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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

रानी का वाव - गुर्जर चालुक्या / सोलंकी वंश | Rani ka Vav - Gurjar Chalukya / Solanki Dynasty

रानी का वाव (पाटन, गुर्जरदेश) - गुर्जर चालुक्य वंश 

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Rani ka vav - Gurjar Solanki Dynasty 


 "रानी का वाव" का निर्माण चालुक्य गुर्जर वंश के शासक की स्मृति में उनकी विधवा रानी उदयमति द्वारा निर्मित, यह शानदार चरण में अच्छी तरह से भारत की ऐतिहासिक चमत्कार के लिए कहा जा रहा है।
जमीन के नीचे आप 27 मीटर कदम लेते हैं, हर कदम पहले खंबों मंडप है जहां आप अपनी समृद्ध मूर्तियां प्रशंसा कर सकते हैं। वहाँ भी एक गुप्त सुरंग (अब कीचड़ और पत्थरों से अवरुद्ध) उस के पास के शहर की ओर जाता है

एक सीढ़ी युक्‍त कुआं, रानी की वाव का निर्माण रानी उदयामती द्वारा अपने पति गुर्जरेश्वर भीमदेव चालुक्या की प्‍यार भरी स्‍मृति में 1063 में कराया गया था।  ज्‍यादा तर सीढ़ी युक्‍त कुओं में सरस्वती नदी के जल के कारण कीचड़ भर गया है।

अभी भी वाव के खंभे अभी तक गुर्जर चालुक्या वंश (सोलंकी वंश) और उनके वास्तुकला के चमत्कार के समय में ले जाते हैं। वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। गुर्जर हूण और गुर्जर प्रतिहार की तरह गुर्जर चालुक्या भी वराह उपासक थे। वराह गुर्जरो के राजशाही चिन्ह रहा है। जिसे विष्णु का अवतार कहा जाता है।
हाल ही में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में इसको शामिल किया गया है।

• गुर्जरानी का वाव के अन्य चित्र :

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty 

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

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Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty


Rani ka vav , Patan, Gujarat | Chalukya / Solanki Dynasty

सोमवार, 13 जून 2016

गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्या द्वितीय | Gurjar Samrat Pulkesin Chalukya

गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्य द्वितीय 

गुर्जर सम्राट । पुलकेशिन । चालुक्या वंश । गुर्जर । गुर्जर देश । गुर्जरात्रा । गुजरात । सौलंकी 
Gurjar Samrat Pulkesin Chalukya | चालुक्य

