शनिवार, 30 जुलाई 2016

संसद भवन और गुर्जरो का चौसठ योगिनी मंदिर | Indian Parliament & Gurjar Pratihar Temple (64 Yogini Temple)

संसद भवन और गुर्जरो का चौसठ योगिनी मंदिर 


हमारा संसद भवन ब्रिटिश वास्तुविद् सर एडविन ल्युटेन की मौलिक परिकल्पना माना जाता है. लेकिन,इसका मॉडल हू-ब-हू मुरैना जिले के मितावली में मौजूद गुर्जर वंशी प्रतिहार राजाओ द्वारा बनवाये गए चौंसठ योगिनी शिव मंदिर से मेल खाता है. इसे 'इकंतेश्वर महादेव मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है।
मुरैना जिले के मितावली गांव में स्थित चौंसठ योगिनी शिवमंदिर अपनी वास्तुकला और गौरवशाली परंपरा के लिए आसपास के इलाके में तो प्रसिद्ध है, लेकिन मध्यप्रदेश पर्यटन के मानचित्र पर जगह नहीं बना सका है।
स्थानीय लोग इसे ‘चम्बल की संसद' के नाम से भी जानते हैं. इस मंदिर की ऊंचाई भूमि तल से 300 फीट है. इसका निर्माण तत्कालीन गुर्जर प्रतिहार क्षत्रिय राजाओं ने किया था. यह मंदिर गोलाकार है. इसी गोलाई में बने चौंसठ कमरों में एक-एक शिवलिंग स्थापित है. इसके मुख्य परिसर में एक विशाल शिव मंदिर है.
भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक़, इस मंदिर को नौवीं सदी में बनवाया गया था. कभी हर कमरे में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां भी थीं, इसलिए इसे चौंसठ योगिनी शिवमंदिर भी कहा जाता है. देवी की कुछ मूर्तियां चोरी हो चुकी हैं और कुछ मूर्तियां देश के विभिन्न संग्रहालयों में भेजी गई हैं. यह मंदिर कई तरह से अद्वितीय है।
भारत में चार चौंसठ-योगिनी मंदिर हैं, दो ओडिशा में तथा दो मध्य प्रदेश में. मंदिर को एक जमाने में तांत्रिक विश्वविद्यालय कहा जाता था. मंदिर के निर्माण में लाल-भूरे बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है।

ये गुर्जर धरोहर है इसलिए जर्जर हालात में है यदि यही मंदिर महाराणा प्रताप ने बनवाया होता तो मध्य प्रदेश के बड़े पर्यटन स्थल में से एक होता पर गलती गुर्जर राजाओ की ये रही की उन्होंने अपने वंश को गुर्जर नाम दिया अगर गुर्जर नाम ना दिया होता तो सायद राजपुत कहलाकर ही सही पर उनकी धरोहर को सही जगह मिल जाती।
सबलगढ़ का दुर्ग चौशठ योगिनी मंदिर धौलपुर दुर्ग सब जर्जर हालात में है क्योंकि गुर्जरो के है।
ऐसे तो गुर्जर विदेशी है इतिहास भी नही दिखाएंगे इतिहास भी राजपुतो का बना देंगे ओर ऐसे संसद का मॉडल गुर्जर राजाओ से लिया गया वो भी विदेशी के नाम कर देंगे।
कमाल है!!

Chausath Yogini Temple of Gurjars vs Indian Parliament

तूमन- शान - यू ( 250 ईसा पूर्व ) - महान धनुर्धर हूणो का प्राचीन इतिहास | Tuman Shan Hoon (250 B.C)

