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बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

जुनबिल हूण ( गुर्जर की खाप श्वेत हूण की एक शाखा ) | Zunbil Hun (Branch of White Hun Gurjars)

जुनबिल हूण ( गुर्जर की खाप श्वेत हूण की एक शाखा )

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Zunbil huna Gurjar | Gurjar Vs Arab Wars


जुनबिल हूणो ने लगभग ढाई सौ सालो तक हिन्दुकुश पर्वत के उत्तर में राज किया। ये भाग आजका अफगानिस्तान का बडा भूभाग है।
इन्हें जुन्बिल क्यों कहा जाता था ? गुर्जर हूणो की यह शाखा एक जून देवता की पूजा करती थी यह जून देव सूर्यदेव यानी मिहिर का दूसरा रूप है। जून भगवान की पूजा करने के कारण ही ये जुन्बिल कहलाये।
तत्कालीन जुन्बिल साम्राज्य में जून का एक बेहद सुन्दर व बडा मन्दिर भी था जिसे बाद में अरब आक्रमणकारियो ने तोड दिया था। यह हूणो की वह शाखा थी जो जाबुलिस्तान में थी व इनकी एक शाखा ने गुर्जरदेश में जाबुलपुर यानी जालौर बसाया। 610 ई० से 710 ई० तक जुन्बिलो व अरब आक्रमणकारियो के बीच युद्ध चले । जुन्बिलो ने कई भीषण युद्धो में हराकर अरबो को भगाया मगर ईस्लामिक साम्राज्य की बढती ताकत धार्मिक उन्माद से हर बार आ रही थी ।

जुनबिल हूणो को आज इतिहास में भुला दिया गया है जो कि गुर्जरो के पराक्रम को कम करने का कुत्सित प्रयास है।
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सोमवार, 1 अगस्त 2016

गुर्जर सम्राट मिहिरकुल हूण | Gurjar Samrat Mihirkul hoon - The Great Emperor of Indian History

गुर्जर सम्राट मिहिरकुल हूण  - गुर्जर हूण साम्राज्य के सबसे प्रतापी सम्राट

Gurjar Samrat | Gurjar Hoon Empire | Mihirkul Hoon | Gujjar | Medieval History of India | Huna | Hun | Torman | Shiv Worshiper 


Great Shiv Worshiper - Gurjar Samrat Mihirkul Hoon


मध्य में, ४५० इसवी के लगभग, हूण गांधार इलाके के शासक थे, जब उन्होंने वहा से सारे सिन्धु घाटी प्रदेश को जीत लिया| कुछ समय बाद ही उन्होंने मारवाड और पश्चिमी राजस्थान के इलाके भी जीत लिए| ४९५ इसवी के लगभग हूणों ने तोरमाण के नेतृत्व में गुप्तो से पूर्वी मालवा छीन लिया| एरण, सागर जिले में वराह मूर्ति पर मिले तोरमाण के अभिलेख से इस बात की पुष्टि होती हैं| जैन ग्रन्थ कुवयमाल के अनुसार तोरमाण चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या नगरी से भारत पर शासन करता था| यह पवैय्या नगरी ग्वालियर के पास स्थित थी|

तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल हूणों का राजा बना| मिहिरकुल तोरमाण के सभी विजय अभियानों हमेशा उसके साथ रहता था| उसके शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेख ग्वालियर एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं| इस प्रकार हूणों ने मालवा इलाके में अपनी स्थति मज़बूत कर ली थी| उसने उत्तर भारत की विजय को पूर्ण किया और गुप्तो सी भी नजराना वसूल किया| मिहिरकुल ने पंजाब स्थित स्यालकोट को अपनी राजधानी बनाया|मिहिकुल हूण एक कट्टर शैव था| उसने अपने शासन काल में हजारों शिव मंदिर बनवाये| मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सर नहीं झुकाया था| मिहिरकुल ने ग्वालियर अभिलेख में भी अपने को शिव भक्त कहा हैं| मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं जिसका अर्थ हैं- जय नंदी| वृष शिव कि सवारी हैं जिसका मिथकीय नाम नंदी हैं|

कास्मोस इन्दिकप्लेस्तेस नामक एक यूनानी ने मिहिरकुल के समय भारत की यात्रा की थी, उसने “क्रिस्टचिँन टोपोग्राफी” नामक अपने ग्रन्थ में लिखा हैं की हूण भारत के उत्तरी पहाड़ी इलाको में रहते हैं, उनका राजा मिहिरकुल एक विशाल घुड़सवार सेना और कम से कम दो हज़ार हाथियों के साथ चलता हैं, वह भारत का स्वामी हैं|मिहिरकुल के लगभग सौ वर्ष बाद चीनी बौद्ध तीर्थ यात्री हेन् सांग ६२९ इसवी में भारत आया , वह अपने ग्रन्थ “सी-यू-की” में लिखता हैं की सैंकडो वर्ष पहले मिहिरकुल नाम का राजा हुआ करता था जो स्यालकोट से भारत पर राज करता था | वह कहता हैं कि मिहिरकुल नैसर्गिक रूप से प्रतिभाशाली और बहादुर था|

हेन् सांग बताता हैं कि मिहिरकुल ने भारत में बौद्ध धर्म को बहुत भारी नुकसान पहुँचाया| वह कहता हैं कि एक बार मिहिरकुल ने बौद्ध भिक्षुओं से बौद्ध धर्म के बारे में जानने कि इच्छा व्यक्त की| परन्तु बौद्ध भिक्षुओं ने उसका अपमान किया, उन्होंने उसके पास, किसी वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु को भेजने की जगह एक सेवक को बौद्ध गुरु के रूप में भेज दिया| मिहिरकुल को जब इस बात का पता चला तो वह गुस्से में आग-बबूला हो गया और उसने बौद्ध धर्म के विनाश कि राजाज्ञा जारी कर दी| उसने उत्तर भारत के सभी बौद्ध बौद्ध मठो को तुडवा दिया और भिक्षुओं का कत्ले-आम करा दिया| हेन् सांग कि अनुसार मिहिरकुल ने उत्तर भारत से बौधों का नामो-निशान मिटा दिया|

गांधार क्षेत्र में मिहिरकुल के भाई के विद्रोह के कारण, उत्तर भारत का साम्राज्य उसके हाथ से निकल कर, उसके विद्रोही भाई के हाथ में चला गया| किन्तु वह शीघ्र ही कश्मीर का राजा बन बैठा| कल्हण ने बारहवी शताब्दी में “राजतरंगिणी” नामक ग्रन्थ में कश्मीर का इतिहास लिखा हैं| उसने मिहिरकुल का, एक शक्तिशाली विजेता के रूप में ,चित्रण किया हैं| वह कहता हैं कि मिहिरकुल काल का दूसरा नाम था, वह पहाड से गिरते है हुए हाथी कि चिंघाड से आनंदित होता था| उसके अनुसार मिहिरकुल ने हिमालय से लेकर लंका तक के इलाके जीत लिए थे| उसने कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया| कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था| उसने गांधार इलाके में ७०० ब्राह्मणों को अग्रहार (ग्राम) दान में दिए थे| कल्हण मिहिरकुल हूण को ब्राह्मणों के समर्थक शिव भक्त के रूप में प्रस्तुत करता हैं|


मिहिरकुल ही नहीं वरन सभी हूण शिव भक्त थे| हनोल ,जौनसार –बावर, उत्तराखंड में स्थित महासु देवता (महादेव) का मंदिर हूण स्थापत्य शैली का शानदार नमूना हैं, कहा जाता हैं कि इसे हूण भट ने बनवाया था| यहाँ यह उल्लेखनीय हैं कि भट का अर्थ योद्धा होता हैं |

हर हर महादेव का जय घोष भी हूणों से जुडा प्रतीत होता है क्योकि हूणों कि दक्षिणी शाखा को हारा-हूण कहते थे, संभवत हारा-हूण से ही हारा/हाडा गोत्र कि उत्पत्ति हुई हैं| हाडा लोगों के आधिपत्य के कारण ही कोटा-बूंदी इलाका हाडौती कहलाता हैं राजस्थान का यह हाडौती सम्भाग कभी हूण प्रदेश कहलाता था| आज भी इस इलाके में हूणों गोत्र के गुर्जरों के अनेक गांव हैं| यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध इतिहासकार वी. ए. स्मिथ, विलियम क्रुक आदि ने गुर्जरों को श्वेत हूणों से सम्बंधित माना हैं| इतिहासकार कैम्पबेल और डी. आर. भंडारकर गुर्जरों की उत्त्पत्ति श्वेत हूणों की खज़र शाखा से मानते हैं | बूंदी इलाके में रामेश्वर महादेव, भीमलत और झर महादेव हूणों के बनवाये प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं| बिजोलिया, चित्तोरगढ़ के समीप स्थित मैनाल कभी हूण राजा अन्गत्सी की राजधानी थी, जहा हूणों ने तिलस्वा महादेव का मंदिर बनवाया था| यह मंदिर आज भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता हैं| कर्नल टाड़ के अनुसार बडोली, कोटा में स्थित सुप्रसिद्ध शिव मंदिर पंवार/परमार वंश के हूणराज ने बनवाया था|