सत्याश्रय, श्रीपृथ्वीवल्लभ , परमेश्वर परमभट्टारक जैसी उपाधियाँ पाने वाले यह गुर्जर सम्राट भारतीय इतिहास में एक महान शासक माने जाते हैं।
इतिहासकारो का मानना है कि हूण गुर्जरो के विखण्डन से चालुक्य, प्रतिहार, चौहान, तंवर,चेची,सोलंकी,चप या चपराणा, चावडा आदि राजवंश व गुर्जर कुषाण साम्राज्य के विखण्डन से मैत्रक, गहलोत,परमार,हिन्दुशाही खटाणा, भाटी आदि नये राजवंश जन्म लेते हैं।
गुर्जरो के इतिहास लेखक यानी भाट भी यहीं बताते हैं
चालुक्य राजवंश भी गुर्जर हूण राजवंश की शाखा माना जाता है। चालुक्य साम्राज्य को ही सर्वप्रथम गुर्जरत्रा, गुर्जरात,गुर्जराष्ट्र व गुर्जर देश से सम्बोधित किया गया जो कि इनके गुर्जर होने का बडा प्रमाण है।
चालुक्य राजवंश की नींव विष्णुवर्धन ने रखी। पुलकेशिन चालुक्य भी इसी राजवंश का सबसे महान शासक सिद्ध हुआ।
पुलकेशिन व हर्षवर्धन दोनो समकालीन थे, महान सम्राट थे, यौद्धा थे, न्यायप्रिय,उदारशील,प्रजावत्सल शासक थे। दोनो को ही बराबर माना जाता है।
जहाँ हर्षवर्धन उत्तर भारत के एकछत्र राजा थे वहीं पश्चिमोत्तर व दक्षिणी भारत के गुर्जर सम्राट पुलकेशिन थे।
गुर्जर चालुक्य राजवंश की राजधानी आन्ध्र प्रदेश की बादामी थी। चालुक्य गुर्जर स्वयं को गुर्जर सम्राट ,गुर्जराधिराज, गुर्जर नरपति, गुर्जरेन्द्र व गुर्जर नरेश से सम्बोधित करते थे ।
राजा तो ये आन्ध्र प्रदेश के थे तो आन्ध्रपति या आन्ध्र नरेश लिख सकते थे। इनका शाही निशान वराह था जो कि गुर्जर हूण व गुर्जर प्रतिहारो का भी शाही निशान था । इनके सिक्के हूण गुर्जरो के सिक्को की नकल है व उन सिक्को का नाम भी हूण ही है।
गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्य सम्राट कीर्तिवर्मन के पुत्र थे। राजा बनने के लिये।इनका विवाद अपने चाचा सम्राट मंगलेश से भी हुआ क्योंकि कीर्तिवर्मन की मृत्यु के बाद अल्पायु पुलकेशिन के संरक्षण का भार चाचा मंगलेश को सौंपा गया था। मंगलेश राजगद्दी पर स्वयं बैठना चाहते थे, इस विवाद में मारे गये।
चालुक्य साम्राज्य गुर्जर मण्डल का सबसे बडा राज्य था। इस गुर्जर गणराज्य या मण्डल में गुर्जरो के मैत्रक, चप या चावडा, प्रतिहार आदि बडे छोटे कई गुर्जर राज्य संयुक्त होकर रहते थे।

पुलकेशिन का वास्तविक नाम ऐरेया था,राज्यरोहण के समय पुलकेशिन द्वितीय नाम रखा गया। इनका शासनकाल 609ई० से 642 ई० माना जाता है।
इन्होने लाट,सौराष्ट्र जीतकर गुर्जरत्रा की सीमा को विस्तार देना शुरू किया। कोंकण के मौर्य, पल्लव,गंग,चोल,कदंब आदि राजवंशो को हराकर।पूरे दक्षिणी भारत में गुर्जरत्रा साम्राज्य खडा कर दिया ।

गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्य की सबसे बडी उपलब्धि कन्नौज के प्रतापी सम्राट हर्षवर्धन को नर्मदा के कछारो में हराना था। इस प्रकार उन्होने सम्राट हर्षवर्धन के विजयरथ को रोक लिया। यह युद्ध पूरे गुर्जरत्रा ने लडा था जिसमें कई गुर्जर नरेश शामिल थे।

इस युद्ध के बाद गुर्जर सम्राट पुलकेशिन ने परमेश्वर की उपाधि धारण की।
हर्षवर्धन को उत्तरपथ का स्वामी होने के कारण उत्तरपथेश्वर कहा जाता था व हर्षवर्धन को पराजित करके पुलकेशिन को दक्षिणपथ का स्वामी होने के कारण दक्षिणपथेश्वर कहा गया।
इसी समय चीनी यात्री हवेनसांग भारत आता है वह गुर्जर सम्राट पुलकेशिन की बहुत प्रशंसा करता है व हर्षवर्धन व पुलकेशिन को समान शासक बताता है। वह लिखता है कि पुलकेशिन एक न्यायप्रिय, सभी धर्मो का संरक्षणकर्त्ता,उदार,बुद्धिमान,प्रजावत्सल व कलाव साहित्य का अनुरागी शासक है।
पुलकेशिन की मृत्यु पल्लव नरेश नरसिहँवर्मन से युद्ध करते हुए ६४२ ई० में होती है। इनके बाद इनका तीसरा पुत्र विक्रमादित्य प्रथम राजसिँहासन पर बैठता है।


