई.) की सागरताल एवं ग्वालियर अभिलेखों से ज्ञात होता हैं कि उसने ने ‘मिहिर’ उपाधि भी धारण की थी|42 , इसलिए उसे आधुनिक इतिहासकार मिहिर भोज कहते हैं, अन्यथा सामान्य तौर पर उसे सिर्फ भोज कहा गया हैं|

‘मिहिर’ आज भी राजस्थान और पंजाब में गुर्जरों सम्मानसूचक उपाधि हैं|43 गुर्जरों ने मिहिर उपाधि अपने हूण पूर्वजों से विरासत में प्राप्त की हैं|

गुर्जर प्रतिहारो की हूण विरासत का एक अन्य प्रमाण हूण शासको के पारावारिक नाम ‘अलखान’ का नवी शताब्दी के गुर्जर शासको द्वारा धारण करना हैं| राजतरंगिणी के अनुसार पंजाब के शासक ‘अलखान’ गुर्जर का युद्ध कश्मीर के राजा शंकर वर्मन (883- 902 ई.) के साथ हुआ था| यह अलखान गुर्जर कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का मित्र अथवा सामंत था| खिंगिल, तोरमाण, मिहिरकुल, आदि हूण शासको के सिक्को पर बाख्त्री भाषा ‘अलकोन्नो’ अंकित है|44 | हरमट के अनुसार इसे ‘अलखान’ पढ़ा जाना चाहिए| अलार्म के अनुसार ‘अलखान’ इन हूण शासको की क्लेन का नाम हैं|45 बिवर के अनुसार मिहिरकुल का उतराधिकारी  ‘अलखान’ था| 46 हरमट के अनुसार हूण के सिक्को पर बाख्त्री में ‘अलखान’ वही नाम हैं जोकि कल्हण की राजतरंगिणी में उल्लेखित गुर्जर राजा का हैं|47 हूण सम्राट मिहिरकुल की राजधानी ‘स्यालकोट’ तक्क देश आदि क्षेत्र अलखान गुर्जर के राज्य का अंग थे| ऐसा प्रतीत होता हैं कि भारत में हूण साम्राज्य के पतन के बाद भी पंजाब में इस परिवार की शक्ति बची रही तथा वहां का शासक अलखान गुर्जर तोरमाण और मिहिरकुल के परिवार से सम्बंधित था| इस प्रकार गुर्जर प्रतिहारो का अप्रत्यक्ष सम्बंध तोरमाण और मिहिरकुल के घराने से बना हुआ था|

अंत में गुर्जर प्रतिहारो और हूण सिक्को में समानता पर चर्चा आवश्यक हैं क्योकि मुख्य रूप से इसी आधार पर गुर्जरों को हूणों से जोड़ कर देखा गया| हूणों के बहुत से सिक्के हमें प्राप्त हुए हैं जिन पर ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं|48 जोकि उनके ‘अतर” यानि अग्नि उपासक होने का प्रमाण हैं| ‘सासानी’ ईरानी ढंग की अग्निवेदिका लगभग दो से चार फुट ऊँची प्रतीत होती हैं, जिसके समीप खड़े होकर आहुति दी जाती हैं| अग्निवेदिका के समक्ष उसकी रक्षा के लिए दो अग्निसेविका खड़ी दर्शाई गई हैं|
मिहिर कुल हूण का सिक्का- ऊपर की तरफ मिहिर कुल का चित्र तथा दूसरी तरफ सासानी  ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं|

प्रतिहार वंश को भीनमाल राज्य से सम्बंधित मानते हैं|49भीनमाल की चर्चा हेन सांग (629-645 ई.) ने सी. यू. की नामक ग्रन्थ में ‘गुर्जर देश’ की राजधानी के रूप में की हैं|50नक्षत्र विज्ञानी ब्रह्मगुप्त की पुस्तक ब्रह्मस्फुत सिधांत के अनुसार भीनमाल चाप वंश के व्याघ्रमुख का शासन था|51व्याघ्रमुख का एक सिक्का प्राप्त हुआ हैं, इस पर भी ‘सासानी’ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं| वी. ए स्मिथ ने इस सिक्के की पहचान श्वेत हूणों के सिक्के के रूप में की थी, तथा  इस विषय पर एक शोध पत्र लिखा जिसका शीर्षक हैं“व्हाइट हूण कोइन ऑफ़ व्याघ्रमुख ऑफ़ दी चप (गुर्जर) डायनेस्टी ऑफ़ भीनमाल”|52 एक जैन लेखक के अनुसार ‘गदहिया सिक्के’ भीनमाल से ज़ारी किये गए थे|53 ये सिक्के हूणों के सिक्को का अनुकरण हैं तथा उन पर भी ‘सासानी’ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं| गदहिया सिक्को का सम्बन्ध गुर्जरों से रहा हैं तथा इनके द्वारा शासित पश्चिमी भारत में शताब्दियों, विशेषकर सातवी से लेकर दसवी शताब्दी, तक भारी प्रचलन में रहे हैं|54मिहिर भोज का सिक्का- ऊपर की तरफ मिहिर भोज वराह रूप में विजयी मुद्रा में तथा सूर्य चक्र, दूसरी तरफ ऊपर श्री मद आदि वराह लिखा हैं तथा नीचे सासानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं|

प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज के सिक्को पर एक तरफ वराह अवतार का चित्र उत्कीर्ण हैं| इन सिक्को के दूसरी तरफ आदि वराह’ अंकित हैं55 तथा ‘सासानी’ ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं|56 ‘‘आदि वराह’ आदित्य वराह का संछिप्त रूप हैं| अतः स्पष्ट हैं कि सिक्को में उत्कीर्ण वराह सौर देवता हैं तथा ‘आदि वराह’ ‘आदित्य वराह’ अर्थात ‘वराह मिहिर’ के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया गया हैं|  गुर्जर प्रतिहारो द्वारा हूणों के सिक्को पर उत्कीर्ण ईरानी ढंग की अग्निवेदिका का अनुकरण उनकी हूण उत्पत्ति का प्रबल प्रमाण हैं|