तूमन- शान - यू  ( 250  ईसा पूर्व ) - महान धनुर्धर हूणो का प्राचीन इतिहास 



जिस समय चिन - वंश के नेतृत्व मे चीन एकता बद्ध हो रहा था उसी समय  ( 250  ईसा पूर्व ) हूणो मे भी एकता पैदा हुई  । चीन सम्राट की मृत्यु के बाद जो अराजकता पैदा हुई  , उससे  हूणो के प्रथम  शान - यू - तुमन ने लाभ उठाया ओर ओर्दू तथा दूसरे प्रदेशो पर लूटमार की  , ओर ओर्दूस को फिर से अपने  जन  की  गोचर भूमि बना लिया  ।

उतर से हूण आकर फिर पश्चिमी कानू - सू के निवासी यूचियो के पडोसी बन गये । तुमन का प्रभाव अपने जन पर बहुत था । किन्तु हूणो मे सबसे बडा शान - यू ( राजा ) उसका पुत्र माउदून हुआ बुढापे मे पिता ने अपनी तरूणी पत्नी के फेर मे पडकर ज्येष्ठ पुत्र  माउ - दून को  वंचित करके छोटे को राज देना चाहा  ।

सोतेली माॅ ने माउ - दून को रास्ते से अलग करने के लिये उसने अपने पश्चिमी पडोसी  यूची लोगो के पास अमानत रखा ओर फिर यूची- यो पर आक्रमण कर दिया । जिसका अर्थ यह था कि यूची माउदून को मार डालेगे  लैकिन माउ- दून एक तेज घोडे पर चढ कर भाग निकला । पिता ने झूठी प्रसन्नता प्रकट करने के लिये माउ  - दून  को  दस हजारी सरदार बना दिया ।

कहते हे कि माउ - दून ने मिडःली (गाने वाला बाण ) का आविष्कार किया था ओर माउ-दून शब्द भेदी बाण चलाने मे अभ्यस्त था ओर कई बार उसने इस कला का प्रदर्शन  भी  किया था । पिता की  ( तूमन- शान - यू ) असामयिक  मृत्यु  के बाद माउदून शान - यू ( राजा ) बना  ।

सन्दर्भ :--
1 . A Thousands years of tatars -- E.  H.  Parker,  Sanghai - 1895

तेली कत्था नरसंहार | Teli Katha Massacre - Sacrifice of Veer Gurjars

तेली कत्था नरसंहार

तेली कत्था नरसंहार | Teli Katha Massacre 

तेली कत्था नरसंहार जिसमे आतंकवादियों ने उन १२ गुर्जरो को जिन्होंने  भारतीय सेना के साथ मिलकर ऑपरेशन सर्प विनाश चलाया था, सुरणकोट के तेली कत्था गांव में रात में सोते समय बेरहमी से मार दिया था.. इसमें 12 गुर्जरो की जान गयी थी. वास्तव में ऑपरेशन सर्प विनाश बिना गुर्जरो के सहयोग के संभव ही नहीं था. 

https://en.wikipedia.org/wiki/2004_Teli_Katha_massacre

"तुम सजाते ही रहना नए काफिले,
राह कुर्बानियों की ना वीरान हो..."
इन वीर गुर्जरो को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि भगवान इन वीरो को जन्नत में जगह दे.

माउ-दून महान - चक्रवर्ती गुर्जर सम्राट (183 ईसा पूर्व ) : महान धनुर्धर घुमन्तु हूण गुर्जरो का प्राचीन इतिहास | History of Ancient Huna Gurjars

 माउ-दून महान - चक्रवर्ती गुर्जर सम्राट (183  ईसा पूर्व ) : महान धनुर्धर घुमन्तु हूण गुर्जरो का प्राचीन इतिहास 

Huna / Hoon Gurjars


शान - यू  ( राजा ) बनते ही माउदून ने अपने तेवर दिखा दिये थे क्योंकि इस समय तक चीन ओर यूची ही नही  , बल्कि पुराने तुंगुस ( तुडःहू, हाण्न ) भी अपने जन का एक बडा संगठन कर चुके थे । हूणो की उनके साथ लडाई होने लगी थी । गोबी की बालु का भूमी के बीच मे दोनो जनो ( दोनो कबीले )  का एक भीषण संघर्ष हुआ ।