रविवार, 29 मई 2016

सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण और पुनर्निर्माण का इतिहास | War of Somnath Temple, Gurjaratra

सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण और पुनर्निर्माण का इतिहास

War History of Somnath Temple, Gujarat (Gurjaratra)

सोमनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है। मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक गुर्जर राजाओं ने किया। आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी।

 गुर्जर नरेश शिलादित्य मैत्रक ( तृतीय , काल लगभग 720 ई) मैत्रक वंश गुर्जरो का प्राचीन वंश है, जिसकी स्थापना गुप्त वंश के एक गुर्जर सेनापति भट्टारक द्वारा 475 ई० में की गयी थी। वल्लभी इनके राज्य की राजधानी थी।

मैत्रक एक गुर्जर वंश का नाम है । मैत्रक का संस्कृत में अर्थ सूर्य होता है, इतिहासकारो के अनुसार मैत्रक मिहिर से बना शब्द है व जिनके पूर्वज कुषाण गुर्जर थे। व कुषाण गुर्जर साम्राज्य के पतन के बाद गुप्तो के अधीन राज्य किया।
मैत्रको ने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद स्वतन्त्र सत्ता प्राप्त की। सम्राट हर्षवर्धन की पुत्री का विवाह गुर्जर नरेश धारासेन मैत्रक से हुआ था।
गुर्जर नरेश शिलादित्य मैत्रक इस वंश के सबसे प्रतापी व पराक्रमी शासक हुए । शिलादित्य ने गुजरात से लेकर दक्षिण तक राज्य का विस्तार किया।इनके समय में बेहद प्रबल अरब आक्रमण हुए। मगर वीर गुर्जर सैना के संख्या में कम होने के बावजूद भी अरबो की विशाल व संसाधनो से परिपूर्ण सेना को पराजित कर जीत का डंका बजा देते थे।

इसके बाद गुर्जर सम्राट नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण किया। इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। इसके बाद गुजरात के गुर्जर शासक भीम और मालवा के गुर्जर सम्राट भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया।

अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२४ में कुछ ५,००० साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। ५०,००० लोग मंदिर के अंदर थे, प्रायः सभी कत्ल कर दिये गये।

 सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया। मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री वीर गुर्जर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के हैं। महमूद गजनी सन १०२६ में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था।

हमेशा विदेशीयो के निशाने और कई बार के हमलो के बाद भी ऐसा ही खडा है।इसका श्रेय इन पांचो वीरो की ही जाता है।


मंगलवार, 17 मई 2016

गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य द्वितीय / Gurjar Samrat Vikramaditya Chalukya

गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य द्वितीय


सातवी सदी में गुर्जरत्रा ही नहीं बल्कि पूरे भारत के सबसे बडे राजा थे सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य । तत्कालीन भारत के वे सम्राट थे जो गुर्जरसंघ के गुर्जराधिपति थे। वे चालुक्य गुर्जर राजवंश के गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्य जनाश्रयी के बाद सबसे प्रतापी व महान राजा हुए।
भारतवर्ष के इतिहास में विक्रमादित्य नाम के कई राजा हुए जो अपने नाम के अर्थ यानी पराक्रम के सूर्य को सार्थक करते हुए अमरता व महानता को प्राप्त हुए ।
पहले विक्रमादित्य राजा जिन्हें अधिकांश इतिहासकारो ने काल्पनिक माना है उज्जैन के विक्रमादित्य थे, जिन्हें विक्रम संवत का प्रवर्तक माना जाता है।
दूसरे विक्रमादित्य गुप्तवंश के चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य जोकि महान शासक थे।
तीसरे विक्रमादित्य चालुक्य गुर्जर वंश के हुए जोकि महान यौद्धा व शासक थे। सातवी सदी में ये गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रतिहार के साथ भारत के सबसे पराक्रमी यौद्धा व शासको में गिने जाते हैं ।
ये चालुक्यो की बादामी शाखा के शासक थे। उसी समय पश्चिमोत्तर भारत यानी गुर्जरदेश की सीमाओ पर अरबी आक्रमणकारियो के लगातार आक्रमण हो रहे थे व गुर्जरो के सारे राजवंश उनसे जूझ रहे थे।
मुहम्मद बिन कासिम के बाद जुनैद पूरे लाव लश्कर के साथ, बेहद बडी सेना के साथ,जेहाद के जुनून में रंगा हुआ, इराक,ईरान,अफगानिस्तान, तुर्की, सीरिया आदि देशो की मिलीजुली विशालकाय सेना के साथ गुर्जरत्रा की सीमाओ पर क्रूरता बर्बरता की हदे पार करने को खडा था।
ठीक उसी समय उत्तर भारत में गुर्जरो का एक बेहद वीर व पराक्रमी व महत्वाकाँक्षी युवक वीर नागभट्ट प्रतिहार गुर्जरो का एक नया साम्राज्य खडा करने को युद्ध पर युद्ध लड रहा था। उधर दक्षिणी भारत में चालुक्य साम्राज्य गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य के हाथो में था। मरूगुर्जरदेश में चित्तौड के मान सिहँ मोरी के युवा सेनापति कालभोज गुहिलोत यानी बप्पा रावल जो कि गहलौत वंश के गुर्जर थे। बहुत से इतिहासकार मान सिहँ मोरी को भी गुर्जर वंश का स्वीकारते हैं।
इस अरबी तूफान को गुर्जर कुचलने को आतुर हो उठे व गुर्जरो ने पराक्रम व वीरता की नयी इबारत लिखने को कमर कस ली।
युद्ध सालो तक चला जिसे राजस्थान के युद्ध के नाम से इतिहासकार पुकारते हैं।
अब समय आ गया था निर्णायक युद्ध का, परिणाम का।
गुर्जरो की संयुक्त सेना गुर्जरत्रा से बाहर निकलकर अरबो पर टूट पडी। 

गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रतिहार ।।
गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य ।।
वीर गुर्जर सेनापति बप्पा रावल ।
वीर गुर्जर पुलकेशिन अवनिजनाश्रयी ।।
वीर गुर्जर नरेश शिलादित्य मैत्रक ।।

इन सब वीर गुर्जरो ने अरबो को वो तांडव दिखाया कि अरबी इतिहासकार लिखते हैं कि गुर्जरो ने व उनके राजाओ ने अरबो को भागने के लिये कोई जगह ही नहीं छोडी। 
अरब मैदानो को छोडकर भाग गये व जुनैद को नागभट्ट ने भाले की नोक पर टांग दिया। सालो तक अरबो ने भारत पर आक्रमण की हिम्मत नहीं जुटायी।
गुर्जरो की संयुक्त सेना का नेतृत्व वीर नागभट्ट प्रतिहार ने किया था। नागभट्ट प्रतिहार उस समय उज्जैन के सम्राट थे।
गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य सच्चे अर्थो में विक्रमादित्य थे यानी पराक्रम के सूर्य।
उन्ही के बलबूते गुर्जरत्रा के सभी गुर्जर नरेश एक जगह आये व नागभट्ट का नेतृत्व स्वीकार किया राष्ट्र रक्षा के लिये।
कोटि कोटि नमन गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य को।

शनिवार, 14 मई 2016

गुर्जर साम्राज्य - Gurjar Empires and Dynasties

                        गुर्जर साम्राज्य / Gurjar Empires

प्राचीन काल मे जब भारत देश का शासक एक राजा होता था शासन प्रणाली का नाम राजतॅत्र था तो वीर गुर्जरो ने एक छत्र और न्याय प्रिय शासन किया । 