उपरोक्त तथ्य गुर्जर प्रतिहारो की हूण उत्पत्ति और विरासत की तरफ स्पष्ट संकेत हैं|

सन्दर्भ

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5. वही, वी. ए. स्मिथ, प. 60-61

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 56. वही, रमाशंकर त्रिपाठी, प. 247








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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

रानी का वाव - गुर्जर चालुक्या / सोलंकी वंश | Rani ka Vav - Gurjar Chalukya / Solanki Dynasty

रानी का वाव (पाटन, गुर्जरदेश) - गुर्जर चालुक्य वंश 

रानी उदयमति गुर्जरानी | गुर्जरानी | चालुक्या वंश | सोलंकी वंश | गुर्जरेश्वर भीमदेव चालुक्य |पाटन गुजरात | गुर्र देश | गुर्जरात्रा | गुर्जराष्ट्र | भारत का मध्यकालीन इतिहास | 
Rani ka vav - Gurjar Solanki Dynasty 


 "रानी का वाव" का निर्माण चालुक्य गुर्जर वंश के शासक की स्मृति में उनकी विधवा रानी उदयमति द्वारा निर्मित, यह शानदार चरण में अच्छी तरह से भारत की ऐतिहासिक चमत्कार के लिए कहा जा रहा है।
जमीन के नीचे आप 27 मीटर कदम लेते हैं, हर कदम पहले खंबों मंडप है जहां आप अपनी समृद्ध मूर्तियां प्रशंसा कर सकते हैं। वहाँ भी एक गुप्त सुरंग (अब कीचड़ और पत्थरों से अवरुद्ध) उस के पास के शहर की ओर जाता है

एक सीढ़ी युक्‍त कुआं, रानी की वाव का निर्माण रानी उदयामती द्वारा अपने पति गुर्जरेश्वर भीमदेव चालुक्या की प्‍यार भरी स्‍मृति में 1063 में कराया गया था।  ज्‍यादा तर सीढ़ी युक्‍त कुओं में सरस्वती नदी के जल के कारण कीचड़ भर गया है।

अभी भी वाव के खंभे अभी तक गुर्जर चालुक्या वंश (सोलंकी वंश) और उनके वास्तुकला के चमत्कार के समय में ले जाते हैं। वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। गुर्जर हूण और गुर्जर प्रतिहार की तरह गुर्जर चालुक्या भी वराह उपासक थे। वराह गुर्जरो के राजशाही चिन्ह रहा है। जिसे विष्णु का अवतार कहा जाता है।
हाल ही में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में इसको शामिल किया गया है।

• गुर्जरानी का वाव के अन्य चित्र :

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty 

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

Step Well of 
Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty


Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

शनिवार, 4 जून 2016

आभानेरी की गुर्जर बावडी का इतिहास | Gurjar Bawdi of Abhaneri

आभानेरी की गुर्जर बावडी - शिल्प की स्वर्णनगरी


आभानेरी | गुर्जर बावडी | मिहिर बावडी | चांद बावडी । गुर्जर सम्राट मिहिर भोज | गुर्जर प्रतिहार राजवंश

Gurjar Bawdi , (Mihir Bawdi, Chand Bawdi) of Aabhaneri



शिल्पकला का जीवंत नमूना आभानेरी की गुर्जर बावडी आदिवराह गुर्जर सम्राट मिहिरभोज महान के द्वारा बनायी गई थी। जो दूनिया की सबसे गहरी बावडी है। कला, संस्कृति, इतिहास एवं पर्यटन क्षेत्रों की बात की जाये, तो भारत भूमि का मुकाबला तो दूर, कोई आस-पास भी खडा हुआ नजर नहीं आता। 'अतिथि देवो भवः' सभ्यता वाले हमारे देश में कदम-कदम पर ऐतिहासिक स्थल, विजय स्तम्भ, महल, मीनारें, बावडियाँ, हर स्थल से जुडी पौराणिक गाथा, हर एक स्थान का धार्मिक महत्त्व आदि देखने या सुनने में आता है। इन स्थानों पर लोगों को धर्म से जोडने के लिए अनेकों राजाओं ने मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे एवं अन्य धार्मिक स्थान बनाये हैं। इन धार्मिक-ऐतिहासिक स्थानों की उपस्थिति को अपने मन में बिठाकर लोग एक-दूसरे का सम्मान करते हैं एवं अपने बच्चों को भी इसी तरह की शिक्षा देते हैं।

आभानेरी की गुर्जर बावडी :

आठवी-नवीं शताब्दी में निर्मित इस बावडी का निर्माण गुर्जर प्रतिहार राजवंश के गुर्जर सम्राट मिहिरभोज महान  (जिन्हें आदिवराह व प्रभास भी कहते हैं, गुर्जरेश) ने करवाया था, और उन्हीं के नाम पर इस बावडी को मिहिर बावडी,गुर्जर बावडी,चांद बावडी भी कहा जाता है। दुनिया की सबसे गहरी यह बावडी चारों ओर से लगभग 35 मीटर चौडी है तथा इस गुर्जर बावडी में ऊपर से नीचे तक पक्की सीढियाँ बनी हुई हैं, जिससे पानी का स्तर चाहे कितना ही हो, आसानी से भरा जा सकता है। 13 मंजिला यह बावडी 100 फ़ीट से भी ज्यादा गहरी है, जिसमें भूलभुलैया के रूप में 3500 सीढियाँ (अनुमानित) हैं। इसके ठीक सामने प्रसिद्ध हर्षद माता का मंदिर है। इस बावडी को इतना गहरा इसलिए बनाया गया कि इसमें यदि कोई वस्तु गिर भी जाये, तो उसे वापस पाना असम्भव है।