इस प्रकार हम देखते हैं की हूण और उनका नेता मिहिरकुल भारत में बौद्ध धर्म के अवसान और शैव धर्म के विकास से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं|

== Part - 2 ==

स्कंदगुप्त के काल में ही हूणों ने कंबोज और गांधार अर्थात बौद्धों के गढ़ संपूर्ण अफगानिस्तान पर अधिकार करके फिर से हिन्दू राज्य को स्थापित कर दिया था। लगभग 450 ईस्वीं में उन्होंने सिन्धु घाटी क्षेत्र को जीत लिया। कुछ समय बाद ही उन्होंने मारवाड़ और पश्चिमी राजस्थान के इलाके भी जीत लिए। 495 ईस्वीं के लगभग हूणों ने तोरमाण के नेतृत्व में गुप्तों से पूर्वी मालवा छीन लिया। एरण, सागर जिले में वराह मूर्ति पर मिले तोरमाण के अभिलेख से इस बात की पुष्टि होती है। जैन ग्रंथ 'कुवयमाल' के अनुसार तोरमाण चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या नगरी से भारत पर शासन करता था।

इतिहासकारों के अनुसार पवैय्या नगरी ग्वालियर के पास स्थित थी। तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल हूणों का राजा बना। (मिहिरकुल भारत में एक ऐतिहासिक श्वेत हुण शासक था। ये तोरामन का पुत्र था। तोरामन भारत में हुण शासन खा संस्थापक था। मिहिरकुल 510 ई। में गद्दी पर बैठा। संस्कृत में मिहिरकुल का अर्थ है - 'सूर्य के वंश से', अर्थात सूर्यवंशी।मिहिरकुल का प्रबल विरोधी नायक था यशोधर्मन। कुछ काल के लिए अर्थात् 510 ई। में एरण (तत्कालीन मालवा की एक प्रधान नगरी) के युद्ध के बाद से लेकर लगभग 527 ई। तक, जब उसने मिहिरकुल को गंगा के कछार में भटका कर क़ैद कर लिया था, उसे तोरमाण के बेटे मिहिरकुल को अपना अधिपति मानना पड़ा था। क़ैद करके भी अपनी माँ के कहने पर उसने हूण-सम्राट को छोड़ दिया था।).......... मिहिरकुल तोरमाण के सभी विजय अभियानों में हमेशा उसके साथ रहता था। उसने उत्तर भारत की विजय को पूर्ण किया और बौद्ध धर्मावलंबी गुप्तों से भी कर वसूल करना शुरू कर दिया। तोरमाण के बाद मिहिरकुल ने पंजाब स्थित स्यालकोट को अपनी राजधानी बनाया। मिहिरकुल हूण एक कट्टर शैव था। उसने अपने शासनकाल में हजारों शिव मंदिर बनवाए और बौद्धों के शासन को उखाड़ फेंका। उसने संपूर्ण भारतवर्ष में अपने विजय अभियान चलाए और वह बौद्ध, जैन और शाक्यों के लिए आतंक का पर्याय बन गया था, वहीं विक्रमादित्य और अशोक के बाद मिहिरकुल ही ऐसा शासन था जिसके अधीन संपूर्ण अखंड भारत आ गया था। उसने ढूंढ-ढूंढकर शाक्य मुनियों को भारत से बाहर खदेड़ दिया।

मिहिरकुल इतना कट्टर था कि जिसके बारे में बौद्ध और जैन धर्मग्रंथों में विस्तार से जिक्र मिलता है। वह भगवान शिव के अलावा किसी के सामने अपना सिर नहीं झुकाता था। यहां तक कि कोई हिन्दू संत उसके विचारों के विपरीत चलता तो उसका भी अंजाम वही होता, जो शाक्य मुनियों का हुआ। मिहिरकुल के सिक्कों पर 'जयतु वृष' लिखा है जिसका अर्थ है- जय नंदी। इन्दिकप्लेस्तेस नामक एक यूनानी ने मिहिरकुल के समय भारत की यात्रा की थी। उसने 'क्रिश्चियन टोपोग्राफी' नामक अपने ग्रंथ में लिखा है कि हूण भारत के उत्तरी पहाड़ी इलाकों में रहते हैं, उनका राजा मिहिरकुल एक विशाल घुड़सवार सेना और कम से कम 2 हजार हाथियों के साथ चलता है, वह भारत का स्वामी है।

मिहिरकुल के लगभग 100 वर्ष बाद चीनी बौद्ध तीर्थ यात्री ह्वेनसांग 629 ईस्वी में भारत आया, वह अपने ग्रंथ सी-यू-की में लिखता है कि कई वर्ष पहले मिहिरकुल नाम का राजा हुआ करता था, जो स्यालकोट से भारत पर राज करता था। ह्वेनसांग बताता है कि मिहिरकुल ने भारत में बौद्ध धर्म को बहुत भारी नुकसान पहुंचाया। ह्वेनसांग के अनुसार मिहिरकुल ने भारत से बौद्धों का नामो-निशान मिटा दिया। क्यों? इसके पीछे भी एक कहानी है। वह यह कि बौद्धों के प्रमुख ने मिहिरकुल का घोर अपमान किया था। उसकी क्रूरता के कारण ही जैन और बौद्ध ग्रंथों में उसे कलिराज कहा गया है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने लिखा है कि राजा बालादित्य ने तोरमाण के पुत्र मिहिरकुल को कैद कर लिया था, पर बाद में उसे छोड़ दिया था। यह बालादित्य के लिए नुकसानदायक सिद्ध हुआ।

मिहिरकुल ने हिमालय से लेकर लंका तक के इलाके जीत लिए थे। उसने कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया। कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेश्वर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था। उसने फिर से भारत में सनातन हिन्दू धर्म की स्थापना की थी। यदि शंकराचार्य, गुरुगोरक्षनाथ और मिहिरकुल नहीं होते तो भारत का प्रमुख धर्म बौद्ध ही होता और हिन्दुओं की हालत आज के बौद्धों जैसी होती। सवाल यह उठता है कि लेकिन क्या यह सही हुआ? ऐसा नहीं हुआ होता यदि बौद्ध भिक्षु देश गद्दारी नहीं करते। उस दौर में मिहिरकुल को कल्कि का अवतार ही मान लिया गया था, क्योंकि पुराणों में लिखा था कि कल्कि आएंगे और फिर से सनातन धर्म की स्थापना करेंगे। मिहिरकुल ने यही तो किया?

जैन व बौद्ध ग्रंथो ने मिहिरको कल्की अवतार माना है कल्की अवतार के बारे मै लिखा है वो तलवार ले कर बौद्ध जैन मलेच्छ को खत्म करेगे लेकिन मलेच्छ तो उस समय थे नही लेकिन मिहिर ने बौद्ध जैन को खत्म कर के कल्की अवतार  काम जरुर किया था

शुंग वंश के पतन के बाद सनातन हिन्दू धर्म की एकता को फिर से एकजुट करने का श्रेय गुप्त वंश के लोगों को जाता है। गुप्त वंश की स्थापना 320 ई। लगभग चंद्रगुप्त प्रथम ने की थी और 510 ई। तक यह वंश शासन में रहा। इस वंश में अनेक प्रतापी राजा हुए। नृसिंहगुप्त बालादित्य (463-473 ई।) को छोड़कर सभी गुप्तवंशी राजा वैदिक धर्मावलंबी थे। बालादित्य ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। आरंभ में इनका शासन केवल मगध पर था, पर बाद में संपूर्ण उत्तर भारत को अपने अधीन कर लिया था। इसके बाद दक्षिण में कांजीवरम के राजा ने भी आत्मसमर्पण कर दिया था। गुप्त वंश के सम्राटों में क्रमश: श्रीगुप्त, घटोत्कच, चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, रामगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम (महेंद्रादित्य) और स्कंदगुप्त हुए। स्कंदगुप्त के समय हूणों ने कंबोज और गांधार (उत्तर अफगानिस्तान) पर आक्रमण किया था। हूणों ने अंतत: भारत में प्रवेश करना शुरू किया। हूणों का मुकाबला कर गुप्त साम्राज्य की रक्षा करना स्कन्दगुप्त के राज्यकाल की सबसे बड़ी घटना थी। स्कंदगुप्त और हूणों की सेना में बड़ा भयंकर मुकाबला हुआ और गुप्त सेना विजयी हुई। हूण कभी गांधार से आगे नहीं बढ़ पाए, जबकि हूण और शाक्य जाति के लोग उस समय भारत के भिन्न- भिन्न इलाकों में रहते थे। स्कंदगुप्त के बाद उत्तराधिकारी उसका भाई पुरुगुप्त (468-473 ई।) हुआ। उसके बाद उसका पुत्र नरसिंहगुप्त पाटलीपुत्र की गद्दी पर बैठा जिसने बौद्ध धर्म अंगीकार कर राज्य में फिर से बौद्ध धर्म की पताका फहरा दी थी। उसके पश्चात क्रमश: कुमारगुप्त द्वितीय तथा विष्णुगुप्त ने बहुत थोडे़ समय तक शासन किया। 477 ई। में बुद्धगुप्त, जो शायद पुरुगुप्त का दूसरा पुत्र था, गुप्त-साम्राज्य का अधिकारी हुआ। ये सभी बौद्ध हुए। इनके काल में बौद्ध धर्म को खूब फलने और फूलने का मौका मिला। बुद्धगुप्त का राज्य अधिकार पूर्व में बंगाल से पश्चिम में मालवा तक के विशाल भू-भाग पर था। यह संपूर्ण क्षेत्र में बौद्धमय हो चला था। यहां शाक्यों की अधिकता थी। सनातन धर्म का लोप हो चुका था। जैन और बौद्ध धर्म ही शासन के धर्म हुआ करते थे।