जिसमे ये ये गुर्जर साम्राज्य प्रमुख है और गुर्जर इतिहास को समझने के प्रमुख बिंदु भी :

गुर्जर साम्राज्य / Gurjar Empires

1. कुषाण साम्राज्य (0- 375 ई०) | प्रतापी सम्राट - कनिष्क

2. हूण साम्राज्य (490-542 ई०)  | प्रतापी सम्राट - मिहिरकुल

3. प्रतिहार साम्राज्य (650-1036)| प्रतापी सम्राट - मिहिरभोज

• कुषाण साम्राज्य :

" गुर्जर सम्राट कनिष्क " इस काल के सबसे महान सम्राट थे, जिसकी सिमाए उजबेकिस्तान के काला सागर से लेकर भारत मे बंगाल की खाडी तक फैली हुई थी ।

• हूण साम्राज्य  :

हूण वंश के सबसे प्रतापी सम्राट " गुर्जर मिहीरकुल हूण थे, भारतवर्ष मे बौध्द और जैन घर्म के अवसान तथा हिंदु घर्म के पुर्नउत्थान मे मुख्य भूमिका के कारण कल्की अवतार के रूप मे देखा जाता है ।

• गुर्जर प्रतिहार साम्राजय :

नागभट ने 650 ई. मे इस साम्राज्य की नींव रखी थी।

मिहिर भोज इस साम्राजय के सबसे महानत्तम सम्राट हुए । हिंदु घर्म और संस्क्रति की रक्षा करने के कारण इन्हे भगवान विष्णु के अादिवराह अवतार के रूप मे देखा जाता है

समस्त गुर्जर राजाओं ने मिलकर अरबों से भारतीय संस्कृति की रक्षा की थी जिसके कारण उन्हें प्रतिहार (रक्षक) की उपाधी प्रदान की थी। तत्पश्चात समस्त गुर्जर राजा संगठित हो गये और एक राजा को संपूर्ण गुर्जरत्रा (गुर्जरों द्वारा रक्षित क्षेत्र) की कमान दी गयी जिसे गुर्जर सम्राट अथवा गुर्जर-प्रतिहार सम्राट कहा जाता था। गुजरात को गुर्जरदेश और गुर्जरत्रा कहा जाता था| गुजरत्रा मे गुजरात और राजस्थान क्षेत्र आा था। ब्रिटिश काल के प्रारंभ मे राजस्थान के कुछ हिस्सो को राजपुताना कहा गया।

गुर्जरात्रा  = गुर्जर + त्रा (देश) से गुजरात पडा

Gurjaratra / Gurjardesh - गुर्जरात्रा / गुर्जरदेश

इन गुर्जर प्रतिहारों के अधीन कई गुर्जर राजवंश थे। जिनमें मुख्य -

• परमार गुर्जर, 

• चौहान गुर्जर, 

• गुहिल गुर्जर, 

• मौर्य (मोरी) गुर्जर, 

• चंदेल गुर्जर, 

• गुर्जरेश चालुक्य (सोलंकी),

•  तोमर गुर्जर (तंवर),

 • खटाणा गुर्जर (हिंदुशाही राजवंश), 

• चप गुर्जर (चावडा/चपराणा)

• चोल वंश

• मैत्रक वंश

• भाटी वंश

• कलचुरी वंश

• भडाणा गुर्जर 

इत्यादि!

गुर्जर सेना संख्या में अरबों की सेना की सेना के सामने कुछ नहीं थी परंतु गुर्जरों ने गुर्जर रणनृत्य कला के जरिये अरबों को कई बार धूल चटाई।

गुर्जर रणनृत्य कला पर आज भी रिसर्च जारी है।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करने के कारण ही गुर्जरों को वीर गुर्जर कहा जाता है।

अरबों को सफलकापूर्वक परास्त करने के कारण ही गुर्जरों को "राष्ट्र रक्षक वीर गुर्जर" कहा गया है।