Mihir Bawdi, (Gurjar Bawdi, Chand Bawdi) - Gurjar Samrat Mihir Bhoj of Gurjar Pratihar Dynasty 

चाँदनी रात में एकदम दूधिया सफ़ेद रंग की तरह दिखाई देने वाली यह बावडी अँधेरे-उजाले की बावडी नाम से भी प्रसिद्ध है। तीन मंजिला इस बावडी में नृत्य कक्ष व गुप्त सुरंग बनी हुई है, साथ ही इसके ऊपरी भाग में बना हुआ परवर्ती कालीन मंडप इस बावडी के काफ़ी समय तक उपयोग में लिए जाने के प्रमाण देता है। इसकी तह तक जाने के लिए 13 सोपान तथा लगभग 1300 सीढियाँ बनाई गई हैं, जो कि कला का अप्रतिम उदाहरण पेश करती हैं। स्तम्भयुक्त बरामदों से घिरी हुई यह बावडी चारों ओर से वर्गाकार है। इसकी सबसे निचली मंजिल पर बने दो ताखों पर महिसासुर मर्दिनी एवं गणेश जी की सुंदर मूर्तियाँ भी इसे खास बनाती हैं। मिहिर बावडी की सुरंग के बारे में भी ऐसा सुनने में आता है कि इसका उपयोग युद्ध या अन्य आपातकालीन परिस्थितियों के समय राजा या सैनिकों द्वारा किया जाता था। लगभग पाँच-छह वर्ष पूर्व हुई बावडी की खुदाई एवं जीर्णोद्धार में भी एक शिलालेख मिला है जिसमें कि राजा चांद ( प्रभास) का उल्लेख मिलता है। गुर्जर बावडी एवं हर्षद माता मंदिर दोनों की ही खास बात यह है कि इनके निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों पर शानदार नक्काशी की गई है, साथ ही इनकी दीवारों पर हिंदू धर्म के सभी 33 करोड देवी-देवताओं के चित्र भी उकेरे गये हैं। बावडी की सीढियों को आकर्षक एवं कलात्मक तरीके से बनाया गया है और यही इसकी खासियत भी है कि बावडी में नीचे उतरने वाला व्यक्ति वापस उसी सीढी से ऊपर नहीं चढ सकता। आभानेरी गुप्त युग के बाद तथा आरम्भिक मध्यकाल के स्मारकों के लिए प्रसिद्ध है जिसके भग्नावशेष विदेशी आक्रमण के हमले में खण्डित होकर इधर-उधर फ़ैले हुए हैं।
Gurjar Samrat Mihir Bhoj of Gurjar Pratihar Empire | गुर्जर सम्राट मिहिर भोज 



मंगलवार, 31 मई 2016

तेली मंदिर का इतिहास - गुर्जर सम्राट मिहिर भोज | History of Teli Mandir of Gurjar Samrat Mihir Bhoj

गुर्जर प्रतिहार शैली के तेली मंदिर का इतिहास 

तेली मंदिर | ग्वालियर | गुर्जर सम्राट मिहिर भोज । गुर्जर प्रतिहार राजवंश । 

TeliTemple in the reign of Gurjar Samrat Mihir Bhoj of Gurjar Pratihar Empire.



इस मंदिर का निर्माण गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के सबसे प्रतापी शासक गुर्जर सम्राट मिहिरभोज के शासन काल मे तेल के व्‍यापार धन से हुआ था। तेल के व्यापीरीयों को समर्पित यह मंदिर तेली का मंदिर कहलाता है।तेल व्यापारी से संबंधित एक कहावत बहोत ही मशूहर है। कहा राजा भोज कहां गंगु तेली ग्‍वालियर किले पर स्थित समस्‍त स्‍मारकों में यह मंदिर सबसे उंचा है। इसकी उंचाई करीब 30 मीटर है। मंदिर की भवन योजना में गर्भग्रह तथा अंतराज प्रमुख हैं। इसमें प्रवेश के लिए पूर्व पूर्व की ओर से सीढियां हैं। मंदिर की एक विशेषता इसकी गजपृष्‍टाकार छत है, जोकि द्रविड शैली में बनी हुई है। उत्‍तर भारत में यह भवन निर्माण कला विरले ही देखने को मिलती है। मंदिर की साज सज्‍जा विभिन्‍न उत्‍तर भारतीय मंदिरों की साज सज्‍जा के समान है। इसकी बाहरी दीवारें विभिन्‍न प्रकार की मूर्तिकला से सुसज्ज्जित हैं। अत: इस मंदिर में उत्‍तर भारतीय एवं दक्षिण भारतीय वास्‍तुकला का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। मंदिर के पूर्वी भाग में निर्मित दो मंडपकिाएं एवं प्रवेश द्वार सन 1881 में अंग्रेजों के शासन काल में मेजर कीथ द्वारा बनवाए गए थे।