== Part - 3 ===

 कल्कि पुराण में लिखा भी हैं कि कल्कि आएंगे और अनिश्वरवादी धर्मों (जैन और बौद्ध) का नाश कर देंगे। क्या मिहिरकुल ने ऐसा नहीं किया था?कश्मीरी ब्राह्मण विद्वान कल्हण के अनुसार मिहिरकुल वैदिक धर्म का अनुयायीथा। वह अनीश्वरवादियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ता था। कल्हण ने 'राजतरंगिणी' नामक ग्रंथ में मिहिरकुल का वर्णन शिवभक्त के रूप में किया है। कल्हण कहताहै कि मिहिरकुल ने कश्मीर में मिहिरेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया।हूणों के शासन से पहले कश्मीर ही नहीं, वरन पूरे भारत में बौद्ध धर्म प्रबल था।भारत में बौद्ध धर्म के अवसान और सनातन धर्म के संरक्षण एवं विकास में मिहिरकुल हूण की एक प्रमुख भूमिका है। मिहिरकुल का शासन ईरान से लेकर बर्मा औरकश्मीर से लेकर श्रीलंका तक था।कुछ विद्वानों के अनुसार मिहिरकुल को कल्कि मानना इसलिए ठीक नहीं होगा, क्योंकिहूण तो विदेशी आक्रांता थे। उनको तो इतिहास में विधर्मी माना गया है। 'विधर्मी' का अर्थ होता है ऐसे व्यक्ति जिसने या जिसके पूर्वजों ने हिन्दू धर्म को त्यागकर दूसरों का धर्म अपना लिया हो।लेकिन ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार हूणविदेशी नहीं थे। उन्हें प्राचीनकाल मेंयक्ष कहा जाता था। वे सभी धनाढ्य लोग थे। हूण, कुषाण और शक सभी मूलत: भारतीय ही थे। ये सभी भारत से निकलकर बाहर गए औरफिर पुन: भारत में आकर राज करने लगे।इतिहासकारों के अनुसार वराह हूण और कुषाण लगभग 360 ई. में भारत के पश्चिमोत्तर में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनकर उभरे थे। उन्होंने पंजाब से मालवा तक अपना शासन स्थापित कर लिया था।श्वेत हूण भी 5वीं शताब्दी में पश्चिमोत्तर भारत के शासक थे। 500 ई. लगभग जब तोरमाण ओर मिहिरकुल के नेतृत्व में जब हूणों ने मध्यभारत में साम्राज्य स्थापित किया, तब वे वैदिक धर्म और संस्कृति का एक हिस्सा थे, जबकि गुप्त सम्राट बालादित्य बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इससे पहले मौर्य वंश भी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे अतः हूणों और गुप्तों का टकराव दो भारतीय ताकतों का टकराव था।भारत के प्रथम शक्तिशाली हूण सम्राट तोरमाण के शासनकाल के पहले ही वर्ष का अभिलेख मध्यभारत के एरण नामक स्थान से वाराह मूर्ति से मिला है। हूणों के देवता वाराह थे।कालांतर में हूणों से संबंधित माने जाने वाले गुर्जरों के प्रतिहार वंश ने मिहिरभोज के नेतृत्व में उत्तर भारत में अंतिम हिन्दू साम्राज्य का निर्माणकिया और हिन्दू संस्कृति के संरक्षण में हूणों जैसी प्रभावी भूमिका निभाई।तोरमाण हूण की तरह गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज भी वाराह का उपासक था और उसने आदि वाराह की उपाधि भी धारण की थी। जाटों, गुर्जर-प्रतिहारों ने 7वीं शताब्दी से लेकर 10वीं शताब्दी तक अरब आक्रमणकारियों से भारत और उसकी संस्कृति की जो रक्षा की उससे सभी इतिहासकार परिचित हैं।समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने गुर्जर सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था, क्योंकिभोज राजाओं ने 10वीं सदी तक इस्लाम को भारत में घुसने नहीं दिया था। मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को आर्यवृत्त का महान सम्राट कहा जाता था। गुर्जर संभवतः हूणों और कुषाणों की नई पहचान थी।अतः हूणों और उनके वंशज गुर्जरों ने हिन्दू धर्म और संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस कारण से इनके सम्राट मिहिरकुलहूण औरमिहिरभोज गुर्जर को समकालीन हिन्दू समाज द्वारा अवतारी पुरुष के रूप में देखा जाना आश्चर्य नहीं होगा। निश्चित ही इन सम्राटों ने हिन्दू समाज को बाहरी और भीतरी आक्रमण से निजाद दिलाई थी इसलिए इनकी महानता के गुणगान करना स्वाभाविक ही था। लेकिन मध्यकाल में भारत के उन महान राजाओं के इतिहास को मिटाने का भरपूर प्रयास किया गया जिन्होंने यहां के धर्म और संस्कृति की रक्षा की। फिर अंग्रेजों ने उनके इतिहास को विरोधामासी बनाकर उन्होंने बौद्ध सम्राटों को महान बनाया। सचमुच सम्राट मिहिरकुल सम्राट अशोक से भी महान थे। जारी...

=== Part - 4 ======

काश सम्राट मिहिरकुल ने ब्राह्मणों को संरक्षण दिया नही होता!
हूण सम्राट मिहिरकुल महान शिव भक्त था| मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सिर नहीं झुकाया था| कर्नल टाड के अनुसार बडोली, राजस्थान के प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण हूणराज मिहिरकुल ने कराया था| इसी प्रकार मिहिरकुल हूण ने भारत में कश्मीर स्थित मिहिरेश्वर नामक प्रसिद्ध शिव मंदिर सहित हजारो शिव मंदिरों का निर्माण कराया था| मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं | वृष शिव कि सवारी हैं जिसका नाम नंदी हैं| कल्हण कृत राजतरंगिणी के अनुसार मिहिरकुल हूण ने ब्राह्मणों को सात सौ गांव दान में दिए| कल्हण हूण सम्राट मिहिरकुल को ब्राह्मणों के समर्थक शिव भक्त के रूप में प्रस्तुत करता हैं|
बौद्ध चीनी यात्री हेन सांग ने भारत में बौद्ध धर्म के अवसान के लिए मिहिरकुल हूण को जिम्मेदार माना हैं| हेन सांग के अनुसार मिहिरकुल ने बौद्ध धर्म के विनाश कि राजाज्ञा जारी कर दी थी| उसने उत्तर भारत के सभी बौद्ध बौद्ध मठो को तुडवा दिया और भिक्षुओं का कत्ले-आम करा दिया| हेन् सांग कि अनुसार मिहिरकुल ने उत्तर भारत से बौधों का नामो-निशान मिटा दिया|
ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान में मिहिरकुल हूण अति महत्त्व पूर्ण भूमिका हैं| मिहिरकुल हूण द्वारा ग्रंथ जैन ओर बौद्ध धर्म के अनुयायियों के दमन ओर ब्राह्मण धर्म के संरक्षण की नीति का भारतीय समाज क्या प्रभाव हुआ इसका समुचित मूल्यांकन किये जाने की आवशकता हैं|

==== Part - 5 ====

डाँ सुशील भाटी जी के ब्लाँग जनइतिहास से साभार

ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों की संकल्पना ग्यारहवी शताब्दी के पूर्वार्ध तक अपना निश्चित आकार ले चुकी थी| भगवान विष्णु के दस अवतार माने जाते हैं- मतस्य, क्रुमु, वाराह, नरसिंह, वामन, पशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध ओर कल्कि|  पुराणों के अनुसार कल्कि अवतार भगवान विष्णु के दस अवतारों में अंतिम हैं जोकि भविष्य में जन्म लेकर कलयुग का अंत करके सतयुग का प्रारंभ करेगा| अग्नि पुराण ने कल्कि अवतार का चित्रण तीर-कमान धारण किये हुए  एक घुडसवार के रूप में किया हैं| कल्कि पुराण के अनुसार वह हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध ओर विजय के लिए निकलेगा तथा बोद्ध, जैन ओर म्लेछो को पराजित करेगा|
परन्तु कुछ पुराण ओर कवि कल्कि अवतार के लिए भूतकाल का प्रयोग करते हैं| वायु पुराण के अनुसार कल्कि अवतार कलयुग के चर्मौत्कर्ष पर जन्म ले चुका हैं| मतस्य पुराण, बंगाली कवि जयदेव (1200 ई.) ओर चंडीदास के अनुसार भी कल्कि अवतार की घटना हो चुकी हैं| अतः कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हो सकता हैं|