वह माउदून का मुकाबला कर बुरी तरह से हारे थे । बहुत से तुंगुसो को हूणो ने अपना दास बना लिया था । उनमे से कुछ भागकर मंगोलिया के उतर - पूर्व मे जाने मे सफल हुये जो बाद मे शक्ति संचय कर के हूणो के प्रतिद्वन्दी  बन गये ।

माउदून एक चतुर सेनानायक था । जन ( कबीला ) के संगठन ओर शासन मे भी उसने वेसी ही प्रतिभा दिखलाई । उसने अपने तीन प्रतिद्वन्दी जनो को परास्त कर हूणो की शक्ति को बढाया ।

उसे कोरोस , दारयोश ओर सिकन्दर की श्रेणी का विजेता माना जाता है ।

तुंगुसों को परास्त करके उत्तर से अपने को सुरक्षित कर पश्चिमी पडोसी यूचियो की खबर लेने की ठानी । यूची ( यूची जो कि कुषाणो के नेतृत्व में फिर से संगठित हुए)भी बडे वीर योध्दा थे  , हूणो की तरह ही घूमन्तू पशुपालन तथा घुडसवारी के साथ धनुष चलाना जानते थे । यह भी संभव है कि हथियार ओर युद्ध की शिक्षा मे हूणो के गुरू ईन्ही के पूर्वज हो ।

यूची ओर माउदून की सेना कितने ही समय तक मुकाबला करते रहे  , किन्तु अंत मे  ( 176 या 174 ईसा पूर्व ) मे उन्हे हूणो के सामने पराजय स्वीकार कर कोकोनोर ओर लोबनोर की अपनी पितृ - भूमी को छोडने के लिऐ मजबूर होना पडा ।

माउदून ने चीन सम्राट वेन-ती( 169 - 156  ईसापूर्व )  को लिखा था :----

 " जितनी जातिया ( तातार ) घोडे पर चढ कर धनुष को झुका सकती हे  , उन्हे एकता बद्ध कर मैने एक विशाल साम्राज्य  कायम कर लिया । यूचियो ओर तरबगताइयो को भी मैने नष्ट कर दिया है । लोबनोर तथा आसपास के  26  राज्य,  मेरे हाथ मे है । अगर तुम नही चाहते  , कि  हाण्ड-नू ( हूण ) महादिवार को पार करे तो तुम्हे चीनीयो को महादिवार के पास हर्गिज नही आने देना चाहिये साथ ही मेरे दूत को नजरबंद न कर तुरन्त लोटा देना चाहिये " ।

माउदून का राज्य पूरब मे कोरिया से लेकर पश्चिम मे बल्काश तक ओर उत्तर मे बैकाल से दक्षिण मे किवनलन पर्वत माला तक फैला हुआ था । उसके पिता के समय हूण राज्य केवल अपने कबीले तक सीमित था ओर दक्षिण मे चीन के भीतर लूटमार भर कर लिया करते थे ।

इतने बडे राज्य संचालन के लिए पुरानी व्यवस्था उपयुक्त नही हो सकती थी  , इसलिए माउदून को नई व्यवस्था कायम करनी पडी ।

यह स्मरण रहना चाहिए  , कि  हूणो का राज्य पितृसत्ताक था , अभी वहा सामन्तशाही नही फैली थी । चीन मे किसान अर्धदास  ओर दास जैसे थे । उनके बाल बच्चे सामन्तो की चल सम्पति थे ।

सन्दर्भ :-
1. A thousands years of Tatars - E. H. Parker, Shanghai - 1895
2. आर्खे . ओर्चेक .  - वेर्नश्ताम

हूणराज कुयुक ( कुयुक- 162 ईसा पूर्व ) - महान धनुर्धर हूण गुर्जरो का प्राचीन इतिहास | Hunraj Kuyuk 162 B.C