Teli Mandir in 1881

समूचे उत्तर भारत में द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का समन्वय यहीं ग्वालियर किले पर तेली मंदिर के रूप में देखने को मिलता है । लगभग सौ फुट की ऊंचाई लिये किले का यह सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्राचीन मंदिर है। गंगोलाताल के समीप बना यह मंदिर विशाल जगती पर स्थापित है । शिखर ऊपर की संकरा एवं बेलन की तरह गोलाई लिये हुये है । मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है । भीतर आयताकार गर्भगृह में छोटा मंडप है । निचले भाग में 113 लघु देव प्रकोष्ठ हैं जिनमें देवी-देवताओं की मान्य प्रतिमाएें थीं । मंदिर के चारों ओर की बाह्य दिवारों पर विभिन्न आकार प्रकार के पशु-पक्षी, फूल-पत्ते, देवी-देवताओं की अलंकृत आकृतियां हैं । कहीं-कहीं आसुरी शक्तियों वाली आकृतियां एवं प्रणय मुद्रा में प्रतिमाएॅ भी अंकित हैं । प्रवेश द्वार के एक तरफ कछुए पर यमुना व दूसरी तरफ मकर पर विराजमान गंगा की मानवाकृतियां हैं । आर्य द्रविड़ शैली युक्त इस मंदिर का वास्तुशिल्प अद्वितीय है । मंदिर के शिखर के दोनों ओर चैत्य गवाक्ष बने हैं तथा मंदिर के अग्रभाग में ऊपर की ओर मध्य में गरूढ़ नाग की पूंछ पकड़े अंकित है ।
उत्तर भारतीय अलंकरण से युक्त इस मंदिर का स्थापत्य दक्षिण द्रविड़ शैली का है । वर्तमान में इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है । पर दरअसल यह एक विष्णु मंदिर था । कुछ इतिहासकार इसे शैव मंदिर मानते हैं । सन 1231 में यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था । तब 1881–1883 ई. के बीच अंग्रेज हुकमरानों ने मंदिर के पुरातात्विक महत्व को समझते हुये मेजर कीथ के निर्देशन में किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल(मंदिर)के साथ-साथ तेली का मंदिर का भी सरंक्षण करवाया था । मेजर कीथ ने इधर-उधर पड़े भग्नावशेषों को संजोकर तेली मंदिर के समक्ष विशाल आकर्षक द्वार भी बनवा दिया । द्वार के निचले हिस्से में लगे दो आंग्ल भाषी शिलालेखों में संरक्षण कार्य पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया है।
Teli Mandir of Gwalior | Gurjar Samrat Mihir Bhoj

वर्तमान में मंदिर का केवल पूर्वी प्रवेश द्वार है। मूल मंदिर को दिल्ली के सुलतानों के शासन काल में ध्वस्त कर दिया गया था । हालांकि बाद में ब्रिटिश काल में हुये मरम्मत से मंदिर का मूल स्वरूप नष्ट हो गया है, फिर भी मेजर कीथ मंदिरों के संरक्षण कार्य का बीड़ा उठाने के लिये प्रसंशा के पात्र हैं ।

गुरुवार, 19 मई 2016

गुर्जर प्रतिहार शैली के बटेश्वर मंदिरो का इतिहास / History of Bateshwar Temples of Gurjara Pratihara

गुर्जर प्रतिहार शैली में बने बटेश्वर मंदिरों का इतिहास 

गुर्जर प्रतिहार वंश द्वारा बनाए गए 200 बटेश्वर मंदिर का चित्र / Bateshwar Temple in Region of Gurjar Pratihar Rajvansh

गुर्जर प्रतिहार राजवंश के शासन काल के समय बनवाये गये बटेश्वर मंदिर, पडावली मंदिर, चौसठ योगिनी इत्यादी सैकडो मंदिर बने।

एस. के. द्विवेदी ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य पर भी चर्चा की और बताया की आज अगर हिन्दू धर्म भारत में बचा हुआ है उसका श्रेय गुर्जर प्रतिहार राजवंश को जाता है। जिन्होंने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है।

गुर्जर प्रतिहारो का इतिहास सौ 300 वर्षों का न होकर हजारो वर्षो का यह कटु सत्य है कि इस धरती पर स्थाई रुप से किसी राजवंश ने शासन नही किया है। यहां अनेको गुर्जर राजवंशो ने समयानुसार शासन किया और अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्य चकित किया।
भारत देश हमेशा ही गुर्जर प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है।
आइये जानते है बटेश्वर के इतिहास को जो गुर्जर प्रतिहार शैली पर बना है जो अपने आप मे एक अदभुत कला है।

बटेश्वर मंदिर का इतिहास : 

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और उनके बनाए हुए मंदिरा का चित्र / Gurjar Samrat Mihir Bhoj - Bateshwar Temple 

Bateshwar Temples were bulit by Gurjar Pratihara in 8-10th Century 

मध्यप्रदेश के मुरैना से लगभग पचीस किलोमीटर दूर चम्बल के बीहड़ों में एक जगह पड़ती है "बटेश्वर तीर्थ" वहां आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच गुर्जर प्रतिहार राजवंश द्वारा बनवाई गई अब तक सबसे बेहतरीन कला है करीब एक ही जगह पर 200 मंदिरों का निर्माण किया गया था।।
इन मंदिरों का निर्माण गुर्जर प्रतिहार राजवंश के सम्राट मिहिर भोज के शासनकाल से प्रारम्भ हुआ और गुर्जर सम्राट विजयपाल प्रतिहार के शासनकाल के समय इन मंदिरों का निर्माण कार्य पूरा हुआ।। भगवान् शिव और विष्णु को समर्पित ये मंदिर खजुराहो से भी 300 वर्ष पूर्व बने थे चम्बल में डाकुवों के आतंक के कारण ये और भी उपेक्षित रहे और लगभग सारे के सारे गिर चुके थे।।

• मंदिरो का पुनर्निमाण :

के के मुहम्मद बताते हैं कि जब पुनर्निर्माण का कार्य चल ही रहा था तो पहाड़ी के ऊपर के एक मंदिर में एक व्यक्ति उन्हें मिला जो बैठा बीड़ी पी रहा था.. के के साहब को गुस्सा आया और उन्होंने उस से कहा कि "तुमको पता है कि ये मंदिर है.. और तुम यहाँ बैठ के बीड़ी पी रहे हो?".. वो आगे बढे उसे वहां से निकालने के लिए तभी उनके एक अधिकारी ने पीछे से आके उनको पकड़ लिया और बीड़ी पीने वाले व्यक्ति की तरफ इशारा करके बोला "अरे आप इन सर को नहीं जानते हैं.. इन्हें पीने दीजिये".. के के मुहम्मद समझ गए कि ये निर्भय सिंह गुर्जर है.. और कहते हैं कि "मैं उसके चरणों में बैठ गया और उसे समझाने लगा कि एक समय था कि आपके ही वंश के लोगों ने इन मंदिरों को बनाया था.. और अगर आपके ही पूर्वजों की इन अनमोल धरोहर और मूर्तियों को अभी न बचाया गया तो ये समय के साथ गायब हो जायेंगी.. इसलिए क्या आप हमारी मदद नहीं करेंगे इनके पुनर्निर्माण में?".. निर्भय को के के मुहम्मद कि बात समझ आ गयी और उसने अपना पूरा सहयोग दिया उन्हें इन मंदिरों के पुनर्निर्माण में।