जैन पुराणों में भी एक कल्कि नामक भारतीय सम्राट का वर्णन हैं| जैन विद्वान गुणभद्र नवी शताब्दी के उत्तरार्ध में लिखता हैं कि कल्किराज का जन्म महावीर के निर्वाण के एक हज़ार वर्ष बाद हुआ| जिन सेन ‘उत्तर पुराण’ में लिखता हैं कि कल्किराज ने 40 वर्ष राज किया और 70 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई|  कल्किराज अजितान्जय का पिता था, वह बहुत निरंकुश शासक था, जिसने दुनिया का दमन किया और निग्रंथो के जैन समुदाय पर अत्याचार किये| गुणभद्र के अनुसार उसने दिन में एक बार दोपहर में भोजन करने वाले जैन निग्रंथो के भोजन पर भी टैक्स लगा दिया जिससे वो भूखे मरने लगे | तब निग्रंथो को कल्कि की क्रूर यातनाओ से बचाने के लिए एक दैत्य का अवतरण हुआ जिसने वज्र (बिजली) के प्रहार से उसे मार दिया ओर अनगिनत युगों तक असहनीय दर्द ओर यातनाये झेलने के लिए रत्नप्रभा नामक नर्क में भेज दिया|

प्राचीन जैन ग्रंथो के वर्णनों के अनुसार कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं जिसका शासनकाल महावीर की मृत्यु (470 ईसा पूर्व) के एक हज़ार साल बाद, यानि कि गुप्तो के बाद, छठी शताब्दी ई. के प्रारभ में, होना चाहिए चाहिए| गुप्तो के बाद अगला शासन हूणों का था| जैन ग्रंथो में वर्णित कल्कि का समय और कार्य हूण सम्राट मिहिरकुल के साथ समानता रखते हैं| अतः कल्कि राज ओर मिहिरकुल (502- 542 ई.) के एक होने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता| इतिहासकार के. बी. पाठक ने सम्राट मिहिरकुल हूण की पहचान कल्कि के रूप में की हैं, वो कहते हैं कि कल्किराज मिहिरकुल को दूसरा नाम है|

जैन ग्रंथो ने कल्किराज के उत्तराधिकारी का नाम अजितान्जय बताया हैं| मिहिरकुल हूण के उत्तराधिकारी का नाम भी अजितान्जय था|

चीनी यात्री बौद्ध भिक्षु हेन सांग मिहिरकुल की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष बाद भारत आया| उसके द्वारा लिखित सी यू की नामक वृतांत इस मामले में कुछ और प्रकाश डालता हैं| वह कहता हैं कि मिहिरकुल कि मृत्यु के समय भयानक तूफ़ान आया और ओले बरसे, धरती कांप उठी तथा चारो ओर गहरा अँधेरा छा गया| बौद्ध पवित्र संतो ने कहा कि अनगिनत लोगो को मारने ओर बुध के धर्म को उखाड फेकने के कारण मिहिरकुल गहरे नर्क में जा गिरा जहाँ वह अंतहीन युगों तक सजा भोगता रहेगा|  जैन धर्म पर प्रहार करने वाले निरंकुश कल्कि के गहरे नर्क में जाने ओर अनगिनत युगों तक दुःख ओर यातनाये झेलने का वर्णन,  बौद्ध धर्म पर प्रहार करने वाले निरंकुश मिहिरकुल के नर्क में गिरने के वर्णन से बहुत मेल खाता हैं| अतः जैन ग्रन्थ में वर्णित कल्कि राज के मिहिरकुल होने की सम्भावना प्रबल  हैं|
ब्राह्मण ग्रन्थ अग्नि पुराण ने कल्कि अवतार का चित्रण तीर-कमान धारण करने वाला एक घुडसवार के रूप में किया हैं| कल्कि पुराण के अनुसार वह हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध ओर विजय के लिए निकलेगा तथा  बोद्ध, जैन ओर म्लेछो को पराजित कर धर्म (ब्राह्मण/हिंदू धर्म) की पुनर्स्थापना करेगा|  इतिहास में हूण कल्कि की तरह श्रेष्ठ घुडसवार ओर धनुर्धर के रूप में विख्यात हैं तथा  कल्किराज/  मिहिरकुल हूण ने भी कल्कि की तरह  जैन  ओर बोद्ध धर्म के अनुयायियों का दमन किया था|  कश्मीरी ब्राह्मण विद्वान कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था| कल्हण ने राजतरंगिणी नामक ग्रन्थ में मिहिरकुल का वर्णन ब्राह्मण समर्थक शिव भक्त के रूप में किया हैं| कल्हण कहता हैं कि मिहिरकुल ने कश्मीर में मिहिरेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया ओर ब्राह्मणों को 700 गांव (अग्रहार) दान में दिए| हूणों के शासन से पहले कश्मीर ही नहीं वरन पूरे भारत में बौद्ध धर्म प्रबल था| भारत में बौद्ध धर्म के अवसान ओर ब्राह्मण धर्म के संरक्षण एवं विकास में मिहिरकुल हूण की एक प्रमुख भूमिका हैं|
मिहिरकुल की संगति कल्कि अवतार के साथ करने में एक कठनाई ये हैं कि कुछ इतिहासकार हूणों को विधर्मी संस्कृति का विदेशी आक्रांता मानते हैं| किन्तु हूणों को विधर्मी ओर विदेशी नहीं कहा जा सकता हैं| ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार हारा हूण (किदार कुषाण) लगभग 360 ई. में भारत के पश्चिमीओत्तर में स्थापित राजनेतिक शक्ति थे| श्वेत हूण भी पांचवी शताब्दी में पश्चिमीओत्तर भारत के शासक थे| 500 ई. लगभग जब तोरमाण ओर मिहिरकुल के नेतृत्व में जब हूणों ने मध्य भारत में साम्राज्य स्थापित किया तब वो ब्राह्मण संस्कृति ओर धर्म का एक हिस्सा थे, जबकि गुप्त सम्राट बालादित्य बौद्ध धर्म का अनुयायी था| अतः हूणों ओर गुप्तो टकराव राजनैतिक सर्वोच्चता ओर साम्राज्य के लिए दो भारतीय ताकतों का संघर्ष था| भारत के प्रथम हूण सम्राट तोरमाण के शासन काल के पहले ही वर्ष का अभिलेख मध्य भारत के एरण नामक स्थान से वाराह मूर्ति से मिला हैं| हूणों के कबीलाई देवता वाराह का सामजस्य भगवान विष्णु के वाराह अवतार के साथ कर उसे ब्राह्मण धर्म में अवशोषित किया जा चुका था|  कालांतर में हूणों से सम्बंधित माने जाने वाले गुर्जरों के प्रतिहार वंश ने मिहिर भोज के नेतृत्व में उत्तर भारत में अंतिम हिंदू साम्राज्य का निर्माण किया ओर ब्राह्मण संस्कृति के संरक्षण में हूणों जैसी प्रभावी भूमिका निभाई| गुर्जर प्रतिहारो की राजधानी कन्नौज संस्कृति का उच्चतम केंद्र होने के कारण महोदय कहलाती थी|  तोरमाण हूण के तरह गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज भी वाराह का उपासक था ओर उसने आदि वाराह की उपाधि भी धारण की थी| संभवतः आम समाज के द्वारा मिहिरभोज को भगवान विष्णु का वाराह अवतार माना जाता था| गुर्जर- प्रतिहारो ने सातवी शताब्दी से लेकर दसवी शताब्दी तक अरब आक्रमणकारियों से भारत ओर उसकी संस्कृति की जो रक्षा की उससे सभी इतिहासकार परिचित हैं| समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने गुर्जर सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु कहा हैं| मिहिरभोज ने आदि वाराह की उपाधि आर्य धर्म ओर संस्कृति के रक्षक होने के नाते ही धारण की थी| मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को उसके गुरु राजशेखर ने आर्यवृत्त का सम्राट कहा हैं|  गुर्जर सभवतः हूणों ओर कुषाणों की नयी पहचान थी|
अतः हूणों ओर उनके वंशज गुर्जरों ने ब्राह्मण/हिंदू धर्म ओर संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस कारण से इनके सम्राट मिहिरकुल हूण ओर मिहिरभोज गुर्जर को समकालीन ब्राह्मण/हिंदू समाजो द्वारा अवतारी पुरुष के रूप में देखा गया हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं हैं|

==== Part 6 ====

पांचवी शताब्दी के मध्य में, ४५० इसवी के लगभग, हूण गांधार इलाके  के शासक  थे, जब उन्होंने वहा से सारे सिन्धु घाटी प्रदेश को जीत लिया| कुछ समय बाद ही उन्होंने मारवाड और पश्चिमी राजस्थान के इलाके भी जीत लिए| ४९५ इसवी के लगभग हूणों ने तोरमाण के नेतृत्व में गुप्तो से पूर्वी मालवा छीन लिया| एरण, सागर जिले में वराह मूर्ति पर मिले तोरमाण के अभिलेख से इस बात की पुष्टि होती हैं| जैन ग्रन्थ कुवयमाल के अनुसार तोरमाण चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या  नगरी से भारत पर शासन करता था| यह पवैय्या नगरी ग्वालियर के पास स्थित थी|

तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल हूणों का राजा बना| मिहिरकुल तोरमाण के सभी विजय अभियानों हमेशा उसके साथ रहता था|  उसके शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेख ग्वालियर एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं| इस प्रकार हूणों ने मालवा इलाके  में अपनी स्थति मज़बूत कर ली थी| उसने उत्तर भारत की विजय को पूर्ण किया और गुप्तो सी भी नजराना वसूल किया| मिहिरकुल ने पंजाब स्थित स्यालकोट को अपनी राजधानी बनाया|मिहिकुल हूण एक कट्टर शैव था|  उसने अपने शासन काल में हजारों शिव मंदिर बनवाये| मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सर नहीं झुकाया था| मिहिरकुल ने ग्वालियर अभिलेख में भी अपने को शिव भक्त कहा हैं| मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं जिसका अर्थ हैं- जय नंदी| वृष शिव कि सवारी हैं जिसका मिथकीय नाम नंदी हैं|

कास्मोस इन्दिकप्लेस्तेस नामक एक यूनानी ने मिहिरकुल के समय भारत की यात्रा की थी, उसने “क्रिस्टचिँन टोपोग्राफी” नामक अपने ग्रन्थ में लिखा हैं की हूण भारत के उत्तरी पहाड़ी इलाको में रहते हैं, उनका राजा मिहिरकुल एक विशाल घुड़सवार सेना और कम से कम दो हज़ार हाथियों के साथ चलता हैं, वह भारत का स्वामी हैं|मिहिरकुल के लगभग सौ वर्ष बाद चीनी बौद्ध तीर्थ यात्री हेन् सांग ६२९ इसवी में भारत आया , वह अपने ग्रन्थ “सी-यू-की” में लिखता हैं की सैंकडो वर्ष पहले  मिहिरकुल नाम का राजा हुआ करता था जो स्यालकोट से भारत पर  राज  करता था | वह  कहता हैं कि मिहिरकुल नैसर्गिक रूप से प्रतिभाशाली और बहादुर था|

हेन् सांग बताता हैं कि मिहिरकुल ने भारत में बौद्ध धर्म को बहुत भारी नुकसान पहुँचाया| वह कहता हैं कि एक बार मिहिरकुल ने बौद्ध भिक्षुओं से  बौद्ध धर्म के बारे में जानने कि इच्छा व्यक्त की| परन्तु बौद्ध भिक्षुओं ने उसका अपमान किया, उन्होंने उसके पास, किसी वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु को भेजने की जगह एक सेवक को बौद्ध गुरु के रूप में  भेज दिया| मिहिरकुल को जब इस बात का पता चला तो वह गुस्से में आग-बबूला हो गया और उसने बौद्ध धर्म के विनाश कि राजाज्ञा जारी कर दी| उसने उत्तर भारत के  सभी बौद्ध बौद्ध मठो को तुडवा दिया और भिक्षुओं का कत्ले-आम करा दिया| हेन् सांग कि अनुसार मिहिरकुल ने उत्तर भारत से बौधों का नामो-निशान मिटा दिया|

गांधार क्षेत्र में मिहिरकुल के भाई के विद्रोह के कारण, उत्तर भारत का साम्राज्य उसके हाथ से निकल कर, उसके विद्रोही भाई के हाथ में चला गया| किन्तु वह शीघ्र ही कश्मीर का राजा बन बैठा| कल्हण ने बारहवी शताब्दी में “राजतरंगिणी” नामक ग्रन्थ में कश्मीर का इतिहास लिखा हैं| उसने मिहिरकुल का, एक शक्तिशाली विजेता के रूप में ,चित्रण किया हैं| वह कहता हैं कि मिहिरकुल काल का दूसरा नाम था, वह पहाड से गिरते है हुए हाथी कि चिंघाड से आनंदित होता था| उसके अनुसार मिहिरकुल ने हिमालय से लेकर लंका तक के इलाके जीत लिए थे| उसने कश्मीर में मिहिरपुर नामक  नगर बसाया| कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था| उसने गांधार इलाके में ७०० ब्राह्मणों को अग्रहार (ग्राम) दान में दिए थे| कल्हण मिहिरकुल हूण को ब्राह्मणों के समर्थक शिव भक्त के रूप में प्रस्तुत करता हैं|

मिहिरकुल ही नहीं वरन सभी हूण शिव भक्त थे| हनोल ,जौनसार –बावर, उत्तराखंड में स्थित महासु देवता (महादेव) का मंदिर हूण स्थापत्य शैली का शानदार नमूना हैं, कहा जाता हैं कि इसे हूण भट ने बनवाया था| यहाँ यह उल्लेखनीय हैं कि भट का अर्थ योद्धा होता हैं |

हाडा लोगों के आधिपत्य के कारण ही कोटा-बूंदी इलाका हाडौती कहलाता हैं राजस्थान का यह हाडौती सम्भाग कभी हूण प्रदेश कहलाता था| आज भी इस इलाके में हूणों गोत्र के गुर्जरों  के अनेक गांव हैं| यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध इतिहासकार वी. ए. स्मिथ, विलियम क्रुक आदि ने गुर्जरों को श्वेत हूणों से सम्बंधित माना हैं| इतिहासकार कैम्पबेल और डी. आर. भंडारकर गुर्जरों की उत्त्पत्ति श्वेत हूणों की खज़र शाखा से मानते हैं | बूंदी इलाके  में रामेश्वर महादेव, भीमलत और झर महादेव हूणों के बनवाये प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं| बिजोलिया, चित्तोरगढ़ के समीप स्थित मैनाल कभी हूण राजा अन्गत्सी की राजधानी थी, जहा हूणों ने तिलस्वा महादेव का मंदिर बनवाया था| यह मंदिर आज भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता हैं| कर्नल टाड़ के अनुसार बडोली, कोटा में स्थित सुप्रसिद्ध शिव मंदिर पंवार/परमार वंश के हूणराज ने बनवाया था|

इस प्रकार हम देखते हैं की हूण और उनका नेता मिहिरकुल भारत में बौद्ध धर्म के अवसान और शैव धर्म के विकास से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं|
  सन्दर्भ ग्रन्थ

1.  K C Ojha, History of foreign rule in Ancient India,  Allahbad, 1968.
2. Prameswarilal Gupta, Coins, New Delhi, 1969.
3. R C Majumdar, Ancient Iindia.
4. Rama Shankar Tripathi, History of Ancient India, Delhi, 1987.
5. Atreyi Biswas, The Political History of Hunas in India, Munshiram Manoharlal Publishers, 1973.
6. Upendera Thakur, The Hunas in India.
7. Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan, vol.2
8. J M Campbell, The Gujar, Gazeteer of Bombay Presidency, vol.9, part.2, 1896
9. D R Bhandarkarkar Gurjaras, J B B R A S, Vol.21, 1903
10. Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan, edit. William Crooke, Vol.1, Introduction
11. P C Bagchi, India and Central Asia, Calcutta, 1965
12. V A Smith, Earley History of India                                                      
13. K B PATHAK, COMMEMORATIVE ESSAYS, NEW LIGHT ON GUPTA ERA AND MIHIRKULA, P215 http://www.archive.org/stream/commemorativeess00bhanuoft/commemorativeess00bhanuoft_djvu.txt
14.  KRISHNA CHANDRA SAGAR, FOREIGN INFLUENCE ON ANCIENT INDIA http://books.google.co.in/books?

शनिवार, 30 जुलाई 2016

तूमन- शान - यू ( 250 ईसा पूर्व ) - महान धनुर्धर हूणो का प्राचीन इतिहास | Tuman Shan Hoon (250 B.C)

तूमन- शान - यू  ( 250  ईसा पूर्व ) - महान धनुर्धर हूणो का प्राचीन इतिहास 



जिस समय चिन - वंश के नेतृत्व मे चीन एकता बद्ध हो रहा था उसी समय  ( 250  ईसा पूर्व ) हूणो मे भी एकता पैदा हुई  । चीन सम्राट की मृत्यु के बाद जो अराजकता पैदा हुई  , उससे  हूणो के प्रथम  शान - यू - तुमन ने लाभ उठाया ओर ओर्दू तथा दूसरे प्रदेशो पर लूटमार की  , ओर ओर्दूस को फिर से अपने  जन  की  गोचर भूमि बना लिया  ।

उतर से हूण आकर फिर पश्चिमी कानू - सू के निवासी यूचियो के पडोसी बन गये । तुमन का प्रभाव अपने जन पर बहुत था । किन्तु हूणो मे सबसे बडा शान - यू ( राजा ) उसका पुत्र माउदून हुआ बुढापे मे पिता ने अपनी तरूणी पत्नी के फेर मे पडकर ज्येष्ठ पुत्र  माउ - दून को  वंचित करके छोटे को राज देना चाहा  ।