हूणराज कुयुक ( कुयुक - 162 ईसा पूर्व ) - महान  धनुर्धर  हूण गुर्जरो का प्राचीन इतिहास



यह हूणराज माउदून महान का पुत्र था जिसे चीनी लेखक लाऊशान शान - यू के नाम से याद करते  है । चीनी सम्राट ने इसके लिए एक खूबसूरत राजकुमारी भेजी थी साथ मे एक ख्वाजासरा  ( किन्नर - हिंजडा ) भी भेजा जो जल्द ही शान - यू का विश्वास पात्र मन्त्री बन गया । चीनी भेंटो ,  राजकुमारीयो के प्रभाव मे आकर हूण ज्यादा विलासी होते जा रहे थे  । ख्वाजासरा इसे पसन्द नही करता था

=====×××××======

 उसने हूणो को समझाया ----

 " तुम्हारे ओर्दू की सारी जनसंख्या मुश्किल से चीन के कुछ परगनो के बराबर होगी  , किन्तु तब भी तुम चीन को दबाने मे समर्थ होते रहे । इसका रहस्य हे तुम्हारा अपनी वास्तविक आवश्यकताओ के लिये चीन से स्वतंत्र होना । मै देखता हू कि तुम दिन पर दिन अधिक ओर अधिक चीनी चीजो के प्रेमी बनते जा रहे हो ।

 सोच लो  , चीनी सम्पत्ति का  5 वां  भाग तुम्हारे  सारे लोगो को पूरी तोर से खरीद लेने के लिये काफी हे । तुम्हारी भूमि के कठोर जीवन के रैशम ओर साटन उतने उपयुक्त नही है ।

जितना की ऊनी नम्दा चीन के तुरन्त नष्ट हो जाने वाले व्यंजन उतने उपयोगी नही हो सकते हे  , जितनी तुम्हारी कूमीश ओर पनीर । "
वह बराबर हूणो को इस तरह से सजग करता रहा ।

=======×××××======
चीन के जवाब मे शान - यू की ओर से जो चिट्ठी उसने लिखवाई थी  , वह चर्म पत्र की लम्बाई चोडाई मे ही अधिक बडी नही थी  , बल्कि उसमे शान - यू  ( कुयुक हूण)की अधिक लम्बी उपाधि भी लिखी गई थी ----

" हूणो के महान शान - यू जेंगी ओर पृथ्वी के पुत्र , सूर्य - चन्द्र - समान आदि "  आदि ।

हूणो का रिवाज हे कि अपनी भैडो ओर ढोरो के मांस को खाना ओर दूध को पीना । वह मोसम कै अनुसार अपने पशुओ को लेकर भिन्न - भिन्न  चारागाहो मे घूमा करते थे ।

" हर एक हूण पुरूष दक्ष धनुर्धर  होता था,"

 शांति के समय उसका जीवन सरल ओर सुखी होता हे । उनके शासन के नियम बिलकुल सरल हे । शासक ओर जनता का सबंध उचित ओर चिरस्थायी है  ।

7 साल शासन करने के बाद ची - यू ( कुयुक हूण) को  चीन कै ऊपर आक्रमण करने की आवश्यकता पडी ।
वह 1 लाख  40 हजार  ( 1, 40,000 ) हूण सेना के साथ लूटपाट करता वर्तमान सियान -  फू तक चला आया ओर बडी भारी संख्या मे लोगो,  पशुओ ओर धन - सम्पति को अपने साथ ले गया । चीनी बडी तैयारी करने मे लगे थे  , किन्तु तब तक ची - यू  अपना काम करके लोट चुका था । कई सालो तक यह ऑतक छाया रहा , फिर इस बात पर सुलह हुई  -----

" महा - दिवार  से  उतर की सारी भूमि धनुर्धरो  ( हूणो  ) की हे  , उससे दक्षिण की भूमि टोपी ओर कमरबंद वालो की "