के के मुहम्मद कि वजह से आज सौ से भी अधिक मंदिर वहां अपने पुराने रूप में लाये जा चुके हैं.. के के मुहम्मद  इन मंदिरों को अपना तीर्थ मानते हैं.. और चाहते हैं कि आने वाले समय में इस स्थान को तीर्थ यात्रा के रूप में मान्यता मिले.. भारत के विभिन्न स्थानों पर जाने कितने मंदिरों का जीर्णोद्वार किया है के के मुहम्मद ने अब तक.. उनको मंदिरों और भारतीय मान्यातों का बहुत गूढ़ ज्ञान और श्रद्धा है.. और बिना श्रद्धा के इस तरह का पुनर्निर्माण संभव नहीं होता है। भारतीय पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर (ASI) "के.के मुहम्मद" ने इन मंदिरों को पुनर्स्थापित करने का जिम्मा उठाया हैं।।
और आज गुर्जर प्रतिहारो द्वारा बनावाये दो सौ भी अधिक मंदिर वहां अपने पुराने रूप में लाये जा चुके हैं। के के मुहम्मद इन मंदिरों को अपना तीर्थ मानते हैं और चाहते हैं कि आने वाले समय में इस स्थान को तीर्थ यात्रा के रूप में मान्यता मिले ।के.के. जी ने भारत के विभिन्न स्थानों पर कई मंदिरों का जीर्णोद्वार किया है।।

के के मुहम्मद मंदिरों और भारतीय मान्यातों का बहुत गूढ़ ज्ञान और श्रद्धा रखते है, और बिना श्रद्धा के इस तरह का पुनर्निर्माण संभव नहीं होता है ।।

बटेश्वर मंदिर के अलावा भी गुर्जर प्रतिहारो ने कई चीजो का निर्माण किया था जिसमे पडावली मंदिर, चौसठ योगिनी मंदिर आदि इनके अलावा सैकडो इलाके व ठिकाने है जहाँ गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी कला बनाई । 

शनिवार, 14 मई 2016

गुर्जर सम्राट पृथ्वीराज चौहान / Gurjar Samrat Prithviraj Chauhan

गुर्जर सम्राट - पृथ्वीराज चौहान / Gurjar Samrat Prithviraj Chauhan

पृथ्वीराज चौहान / Prithviraj Chouhan



पृथ्वीराज चौहान (सन् 1166-1192) गुर्जर–चौहान वंश के हिंदू राजा थे जो उत्तरी भारत में 12 वीं सदी के उत्तरार्ध के दौरान अजमेर और दिल्ली पर राज्य करते थे। पृथ्वीराज को 'राय पिथौरा' भी कहा जाता है। वह गुर्जर के चौहान राजवंश का प्रसिद्ध राजा थे। पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर राज्य के वीर गुर्जर महाराजा सोमश्वर के यहाँ हुआ था।उनकी माता का नाम कपूरी देवी था जिन्हेँ पूरे बारह वर्ष के बाद पुत्र रत्न कि प्राप्ति हुई थी। पृथ्वीराज के जन्म से राज्य मेँ राजनीतिक खलबली मच गई उन्हेँ बचपन मेँ ही मारने के कई प्रयत्ऩ किए गए पर वे बचते गए। पृथ्वीराज चौहान जो कि वीर गुर्जर योध्दा थे बचपन से ही तीर और तलवारबाजी के शौकिन थे। उन्होँने बाल अव्सथा मेँ ही शेर से लड़ाई कर उसका जबड़ा फार डाला। पृथ्वी के जन्म के वक्तही महाराजा को एक अनाथ बालक मिला जिसका नाम चन्दबरदाई रखा गया। जिन्हेँ आगे चलकर कविताओँ का शौक हो गया। चन्दबरदाई और पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही अच्छे मित्र औरभाई समान थे। वह तंवर वंश के राजा अनंगपाल तंवर गुर्जर का दौहित्र (बेटी का बेटा) था और उसके बाद दिल्ली का राजा हुआ। उसके अधिकार में दिल्ली से लेकर अजमेर तक का विस्तृत भूभाग था। पृथ्वीराज ने अपनी राजधानी दिल्ली का नवनिर्माण किया। तोमर नरेश ने एक गढ़ के निर्माण का शुभारंभ किया था, जिसे पृथ्वीराज ने सबसे पहले इसे विशाल रूप देकर पूराकिया। वह उनके नाम पर पिथौरागढ़ कहलाता है और दिल्ली के पुराने क़िले के नाम से जीर्णावस्था में विद्यमान है। कई इतिहासकारों के अनुसार अग्निकुल गुट मूल रूप से गुर्जर थे और चौहान गुर्जर के प्रमुख कबीले था। चौहान गुर्जर के चेची कबीले से मूल निकाले जाते हैं। बंबई गजेटियर के अनुसार चेची गुर्जर ने अजमेर पर 700 साल राज किया। इससे पहले मध्य एशिया में तारिम बेसिन (झिंजियांग प्रांत) के रूप में जाना जाता क्षेत्र में रहते थे। Chu- हान विवाद (200 ईसा पूर्व), "चू" राजवंश और चीन के "हान" राजवंश के बीच वर्चस्व की लड़ाई जिसमे yuechis / Gujars भी इस विवाद का हिस्सा थे। गुर्जर जब भारत मे अरब बलों से लड़ते थे । जब वे "चू-हान" शीर्षक अपने बहादुर सैनिकों को सम्मानित करने के लिए प्रयोग किया जाता था जो बाद मे चौहान कहा जाने लगा अंततः 