सोतेली माॅ ने माउ - दून को रास्ते से अलग करने के लिये उसने अपने पश्चिमी पडोसी  यूची लोगो के पास अमानत रखा ओर फिर यूची- यो पर आक्रमण कर दिया । जिसका अर्थ यह था कि यूची माउदून को मार डालेगे  लैकिन माउ- दून एक तेज घोडे पर चढ कर भाग निकला । पिता ने झूठी प्रसन्नता प्रकट करने के लिये माउ  - दून  को  दस हजारी सरदार बना दिया ।

कहते हे कि माउ - दून ने मिडःली (गाने वाला बाण ) का आविष्कार किया था ओर माउ-दून शब्द भेदी बाण चलाने मे अभ्यस्त था ओर कई बार उसने इस कला का प्रदर्शन  भी  किया था । पिता की  ( तूमन- शान - यू ) असामयिक  मृत्यु  के बाद माउदून शान - यू ( राजा ) बना  ।

सन्दर्भ :--
1 . A Thousands years of tatars -- E.  H.  Parker,  Sanghai - 1895

हूणराज कुयुक ( कुयुक- 162 ईसा पूर्व ) - महान धनुर्धर हूण गुर्जरो का प्राचीन इतिहास | Hunraj Kuyuk 162 B.C

हूणराज कुयुक ( कुयुक - 162 ईसा पूर्व ) - महान  धनुर्धर  हूण गुर्जरो का प्राचीन इतिहास



यह हूणराज माउदून महान का पुत्र था जिसे चीनी लेखक लाऊशान शान - यू के नाम से याद करते  है । चीनी सम्राट ने इसके लिए एक खूबसूरत राजकुमारी भेजी थी साथ मे एक ख्वाजासरा  ( किन्नर - हिंजडा ) भी भेजा जो जल्द ही शान - यू का विश्वास पात्र मन्त्री बन गया । चीनी भेंटो ,  राजकुमारीयो के प्रभाव मे आकर हूण ज्यादा विलासी होते जा रहे थे  । ख्वाजासरा इसे पसन्द नही करता था

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 उसने हूणो को समझाया ----

 " तुम्हारे ओर्दू की सारी जनसंख्या मुश्किल से चीन के कुछ परगनो के बराबर होगी  , किन्तु तब भी तुम चीन को दबाने मे समर्थ होते रहे । इसका रहस्य हे तुम्हारा अपनी वास्तविक आवश्यकताओ के लिये चीन से स्वतंत्र होना । मै देखता हू कि तुम दिन पर दिन अधिक ओर अधिक चीनी चीजो के प्रेमी बनते जा रहे हो ।

 सोच लो  , चीनी सम्पत्ति का  5 वां  भाग तुम्हारे  सारे लोगो को पूरी तोर से खरीद लेने के लिये काफी हे । तुम्हारी भूमि के कठोर जीवन के रैशम ओर साटन उतने उपयुक्त नही है ।

जितना की ऊनी नम्दा चीन के तुरन्त नष्ट हो जाने वाले व्यंजन उतने उपयोगी नही हो सकते हे  , जितनी तुम्हारी कूमीश ओर पनीर । "
वह बराबर हूणो को इस तरह से सजग करता रहा ।

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चीन के जवाब मे शान - यू की ओर से जो चिट्ठी उसने लिखवाई थी  , वह चर्म पत्र की लम्बाई चोडाई मे ही अधिक बडी नही थी  , बल्कि उसमे शान - यू  ( कुयुक हूण)की अधिक लम्बी उपाधि भी लिखी गई थी ----

" हूणो के महान शान - यू जेंगी ओर पृथ्वी के पुत्र , सूर्य - चन्द्र - समान आदि "  आदि ।

हूणो का रिवाज हे कि अपनी भैडो ओर ढोरो के मांस को खाना ओर दूध को पीना । वह मोसम कै अनुसार अपने पशुओ को लेकर भिन्न - भिन्न  चारागाहो मे घूमा करते थे ।

" हर एक हूण पुरूष दक्ष धनुर्धर  होता था,"

 शांति के समय उसका जीवन सरल ओर सुखी होता हे । उनके शासन के नियम बिलकुल सरल हे । शासक ओर जनता का सबंध उचित ओर चिरस्थायी है  ।

7 साल शासन करने के बाद ची - यू ( कुयुक हूण) को  चीन कै ऊपर आक्रमण करने की आवश्यकता पडी ।
वह 1 लाख  40 हजार  ( 1, 40,000 ) हूण सेना के साथ लूटपाट करता वर्तमान सियान -  फू तक चला आया ओर बडी भारी संख्या मे लोगो,  पशुओ ओर धन - सम्पति को अपने साथ ले गया । चीनी बडी तैयारी करने मे लगे थे  , किन्तु तब तक ची - यू  अपना काम करके लोट चुका था । कई सालो तक यह ऑतक छाया रहा , फिर इस बात पर सुलह हुई  -----

" महा - दिवार  से  उतर की सारी भूमि धनुर्धरो  ( हूणो  ) की हे  , उससे दक्षिण की भूमि टोपी ओर कमरबंद वालो की "


यू -  ची ---- पलायन :---
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यू ची पलायन ची -  यू की सबसे बडी  विजय थी,  कान्सूस यूची शको को भगाना । माउदून उन्हे सिर्फ परास्त भर कर पाया था । उस समय लोबनोर से हाण्ड- हो ( हूण ) के मुडाव तक यूचियो की विचरण भूमि थी ।

लोबनोरसेउतर- पूरब सइवाडः(शक ) रहते थे । ची - यू ने अपनी सुसंगठित सेना से यूचियो पर लगातार ऐसे जबर्दस्त आक्रमण किये  , जिसके कारण यूचियो को भारी क्षति हुई ओर 176  ईसा पूर्व या 174 ईसा पूर्व मे वह अपनी भूमि छोडकर पश्चिम की ओर भागने के लिये मजबूर हुए ।

सइवाडः ( शको ) की भूमि मे थोडा जाने के बाद यूचियो का एक भाग तरिम- उपत्यका की ओर चला गया ओर दूसरा इली - उपत्यका के रास्ते आगे बढा -- पहले भाग को लघु - यूची कहते हे ओर दूसरे को महा- यूची ।

लघु यूची के आने से पहले तरिम - उपत्यका उन्ही खसो ( कशो ) की थी  , जो कि उस समय भी कशमीर ओर पश्चिमी हिमालय तक फैले हुए थे । अब कुछ शताब्दीयो के लिए तरिम - उपत्यका लघु - यूचियो की हो गई ।
महा यूचियो ने सइवडः ( शको ) को खदेड कर उनकी जगह अपने हाथ मे ले ली ।

शक लोग अपने पश्चिमी पडोसी तथा त्यानशान ओर सप्तनद के निवासी वूसुन पर पडै । महा यूचियो को हूणो ने यहा भी चैन से नही रहने दिया ओर वह बराबर पश्चिम की बढते हुये सिर - दरिया ओर अराल समुन्द्र तक फैल गये । फिर वहा से दक्षिण की ओर घूमे । कुछ समय तक उनका केन्द्र वक्षु नदी के उतर मे था ।

इसी समय ग्रीको - बाख्त्री राजा हैलिवोक मरा था । कास्पियन तटवासी पार्थियो ओर सोग्द- उपत्यका मे पहुचे यूचियो ने उसके राज्य को आपस मे बाटकर इस यवन-राजवंश को खतम कर दिया ।

 सन्दर्भ :--
1 . A Thousand Years of  Tatars : E.  H . Parker, Shanghai - 1895
2. हुन्नू इ गुन्नी : क. इनस्त्रान्त्सेफ,  लेनिनग्राद - 1926
3. Histoire des Huns : Desqugue - Paris : 1756
4.  Histoire d' Attila et de ses successures : Am. Thierry - Paris : 1856

हूणराज - चूचेन (चीयू) (172 - 127 ईसापूर्व) महान धनुर्धर प्राचीन हूण राजवंश

हूणराज - चूचेन (चीयू) (172 - 127  ईसापूर्व)

महान धनुर्धर प्राचीन हूण राजवंश

Ancient Huna / Hoon Gurjars

ची यू के स्थान पर चूचेन शान - यू  ( राजा ) बना । चीनी ख्वाजासरा  ( किन्नर - हिजडा  ) अब भी प्रभावशाली मंत्री था । चीयू के पास भी चीन से नई राजकुमारी आई थी । तत्कालीन चीन सम्राट बू- ती ने उसे धोखे से पकडना चाहा भारी युध्द हुआ लेकिन हूण शान - यू फिर विजेता बन कर निकले ओर अब चीन ओर हूण के निरन्तर सघर्ष होने लगै ओर चीनी सीमांत हूणो की आक्रमण भूमि बना रहा ।

हूण राज ईचिसे - ( 127-117  ईसापूर्व ) 


यह पाँचवा शान - यू  ( राजा )  हूणराज चू- चैन  का भाई था । इसने भी चीन पर लगातार हमले जारी रखे उस समय चीन का सम्राट बूती था जो कि एक शक्तिशाली सम्राट था उसने भी हूणो का बल तोडने के लिये एक शक्तिशाली सेना का गठन किया ओर बडी भारी तैयारी करी चीन की इस बडी भारी सेना ने बूती के नेत्तृत्व मै हूणो की भूमि के एक भाग पर आक्रमण किया ओर कान्सू पर अधिकार कर लिया ।