यू -  ची ---- पलायन :---
__________________
यू ची पलायन ची -  यू की सबसे बडी  विजय थी,  कान्सूस यूची शको को भगाना । माउदून उन्हे सिर्फ परास्त भर कर पाया था । उस समय लोबनोर से हाण्ड- हो ( हूण ) के मुडाव तक यूचियो की विचरण भूमि थी ।

लोबनोरसेउतर- पूरब सइवाडः(शक ) रहते थे । ची - यू ने अपनी सुसंगठित सेना से यूचियो पर लगातार ऐसे जबर्दस्त आक्रमण किये  , जिसके कारण यूचियो को भारी क्षति हुई ओर 176  ईसा पूर्व या 174 ईसा पूर्व मे वह अपनी भूमि छोडकर पश्चिम की ओर भागने के लिये मजबूर हुए ।

सइवाडः ( शको ) की भूमि मे थोडा जाने के बाद यूचियो का एक भाग तरिम- उपत्यका की ओर चला गया ओर दूसरा इली - उपत्यका के रास्ते आगे बढा -- पहले भाग को लघु - यूची कहते हे ओर दूसरे को महा- यूची ।

लघु यूची के आने से पहले तरिम - उपत्यका उन्ही खसो ( कशो ) की थी  , जो कि उस समय भी कशमीर ओर पश्चिमी हिमालय तक फैले हुए थे । अब कुछ शताब्दीयो के लिए तरिम - उपत्यका लघु - यूचियो की हो गई ।
महा यूचियो ने सइवडः ( शको ) को खदेड कर उनकी जगह अपने हाथ मे ले ली ।

शक लोग अपने पश्चिमी पडोसी तथा त्यानशान ओर सप्तनद के निवासी वूसुन पर पडै । महा यूचियो को हूणो ने यहा भी चैन से नही रहने दिया ओर वह बराबर पश्चिम की बढते हुये सिर - दरिया ओर अराल समुन्द्र तक फैल गये । फिर वहा से दक्षिण की ओर घूमे । कुछ समय तक उनका केन्द्र वक्षु नदी के उतर मे था ।

इसी समय ग्रीको - बाख्त्री राजा हैलिवोक मरा था । कास्पियन तटवासी पार्थियो ओर सोग्द- उपत्यका मे पहुचे यूचियो ने उसके राज्य को आपस मे बाटकर इस यवन-राजवंश को खतम कर दिया ।

 सन्दर्भ :--
1 . A Thousand Years of  Tatars : E.  H . Parker, Shanghai - 1895
2. हुन्नू इ गुन्नी : क. इनस्त्रान्त्सेफ,  लेनिनग्राद - 1926
3. Histoire des Huns : Desqugue - Paris : 1756
4.  Histoire d' Attila et de ses successures : Am. Thierry - Paris : 1856

हूणराज - चूचेन (चीयू) (172 - 127 ईसापूर्व) महान धनुर्धर प्राचीन हूण राजवंश

हूणराज - चूचेन (चीयू) (172 - 127  ईसापूर्व)

महान धनुर्धर प्राचीन हूण राजवंश

Ancient Huna / Hoon Gurjars

ची यू के स्थान पर चूचेन शान - यू  ( राजा ) बना । चीनी ख्वाजासरा  ( किन्नर - हिजडा  ) अब भी प्रभावशाली मंत्री था । चीयू के पास भी चीन से नई राजकुमारी आई थी । तत्कालीन चीन सम्राट बू- ती ने उसे धोखे से पकडना चाहा भारी युध्द हुआ लेकिन हूण शान - यू फिर विजेता बन कर निकले ओर अब चीन ओर हूण के निरन्तर सघर्ष होने लगै ओर चीनी सीमांत हूणो की आक्रमण भूमि बना रहा ।

हूण राज ईचिसे - ( 127-117  ईसापूर्व ) 