पृथ्वीराज चौहान 1166 ईस्वी में अजमेर में पैदा हुआ थे । उनके पिता गुर्जर सोमेश्वर चौहान और मां कपूरी देवी, एक कलचुरी (चेडी) राजकुमारी, (त्रपूरी के अचलराजा की बेटी)। गौरी ने भारत पर कई बार हमला किया था । पहली लड़ाई 1178 ईसवी में माउंट आबू के पास कायादरा पर लड़ी गयी और प्रथ्वी ने गोरी को भरपूर हराया था। इस हार के बाद गौरी गुजरात के माध्यम भारत में कभी नही घुसा । 1191 में तारोरी की पहली लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान ने घुड़सवार सेना और गोरी पर कब्जा कर लिया। गोरी ने अपने जीवन की भीख मांग ली । पृथ्वीराज ने उसे दोबारा ना घुसने की चेतावनी देकर उसको सेनापतियों के साथ जाने की अनुमति दी।
Prithviraj Chauhan

मोहम्मद गोरी और गयासुद्दीन गजनी ने 1175. में भारत आक्रमण शुरू कर दिया। और 1176 में मुल्तान पर कब्जा कर लिया ।1178 ईस्वी में मोहम्मद गोरी ने गुजरात पर आक्रमण किया और गुर्जरेश्वर भीमदेव शोलंकी ने अच्छी तरह से हरा दिया और गुजरात से वापस भगा दिया । यह वही साल था जब पृथ्वीराज चौहान अजमेर और दिल्ली के सिंहासन पर चढ़े थे । उस समय तक"गुर्जर शासक " गोरी के आगामी खतरे से अच्छी तरह परिचित थे।गुर्जरेश्वर भीमदेव सोलंकी ने "गुर्जर मंडल" नामक एक संघ के तहत सभी "क्षत्रिय" शासकों को एकत्र किया । गोरी 1186 ईस्वी में पंजाब पर कब्जा कर लिया। चौहान इस समय तक सुप्रीम लॉर्ड्स बन गया था ie.. 1187-88 ईस्वी गुर्जरेश्वर भीमदेव और पृथ्वी भी रक्त के द्वारा एक दूसरे से संबंधित थे । 

तो भीमदेव ने इस समूह का नेतृत्व करने के लिए पृथ्वी से पूछा।पृथ्वी ने तारेन (1191 ईस्वी) में गोरी के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जिसमे गुर्जर कुल यानी खोखर, घामा, भडाना, सौलंकी, प्रतिहार और रावत ने भाग लिया। खांडेराव धामा (पृथ्वी की पहली पत्नी का भाई) के आदेश के तहत गुर्जरो और खोखर के संयुक्त बलों ने मुश्लिम को बुरी तरह हराया और सीमा तक उनका पीछा किया। गोरी बुरी तरह घायल हो गया था और उसकी घुड़सवार द्वारा युद्ध के मैदान से दूर ले जाया गया था। ) "पृथ्वी विजय" और "पृथ्वीराज रासो" में कहा कि उन्हें पृथ्वी द्वारा कब्जा कर लिया गया था बल्कि वह भाग खडा हुआ और एक साल (1192 ईस्वी) के बाद गोरी दोगुने बलों के साथ लौट आया इस समय तक खोखार गुर्जर से चला गया , सोलंकी और चौहान के बीच एक अजीब प्रतिद्वंद्विता शुरू हो गई। यह पृथ्वी की एकल बलों की हार थी । और घामा को तार्रेन युद्ध के पहले दिन में मौत की सजा दे दी गई । पृथ्वी को भी गौरी के दास द्वारा हार का नेत्र्तव करना पडा । कुतुब-उद-दीन-ऐबक नाम दिया है। जिसको बाद मे दिल्ली की गद्दी इनाम के रूप मे दी गई पृथ्वीराज अपनी मौत से मिलने के लिए स्पष्ट रूप से अपनी अदालत में गोरी को मारता है और कैसे यह है। पृथ्वीराज चौहान की कब्र गोरी की कब्र के बगल में आज तक मौजूद है। और 1200 के आसपास चौहान की हार के बाद राजस्थान का एक हिस्सा मुस्लिम शासकों के अधीन आ गया। शक्तियों का प्रमुख केन्द्रों नागौर और अजमेर थे। पृथ्वी भी 1195 ईस्वी में हार के बाद गुर्जरेश्वर का ताज अजमेर के हमीर सिंह चौहान ( पृथ्वी का भाई) ने लिया इसके बाद कन्नौज (1193 ईस्वी), अजमेर (1195), अयोघ्या, बिहार (1194), ग्वालियर (1196), अनहीलवाडा (1197), चंदेल (1201 ईस्वी) पर मुसलमानों द्वारा कब्जा कर लिया गया और "गुर्जर मंडल" उस के बाद समाप्त हो गया।यह केवल 1400 ई के बाद एक नए नाम के साथ इतिहास में दिखा । 1398 ईस्वी में हिंदू योद्धाओं को लैंग की 'आमिर तैमूर' द्वारा 'राजपूत' के रूप में संबोधित कर रहे थे। राजपूत, राजा का पुत्र या बेटे से मतलब नहीं है। राजपूत"राज्य-पुत्र"  जिसका मतलब "राज्य के बेटे" से है। और आक्रमणकारियों से अपने राज्य वापस पाने के लिए आयोजित किया जाता था राजपूत संघ (मारवाड़ क्षेत्र में) 13 वीं सदी के दौरान मुस्लिम आक्रमणकारियों से लड़ने के लिए बनाई गई थी। यह प्रसिद्ध गुर्जर कुलों यानी (प्रतिहार, पंवार, चालुक्य, चौहान, गुहीलोट, गेहडवाल, चंदेल, तोमर/तंवर, छावडा, घामा) आदि जैसलमेर और देवगिरि प्लस दहिया और खोखरस तरह कुछ चयनित योद्धा जाट जनजातियों के यादवों के साथ द्वारा बनाई गई थी। गुर्जर जाति के चौहान पश्चिमी उत्तर प्रदेश (कलश्यान चौहान), मैनपुरी उत्तर प्रदेश में और राजस्थान के नीमराना अलवर  जिले में हैं, यहां के चौहान मुख्यतः हिंदू हैं । लेकिन पंजाब में वे सिख हैं। पाकिस्तान में चौहानों मुख्य रूप से मुसलमान हैं। अनंगपाल तंवर और पृथ्वीराज चौहान गुर्जर थे। 