कान्सू मे एक नगर चाड - वे था जहा कोई हूणो का सरदार रहता था ।
 इस नगर पर विजय के समय चीनी सेना को एक सोने की मूर्ति  ( स्वर्ण - मूर्ति ) मिली जिसकी हूण पूजा किया करते थे ।

 { इस स्वर्ण - मूर्ति  के  बारे मे जानकारी बाद मे विस्तार से दी जायेगी  }

यधपि  चीनी सेना हूणो को  यूचीयो की इस भूमि से  उतर की ओर धकेलने मे कामयाब हुई किन्तु उसे सदा की विजय नही समझती थी इसलिए चीनी सम्राट बूती ने अपने सेनापति चाडः - क्यान को अपने शत्रु हूणो के शत्रु यूचियो के पास भेजा,  कि पश्चिम से यूची भी हूणो पर आक्रमण करे ,  चीनी सम्राट ने यूचियो को अपनी पुरानी भूमि पर आकर वापस बसने का निमंत्रण दिया ।

चाडः - क्यान ( चीनी सेनापति ) 138 ईसा पूर्व मे अपनी यात्रा पर चला । यह चीन का प्रथम यात्री हे जिसका यात्रा विवरण बडा ही ज्ञानवर्धक हे । चाडः - क्यान दस साल हूणो का बन्दी रहा । जब वू- सूनो ने अपने को हूणो से स्वतंत्र कर लिया,  तो यह हूणो की नजरबंदी से भागकर वू - सून भूमि मे होते हुये खोकन्द पहुंचा । वहा के निवासी घुमन्तू नही थे बल्कि नगरो ओर ग्रामो के निवासी थे  ।

वहा से समरकंद होते वह यूचियो के केन्द्र बाख्तर मे पंहुचा । चाडः  - क्यान ने यूचियो को बहुत समझाने की कोशिश करी कि चीनी सम्राट बूती ने तुम्हारी जन्म भूमि  हूणो से खाली करवा ली हे ओर चीनी समाज सम्राट चाहते हे कि यूची लोटकर अपनी भूमि सम्हाल ले । लेकिन यूची भली प्रकार जानते थे कि घुमन्तु हूणो को जीतना वेसा ही अचिरस्थायी हे जैसा डेला फेकने पर काई का फटना ।

 यूची बाख्तर के विशाल राज्य के स्वामी हो आनन्द से जीवन बिता रहे थे इसलिये हूणो से झगडा मोल लेने के लिये तेयार नही थे ।

चाडः - क्यान को बदख्शां , पामीर ओर सिडःक्यि।डः होकर लोटना पडा । जहा वह हूणो की पहुच से बाहर नही रह सकता था । उसे फिर उनकी कैद मे रहना पडा ओर बारह वर्ष  ( 138 - 126  ईसापूर्व ) के बाद चीन लोटने का मोका मिल सका ।

115 ईसा पूर्व मे फिर उसे वसूनो के पास भेजा गया , जो इस्सिकुल महा सरोवर के पास त्यानशान मे रहा करते थे । चीन पश्चिम जाने वाले रेशम पथ ( Silk Routes ) को सुरक्षित तोर से अपने पास रखना चाहता था  , इसलिए  चाडः  - क्यान को दूसरी बार भेजा गया था ।
उसने पार्थिया आदि दूसरे देशो मे पता लगाने के लिये अपने दूत भेजे ओर लोटकर उसने चीनी सम्राट को पश्चिमी देशो के बारे मे रिपोर्ट दी ।

" मूल रिपोर्ट प्राप्य नही हे "

लेकिन सूमा- च्याडःने  99  ईसापूर्व मे अपनी पुस्तक  " शी - की " ओर पाडःकी ने 92  ईस्वी मे  " च्यान-शान-शूकी" मे उपयोग किया हे ।

पिछली पुस्तक मे 206  ईसापूर्व  स  24  ईस्वी तक का वर्णन हे । चाडः- क्यान पश्चिम से लोटने के बाद 114   ईसापूर्व मे मर गया । उसके विवरण के जो अंश मिलते हे  , उससे बहुत सी बातो का पता चलता हे । पार्थियन लोग चर्मपत्र पर आडी लाइन मे लिखते थे । फर्गाना से पर्थिया तक शक-भाषा बोली जाती थी ।

इशी- ज्या  ( 127 - 117 ईसापूर्व )
अच्ची( 117- 107  ईसापूर्व )
चान - सी - लू  ( 107  - 104  ईसापूर्व )
शूली- हू  ( 104 - 103  ईसापूर्व )
शू-ती- हू  ( 103 - 68  ईसापूर्व )
हू-लू-हू( 68 -  87  ईसापूर्व )

यह हूणो के 5 वे  शान - यू ( राजा ) के बाद शान -यू  ( राजा )  हुये ।
 जिनका समकालीन हान- वंशी सम्राट बूती ( 140  - 86 ईसापूर्व ) था  ।

 चिन वंश ने हूणो की शक्ति को तोडने के लिये जो प्रयत्न किया था  , समाप्ति  हान  वंश ने की थी ।

सन्दर्भ : 

1 . A Thousand Years of  Tatars : E.  H . Parker, Shanghai - 1895
2. हुन्नू इ गुन्नी : क. इनस्त्रान्त्सेफ,  लेनिनग्राद - 1926
3. Histoire des Huns : Desqugue - Paris : 1756
4. Excavation in Northan Mangolia - C.  Trever - Leiningrad

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

महान धनुर्धर प्राचीन हूण गुर्जरो की शासन व्यवस्था का विवरण (ईसापूर्व)

महान धनुर्धर प्राचीन हूण गुर्जरो की शासन व्यवस्था  ( ईसापूर्व )

हूण गुर्जर साम्राज्य । Hun Gurjar | Hoon Gurjar | History | Huna Gurjar 

हूण गुर्जर वीरों की शासन व्यवस्था का विवरण 


1. शान -'यू :

राजा वाची चीनी शब्द शान - यू का हूण भाषा रूप  जैंगी कहा जाता है। शायद इसकी रूपान्तर " चंगीज" हुआ । राजा की पूरी उपाधि थी

" तेंग्री - कुदू - शान - यू " ( दैव पुत्र महान )

आज भी मंगोल ओर तुर्की भाषा मे देवता वाचक ""तेंग्री " शब्द मोजूद है । शान- यू  प्रभावशाली योध्दा ओर नेता होता , लेकिन उसके ऊपर हूण ओर्दू का नियन्त्रण रहता था

2. दूगी :--

इसका अर्थ होता हे धर्मात्मा या न्यासी । शान-यू के नीचे दूगी हुआ करते थे , जिनमे एक को पूर्वी - दूगी ओर दूसरे को पश्चिम - दूगी कहते थे ।

 पूर्वी दूगी का दर्जा ऊॅचा समझा जाता था,  ओर आमतौर से वह युवराज माना जाता था ।
हूण साम्राज्य के पूर्व भाग पर पूर्वी - दूगी का शासन था ओर पश्चिम पर पश्चिमी दूगी का ।

 राज्य के मध्य भाग पर अर्थात हूण - जन क्षैत्र पर स्वयं शान - यू सीधे शासन करता था ।

3. रूक - ले  ( कुनलू ) :----

यह भी दक्षिण ओर उतर दो होते थै , उत्तर का दर्जा ऊॅचा होता था

4 . इनके नीचे उतर ओर दक्षिण के दो सेनापति होते थे
5. इनके नीचे वाम दक्षिण के दो दिवान होते थे । आगे भी दो वाम दक्षिण कुतलू जेसे दस हजारी ओर हजारी तक के चोबीस सेनिक अधिकारी होतै थे । हूण - शासन मे सेनिक- असेनिक अधिकार का भेद नही था  ।

इनके अतिरिक्त हूण - शासको की उपाधि श्रृंगो से समझी जाती थी ,  जो शायद समय - समय पर उनके श्रंगार होते हो  ।

 दोनो दूनी ओर दोनो रूकले चतुःश्रृंग कहे जाते थे ।

उनके नीचे षट -'श्रृंग अधिकारी थे ।
दोनो कुतलू शासन प्रबंध को देखते थे ।

दूगी आदि  24  श्रेष्ठ अधिकारीयो के अपने क्षैत्र थे,  जिनके भीतर ही वह अपने ओर्दू तथा पशुओं को लेकर  विचरण कर सकते थे उनको अपने हजारी,  शतिक ओर दक्षिक आदि अफसरो के नियुक्ति के अधिकार थे ।

शान - यू की रानी की पदवी इन - ची ( येडःची )  थी ।

 हूणो के तीन - चार ऊंचे कुलो मे से उसे  लिया जाता था । शान - यू का अपना कुल भी बहुत सम्मानित समझा जाता था ।
 हूणो की जो श्रैणिया ओर पदवीयां स्थापित की थी ।