यह पाँचवा शान - यू  ( राजा )  हूणराज चू- चैन  का भाई था । इसने भी चीन पर लगातार हमले जारी रखे उस समय चीन का सम्राट बूती था जो कि एक शक्तिशाली सम्राट था उसने भी हूणो का बल तोडने के लिये एक शक्तिशाली सेना का गठन किया ओर बडी भारी तैयारी करी चीन की इस बडी भारी सेना ने बूती के नेत्तृत्व मै हूणो की भूमि के एक भाग पर आक्रमण किया ओर कान्सू पर अधिकार कर लिया ।

कान्सू मे एक नगर चाड - वे था जहा कोई हूणो का सरदार रहता था ।
 इस नगर पर विजय के समय चीनी सेना को एक सोने की मूर्ति  ( स्वर्ण - मूर्ति ) मिली जिसकी हूण पूजा किया करते थे ।

 { इस स्वर्ण - मूर्ति  के  बारे मे जानकारी बाद मे विस्तार से दी जायेगी  }

यधपि  चीनी सेना हूणो को  यूचीयो की इस भूमि से  उतर की ओर धकेलने मे कामयाब हुई किन्तु उसे सदा की विजय नही समझती थी इसलिए चीनी सम्राट बूती ने अपने सेनापति चाडः - क्यान को अपने शत्रु हूणो के शत्रु यूचियो के पास भेजा,  कि पश्चिम से यूची भी हूणो पर आक्रमण करे ,  चीनी सम्राट ने यूचियो को अपनी पुरानी भूमि पर आकर वापस बसने का निमंत्रण दिया ।

चाडः - क्यान ( चीनी सेनापति ) 138 ईसा पूर्व मे अपनी यात्रा पर चला । यह चीन का प्रथम यात्री हे जिसका यात्रा विवरण बडा ही ज्ञानवर्धक हे । चाडः - क्यान दस साल हूणो का बन्दी रहा । जब वू- सूनो ने अपने को हूणो से स्वतंत्र कर लिया,  तो यह हूणो की नजरबंदी से भागकर वू - सून भूमि मे होते हुये खोकन्द पहुंचा । वहा के निवासी घुमन्तू नही थे बल्कि नगरो ओर ग्रामो के निवासी थे  ।

वहा से समरकंद होते वह यूचियो के केन्द्र बाख्तर मे पंहुचा । चाडः  - क्यान ने यूचियो को बहुत समझाने की कोशिश करी कि चीनी सम्राट बूती ने तुम्हारी जन्म भूमि  हूणो से खाली करवा ली हे ओर चीनी समाज सम्राट चाहते हे कि यूची लोटकर अपनी भूमि सम्हाल ले । लेकिन यूची भली प्रकार जानते थे कि घुमन्तु हूणो को जीतना वेसा ही अचिरस्थायी हे जैसा डेला फेकने पर काई का फटना ।

 यूची बाख्तर के विशाल राज्य के स्वामी हो आनन्द से जीवन बिता रहे थे इसलिये हूणो से झगडा मोल लेने के लिये तेयार नही थे ।

चाडः - क्यान को बदख्शां , पामीर ओर सिडःक्यि।डः होकर लोटना पडा । जहा वह हूणो की पहुच से बाहर नही रह सकता था । उसे फिर उनकी कैद मे रहना पडा ओर बारह वर्ष  ( 138 - 126  ईसापूर्व ) के बाद चीन लोटने का मोका मिल सका ।

115 ईसा पूर्व मे फिर उसे वसूनो के पास भेजा गया , जो इस्सिकुल महा सरोवर के पास त्यानशान मे रहा करते थे । चीन पश्चिम जाने वाले रेशम पथ ( Silk Routes ) को सुरक्षित तोर से अपने पास रखना चाहता था  , इसलिए  चाडः  - क्यान को दूसरी बार भेजा गया था ।
उसने पार्थिया आदि दूसरे देशो मे पता लगाने के लिये अपने दूत भेजे ओर लोटकर उसने चीनी सम्राट को पश्चिमी देशो के बारे मे रिपोर्ट दी ।