13 गांव गुर्जर तंवरों के महरौली में है , दक्षिण दिल्ली में 40 से अधिक गांव गुर्जर तंवरों (मुस्लिम) के गुड़गांव में  हैं। व अभी भी तंवरो को दिल्ली का राजा कहा जाता है। पाकिस्तान के एक प्रसिद्ध लेखक राणा अली हसन चौहान जिनका परिवार विभाजन के दौरान पाकिस्तान  चला गया, वह पृथ्वीराज की 37 वीं पीढ़ी से हैं। प्रवासन और गुर्जर चौहान के तुपराना, कैराना, नवराना और यमुना नदी के तट पर अन्य गुर्जर चौहानों के  गांव अभी भी मौजूद हैं, इसके अलावा दापे चौहान और देवड़ा चौहान के 84 गांव यूपी में हैं। अतः ... प्रतिहार, सौलंकी और तंवर के साथ पृथ्वी के संबंध थे! 1178 ईस्वी में गुर्जर मंडल का उनका गठन और उनकी वर्तमान पीढी अजमेर के चौहान शासकों अजय पाल, पृथ्वीराज ,जगदेव, विग्रहराज पंचम ,अपरा गंगेया, पृथ्वीराज द्वितीय, और सोमेश्वर हैं। मैनपुरी के चौहान शासकों में प्रताप रुद्र, वीर सिंह, घारक देव, पूरन चंद देव, करण  देव और महाराजा तेज सिंह चौहान )|



सोमवार, 11 अप्रैल 2016

गुर्जर सम्राट मिहीर भोज - भारत का महान शासक

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज महान

गुर्जर सम्राट | मिहिर भोज | गुर्जर प्रतिहार राजवंश । आदिवराह । भारत का महान शासक । गुर्जर प्रतिहार

Gurjar Samrat Mihir Bhoj Mahaan 


 • उत्तराधिकार   - 6th गुर्जर प्रतिहार सम्राट
• शासनकाल   -  से 836 - 885 ई.
• पूर्ववर्ती        - रामभद्र गुर्जर प्रतिहार
• उत्तराधिकारी - गुर्जर सम्राट महेन्द्रपाल 
• अन्य नाम - गुर्जरेश्वर, भारत की घरती का संरक्षक, भोज महान

गुर्जर सम्राट मिहिरभोज भारत के महानतम  सम्राटों मे से जाने जाते हैंI  इन्होने  लगभग  पचास सालो तक  इस देश को  सुशासन  दिया    देश की विदेशियो से  रक्षा की  लेकिन अफसोस की बात है कि इतने बड़े महान सम्राट का नाम भी बहुत सारे भारतीय लोगों को मालूम नही हैं  सम्राट मिहिर भोज का जन्म सम्राट रामभद्र के पुत्र थे

Gurjar Samrat Mihir Bhoj - Animated 
Gurjar Samrat Mihir Bhoj - Bateshwar Temple


गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के बारे में इतिहास की पुस्तकों के अलावा बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल तक राज किया। मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल में गुर्जरपुर तक अौर कश्मीर से कर्नाटक तक था। मिहिर भोज के

साम्राज्य को तत्कालीन समय में गुर्जर देश के नाम से जाना जाता था। सम्राट मिहिर भोज बलवान, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक सम्राट थे। मिहिर भोज शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है। गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष 
के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। 
Gurjar Samrat Mihir Bhoj
मिहिर भोज के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था। उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की। 50 वर्ष तक राज करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्र पाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का सिक्का जो गुर्जर देश की मुद्रा था उसको गुर्जर सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को गुर्जर देश की राजधानी बनाने पर चलाया था। 

मिहिर भोज के सिक्के

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णू के अवतार के तौर पर 
जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी। गुर्जर सम्राट मिहिर भोज का नाम आदि वाराह भी है। ऐसा होने के पीछे दो कारण हैं 
1. जिस प्रकार वाराह भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिर भोज ने मलेच्छों को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की।
2.  दूसरा कारण, गुर्जर सम्राट का जन्म वाराह जयंती को हुआ था जोकि भादों महीने की शुक्ल पक्ष के द्वितीय दोज को होती है। सनातन धर्म के अनुसार इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना बहुत शुभ फलदायक माना जाता है। इस दिन के 2 दिन बाद महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का उत्सव प्रारंभ हो जाता है। जिन स्थानों पर सम्राट मिहिर भोज के जन्मदिवस का पता है वे इस वाराह जयंती को बड़े धूमधाम से मनाते हैं।

मिहिर भोज के सिक्के पर भगवान विश्णु का वराह अवतार

• अरब यात्रियों ने किया सम्राट मिहिर भोज का यशोगान
अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में लिखी जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के बारे में लिखता है
कि गुर्जर सम्राट की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह
भी लिखा है कि भारत में गुर्जर सम्राट मिहिर भोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रू नहीं था । मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। ये भी कहा जाता है कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी।