वह तुर्को ओर मंगोलो के समय तक मानी जाती रही
हजारी,  पंच हजारी,  दस हजारी दर्जे स्वीकार किये गये थे ।

सन्दर्भ :--
1 . A Thousand Years of  Tatars : E.  H . Parker, Shanghai - 1895
2. हुन्नू इ गुन्नी : क. इनस्त्रान्त्सेफ,  लेनिनग्राद - 1926
3. Histoire des Huns : Desqugue - Paris : 1756

शनिवार, 14 मई 2016

गुर्जर साम्राज्य - Gurjar Empires and Dynasties

                        गुर्जर साम्राज्य / Gurjar Empires

प्राचीन काल मे जब भारत देश का शासक एक राजा होता था शासन प्रणाली का नाम राजतॅत्र था तो वीर गुर्जरो ने एक छत्र और न्याय प्रिय शासन किया । 

जिसमे ये ये गुर्जर साम्राज्य प्रमुख है और गुर्जर इतिहास को समझने के प्रमुख बिंदु भी :

गुर्जर साम्राज्य / Gurjar Empires

1. कुषाण साम्राज्य (0- 375 ई०) | प्रतापी सम्राट - कनिष्क

2. हूण साम्राज्य (490-542 ई०)  | प्रतापी सम्राट - मिहिरकुल

3. प्रतिहार साम्राज्य (650-1036)| प्रतापी सम्राट - मिहिरभोज

• कुषाण साम्राज्य :

" गुर्जर सम्राट कनिष्क " इस काल के सबसे महान सम्राट थे, जिसकी सिमाए उजबेकिस्तान के काला सागर से लेकर भारत मे बंगाल की खाडी तक फैली हुई थी ।

• हूण साम्राज्य  :

हूण वंश के सबसे प्रतापी सम्राट " गुर्जर मिहीरकुल हूण थे, भारतवर्ष मे बौध्द और जैन घर्म के अवसान तथा हिंदु घर्म के पुर्नउत्थान मे मुख्य भूमिका के कारण कल्की अवतार के रूप मे देखा जाता है ।

• गुर्जर प्रतिहार साम्राजय :

नागभट ने 650 ई. मे इस साम्राज्य की नींव रखी थी।

मिहिर भोज इस साम्राजय के सबसे महानत्तम सम्राट हुए । हिंदु घर्म और संस्क्रति की रक्षा करने के कारण इन्हे भगवान विष्णु के अादिवराह अवतार के रूप मे देखा जाता है

समस्त गुर्जर राजाओं ने मिलकर अरबों से भारतीय संस्कृति की रक्षा की थी जिसके कारण उन्हें प्रतिहार (रक्षक) की उपाधी प्रदान की थी। तत्पश्चात समस्त गुर्जर राजा संगठित हो गये और एक राजा को संपूर्ण गुर्जरत्रा (गुर्जरों द्वारा रक्षित क्षेत्र) की कमान दी गयी जिसे गुर्जर सम्राट अथवा गुर्जर-प्रतिहार सम्राट कहा जाता था। गुजरात को गुर्जरदेश और गुर्जरत्रा कहा जाता था| गुजरत्रा मे गुजरात और राजस्थान क्षेत्र आा था। ब्रिटिश काल के प्रारंभ मे राजस्थान के कुछ हिस्सो को राजपुताना कहा गया।

गुर्जरात्रा  = गुर्जर + त्रा (देश) से गुजरात पडा

Gurjaratra / Gurjardesh - गुर्जरात्रा / गुर्जरदेश

इन गुर्जर प्रतिहारों के अधीन कई गुर्जर राजवंश थे। जिनमें मुख्य -

• परमार गुर्जर, 

• चौहान गुर्जर, 

• गुहिल गुर्जर, 

• मौर्य (मोरी) गुर्जर, 

• चंदेल गुर्जर, 

• गुर्जरेश चालुक्य (सोलंकी),

•  तोमर गुर्जर (तंवर),

 • खटाणा गुर्जर (हिंदुशाही राजवंश), 

• चप गुर्जर (चावडा/चपराणा)

• चोल वंश

• मैत्रक वंश

• भाटी वंश

• कलचुरी वंश

• भडाणा गुर्जर 

इत्यादि!

गुर्जर सेना संख्या में अरबों की सेना की सेना के सामने कुछ नहीं थी परंतु गुर्जरों ने गुर्जर रणनृत्य कला के जरिये अरबों को कई बार धूल चटाई।

गुर्जर रणनृत्य कला पर आज भी रिसर्च जारी है।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करने के कारण ही गुर्जरों को वीर गुर्जर कहा जाता है।

अरबों को सफलकापूर्वक परास्त करने के कारण ही गुर्जरों को "राष्ट्र रक्षक वीर गुर्जर" कहा गया है।



गुर्जर सम्राट मिहिरकुल हुण - Gurjar Samrat Mihirkul Hoon

Gurjar Samrat - Mihirkul Hoon

Gurjar Samrat Mihirkul Hoon - गुर्जर सम्राट मिहिरकुल हूण

गुर्जर सम्राट मिहिरकुल हूण ( महान शिव भक्त सम्राट)
'सम्राट मिहिरकुल हूण' गुर्जर सम्राट तोरमाण हूण के वीर पुत्र थे। तोरमाण पेशावर के राजा थे व गुप्तो से उनका टकराव होता रहता था। आधुनिक अफगान व पाक उनके साम्राज्य का भाग था। ये चौथी सदी( 450 ई०) की बात है। हूणो ने अन्तत: गुप्त साम्राज्य को ध्वस्त करके मिहिरकुल हूण के नेतृत्व में पूरे उत्तर भारत में हूण साम्राज्य का निर्माण(450ई० से 550 ईo ) किया ।मिहिरकुल हूण का अवन्ति के राजा यशोधर्मा औलिकर व गुप्त सम्राट बालादित्य से भी युद्ध हुआ, इस युद्ध में मिहिरकुल हूण को पराजय का मुहँ देखना पडा मगर यशोधर्मा व बालादित्य की संयुक्त सेना भी हूण साम्राज्य को हिला न सकी क्योंकि हूण सेना उस सदी की सबसे लडाकू व वीर सेना थी जिसका प्रकोप कोई भी शासक सहन नहीं कर पाता था।
इल युद्ध के बाद सम्राट मिहिरकुल हूण ने कश्मीर में अपनी राजधानी बनायी व पंजाब, अफगान,कश्मीर, बलूचिस्तान,राजस्थान आदि भूभाग पर हूण साम्राज्य बनाये रखा। इन्हीं हूणो की एक शाखा लाटव सौराष्ट्र ( गुजरात) चली जाती है, जो उत्तरपथ के समुद्री मार्ग पर कब्जा जमाती है, यहीं शाखा चालुक्य( सोलंकी) कहलाती है। इन्हीं के काल में इनके द्वारा शासित भूभाग को गुर्जरत्रा,गुर्जरात्र, गुर्जराष्ट्र नाम से पुकारा जाने लगता है। इनकी उपाधियाँ भी गुर्जराधिराज, गुर्जरेश्वर, गुर्जर नरेश थी।
हूण वंश शैव भक्त था व शिव की आराधना करते थे। परंपरागत रूप से वे सूर्य व अग्नि यानी मिहिर व अतर के उपासक थे मिहिरकुल का संस्कृत में अर्थ भी सूर्यवंशी(सूर्यपुत्र) होता है। तब जैन,बौद्ध धर्मो का भी बोलबाला था, व शास्त्रार्थ की स्वस्थ परंपरा थी। बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सिरमौर था, गुप्तो का भी उसे संरक्षण प्राप्त खा।


 गुर्जर सम्राट मिहिरकुल हूण बौद्धो से किसी कारणवश रुष्ट हो जाता है और उसका परिणाम यह होता है कि वह बौद्घो का नाश करने लगता है, हजारो बौद्घ मठो को नष्ट कर देता है, बौद्घ संतो को प्रताडित करता है व हिन्दू धर्म को प्राणवान कर देता है।
हजारो शिवालयो का निर्माण कराया जाता है। हूणकालीन सिक्को पर जयतु वृष लिखा है जोकि शिवजी का 
वाहन माना जाता है ।समकालीन ग्रन्थ मिहिरकुल को महायौद्धा, कठोर शासक, बडे साम्राज्य का स्वामी व बर्बर लिखते हैं। मिहिरकुल की बर्बरता व अत्याचार जैनो व बौद्घो के विरुद्घ हुआ था।
जैन ग्रन्थ व बौद्घ साहित्य उसे कल्कि अवतार भी मानते हैं ।
साहित्यकार व इतिहासकार मानते हैं कि हूणो विशेषत: सम्राट मिहिरकुल हूण का भारतीय संस्कृति पर व्यापक प्रभाव पडा व उसने हिन्दू धर्म को पुनर्जीवित करने में महान भूमिका निभायी।
प्रत्येक शिव चौदस को गुर्जर सम्राट मिहिरकुल हूण की जयन्ति मनायी जाती है । 

Gurjar Samrat Mihirkul Hoon / गुर्जर सम्राट मिहिरकुल हूण (महान शिव भक्त)