" मूल रिपोर्ट प्राप्य नही हे "

लेकिन सूमा- च्याडःने  99  ईसापूर्व मे अपनी पुस्तक  " शी - की " ओर पाडःकी ने 92  ईस्वी मे  " च्यान-शान-शूकी" मे उपयोग किया हे ।

पिछली पुस्तक मे 206  ईसापूर्व  स  24  ईस्वी तक का वर्णन हे । चाडः- क्यान पश्चिम से लोटने के बाद 114   ईसापूर्व मे मर गया । उसके विवरण के जो अंश मिलते हे  , उससे बहुत सी बातो का पता चलता हे । पार्थियन लोग चर्मपत्र पर आडी लाइन मे लिखते थे । फर्गाना से पर्थिया तक शक-भाषा बोली जाती थी ।

इशी- ज्या  ( 127 - 117 ईसापूर्व )
अच्ची( 117- 107  ईसापूर्व )
चान - सी - लू  ( 107  - 104  ईसापूर्व )
शूली- हू  ( 104 - 103  ईसापूर्व )
शू-ती- हू  ( 103 - 68  ईसापूर्व )
हू-लू-हू( 68 -  87  ईसापूर्व )

यह हूणो के 5 वे  शान - यू ( राजा ) के बाद शान -यू  ( राजा )  हुये ।
 जिनका समकालीन हान- वंशी सम्राट बूती ( 140  - 86 ईसापूर्व ) था  ।

 चिन वंश ने हूणो की शक्ति को तोडने के लिये जो प्रयत्न किया था  , समाप्ति  हान  वंश ने की थी ।

सन्दर्भ : 

1 . A Thousand Years of  Tatars : E.  H . Parker, Shanghai - 1895
2. हुन्नू इ गुन्नी : क. इनस्त्रान्त्सेफ,  लेनिनग्राद - 1926
3. Histoire des Huns : Desqugue - Paris : 1756
4. Excavation in Northan Mangolia - C.  Trever - Leiningrad

कुषाण सेनापति शूरवीर शालिवाहन - भाटी वंश के आदिपूर्वज | Origin History of Bhati Dynasty

कुषाण सेनापति शूरवीर शालिवाहन - भाटी वंश के आदिपूर्वज

शूरवीर शालीवाहन | वीर गुर्जर | कुषाण गुर्जर साम्राज्य | कुषाण सेनापति | भारत का इतिहास | भाटी वंश

'शूरवीर शालिवाहन' गुर्जर कसाणा सम्राट कनिष्क महान के महान सेनापति थे, जिन्होने गुर्जर कसाणा साम्राज्य के लिये,सम्राट कनिष्क के साथ मिलकर शक्तिशाली शको (क्षत्रप व महाक्षत्रप)  को हराकर कसाणा गुर्जर साम्राज्य के अधीन किया था.शको को पराजित करने पर सम्राट कनिष्क महान ने अपना राज्याभिषेक किया व शक संवत आरम्भ किया,शालिवाहन के पराक्रम के कारण इसे शालिवाहन शक संवत भी कहा जाता है। अफगानिस्तान व स्वात घाटी में शूरवीर शालिवाहन के वंशज आज भी पाये जाते है. आगे चलकर शूरवीर शालिवाहन के वंशज रिसाल गुर्जर ने पंजाब में रिसालकोट बसाया व कसाणो के अधीन राज किया,बहुत बाद में गुर्जरो के हूण राजवंश के सम्राट व तंवर(तोमर,तुअर) गोत्र के प्रवर्तक गुर्जर सम्राट तोमराण हूण ने स्यालकोट (रिसालकोट) को राजधानी बनाकर भारतीय उपमहादीप के बडे हिस्से पर शासन किया। आगे चलकर इसी वंश में भाटीराव के नाम पर इन्हें भाटी कहा जाने लगा।
कुषाण सेनापति शूरवीर शालिवाहन - भाटी वंश के आदिपूर्वज