गुर्जर देश भारतवर्ष का सबसे सुरक्षित क्षेत्र था । इसमें डाकू और चोरों का डर भी नहीं था । मिहिर भोज राज्य की सीमाएं दक्षिण में राजकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती है। शत्रू उनकी क्रोध अग्नि मे आने के उपरांत ठहर नहीं पाते थे। धर्मात्मा,
साहित्यकार व विद्वान उनकी सभा में सम्मान पाते थे। उनके

दरबार में राजशेखर कवि ने कई प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की। कश्मीर के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगणी मेंगुर्जराधिराज मिहिर भोज का उल्लेख किया है। उनका विशाल
साम्राज्य बहुत से राज्य मंडलों आदि आदि में विभक्त था। उन पर
अंकुश रखने के लिए दंडनायक स्वयं सम्राट द्वारा नियुक्त किए जाते थे। योग्य सामंतों के सुशासन के कारण समस्त साम्राज्य में



पूर्ण शांति व्याप्त थी। सामंतों पर सम्राट का दंडनायकों द्वारा पूर्ण नियंत्रण था। किसी की आज्ञा का उल्लंघन करने व सिर उठानेकी हिम्मत नहीं होती थी। उसके पूर्वज सम्राट नागभट्ट

प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और गुर्जर साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास
का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।

 मिहिर भोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और  कश्मीर से कर्नाटक तक था। सिंहासन पर बैठते ही भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। भोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उसे सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।


सुलेमान तवारीखे अरब में लिखा है, कि गुर्जर सम्राट अरब लोगों का सभी अन्य राजाओं की अपेक्षा अधिक घोर शत्रु है। सुलेमान आगे यह भी लिखता है कि हिन्दोस्ता की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें आठ लाख  से  ज्यादा पैदल  सेना   हजारों हाथी, हजारों घोड़े और हजारों रथ थे। भोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिर भोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी। मिहिर भोज ने बिहार समेत सारा क्षेत्र कन्नौज में मिला लिया। भोज को पूर्व में उलझा देख पश्चिम भारत में पुनः उपद्रव और षड्यंत्र शुरू हो गये। इस अव्यवस्था का लाभ अरब डकैतों ने उठाया और वे सिंध पार पंजाब तक लूट पाट करने लगे। भोज ने अब इस ओर प्रयाण किया। उसने सबसे पहले पंजाब के उत्तरी भाग पर राज कर रहे थक्कियक को पराजित किया, उसका राज्य और 2000 घोड़े छीन लिए। इसके बाद गूजरावाला के विश्वासघाती सुल्तान अलखान को बंदी बनाया- उसके संरक्षण में पल रहे 3000 तुर्की और अरबी डाकुओं को बंदी बनाकर खूंखार और हत्या के लिए अपराधी पाये गए पिशाचों को मृत्यु दण्ड दे दिया।

जिस प्रकार भगवान विष्णु ने वाराह रूप धारण कर हिरण्याक्ष आदि दुष्ट राक्षसों से पृथ्वी का उद्धार किया था, उसी प्रकार विष्णु के वंशज मिहिर भोज ने देशी आतताइयों, यवन तथा तुर्क राक्षसों को मार भगाया और भारत भूमि का संरक्षण किया- उसे इसीलिए युग ने आदि वाराह महाराजाधिराज की उपाधि से विभूषित किया था। वस्तुतः गुर्जर सम्राट मिहिरभोज सिर्फ गुर्जर प्रतिहार वंश का ही नहीं वरन  हर्षवर्धन के बाद और भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना के पूर्व पूरे गुर्जर प्रतिहार काल का सर्वाधिक प्रतिभाशाली सम्राट और चमकदार सितारा था। सुलेमान ने लिखा है-इस राजा के पास बहुत बडी सेना है और किसी दूसरे राजा के पास वैसी घुड़सवार सेना नहीं है। भारतवर्ष के राजाओं में उससे बढ़कर अरबों का कोई शत्रु नहीं है। उसके आदिवाराह विरूद्ध से ही प्रतीत होता है कि वाराहवतार की मातृभूमि को अरबों से मुक्त कराना अपना कर्तव्य समझता था  

 अपनी महान राजनीतिक तथा सैनिक योजनाओं से उसने सदैव इस साम्राज्य की रक्षा की। गुर्जर सम्राट का शासनकाल पूरे मध्य युग में अद्धितीय माना जाता है। इस अवधि में देश का चतुर्मुखी विकास हुआ। साहित्य सृजन, शांति व्यवस्था स्थापत्य, शिल्प, व्यापार और शासन प्रबंध की दृष्टि से यह श्रेष्ठतम माना गया है। भयानक युद्धों के बीच किसान मस्ती से अपना खेत जोतता था, और वणिक अपनी विपणन मात्रा पर निश्चिंत चला जाता था। मिहिर भोज को गणतंत्र शासन पद्धति का जनक भी माना जाता है, उसने अपने साम्राज्य को आठ गणराज्यों में विभक्त कर दिया था। प्रत्येक राज्य का अधिपति राजा कहलाता था, जिसे आज के मुख्यमंत्री की तरह आंतरिक शासन व्यवस्था में पूरा अधिकार था। परिषद का प्रधान सम्राट होता था और शेष राजा मंत्री के रूप में कार्य करते थे। वह जितना वीर था, उतना ही दयाल भी था, घोर अपराध करने वालों को भी उसने कभी मृत्यदण्ड नहीं दिया, किन्तु दस्युओं, डकैतों, इराकी,मंगोलो , तुर्कों अरबों, का देश का शत्रु मानने की उसकी धारणा स्पष्ट थी और इन्हे क्षमा करने की भूल कभी नहीं की और न ही इन्हें देश में घुसने ही दिया। उसने मध्य भारत को जहां चंबल के डाकुओं से मुक्त कराया, वही उत्तर, पश्चिमी भारत को विदेशियों से मुक्त कराया। सच्चाई यही है कि जब तक परिहार साम्राज्य मजबूत  रहा, देश की स्



    Mihir Bhoj Sculpture, Near Teli Mandir, Gwalior Fort