रविवार, 29 मई 2016

सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण और पुनर्निर्माण का इतिहास | War of Somnath Temple, Gurjaratra

सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण और पुनर्निर्माण का इतिहास

War History of Somnath Temple, Gujarat (Gurjaratra)

सोमनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है। मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक गुर्जर राजाओं ने किया। आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी।

 गुर्जर नरेश शिलादित्य मैत्रक ( तृतीय , काल लगभग 720 ई) मैत्रक वंश गुर्जरो का प्राचीन वंश है, जिसकी स्थापना गुप्त वंश के एक गुर्जर सेनापति भट्टारक द्वारा 475 ई० में की गयी थी। वल्लभी इनके राज्य की राजधानी थी।

मैत्रक एक गुर्जर वंश का नाम है । मैत्रक का संस्कृत में अर्थ सूर्य होता है, इतिहासकारो के अनुसार मैत्रक मिहिर से बना शब्द है व जिनके पूर्वज कुषाण गुर्जर थे। व कुषाण गुर्जर साम्राज्य के पतन के बाद गुप्तो के अधीन राज्य किया।
मैत्रको ने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद स्वतन्त्र सत्ता प्राप्त की। सम्राट हर्षवर्धन की पुत्री का विवाह गुर्जर नरेश धारासेन मैत्रक से हुआ था।
गुर्जर नरेश शिलादित्य मैत्रक इस वंश के सबसे प्रतापी व पराक्रमी शासक हुए । शिलादित्य ने गुजरात से लेकर दक्षिण तक राज्य का विस्तार किया।इनके समय में बेहद प्रबल अरब आक्रमण हुए। मगर वीर गुर्जर सैना के संख्या में कम होने के बावजूद भी अरबो की विशाल व संसाधनो से परिपूर्ण सेना को पराजित कर जीत का डंका बजा देते थे।

इसके बाद गुर्जर सम्राट नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण किया। इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। इसके बाद गुजरात के गुर्जर शासक भीम और मालवा के गुर्जर सम्राट भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया।

अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२४ में कुछ ५,००० साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। ५०,००० लोग मंदिर के अंदर थे, प्रायः सभी कत्ल कर दिये गये।

 सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया। मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री वीर गुर्जर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के हैं। महमूद गजनी सन १०२६ में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था।

हमेशा विदेशीयो के निशाने और कई बार के हमलो के बाद भी ऐसा ही खडा है।इसका श्रेय इन पांचो वीरो की ही जाता है।


शनिवार, 28 मई 2016

गुर्जर प्रतिहार शैली का चौसठ योगिनी मंदिर । History of Chausath Yogini Temple of Gurjar Pratihar Dynasty

गुर्जर प्रतिहार शैला मे बना चौसठ योगीनी मंदिर और भारत के संसद भवन का इतिहास

Chausath yogini tenple of Gurjar Pratihar Dynasty & Indian Parliament
गुर्जर प्रतिहार राजवंश की कन्नौज राजधानी के बाद दूसरी सबसे बड़ी राजधानी ग्वालियर थी और यह गुर्जर प्रतिहार राजाओं की विशाल राज्य का कभी हिस्सा था। आज भी यहा पर गुर्जर प्रतिहार राजाओं द्वारा बनवाये गये किले, गढ़ी, बाउली, मंदिर और ऐसे बहुत सारे चीजे विद्यमान है जिनमे से यह एक है चौसठ योगिनी मंदिर ।
यह मंदिर 9 वी सदी मे गुर्जर प्रतिहार वंश के राजाओं द्वारा बनाया गया था इस मंदिर मे 101 खंबे और 64 कमरों मे एक एक शिवलिंग है मंदिर के मुख्य परिसर मे भी एक बड़ा शिवलिंग स्थापित है माना जता है की कमरे मे शिवलिंग के साथ देवी योगिनी की मूर्ति भी रही होगी पर यह योगिनियाँ अब दिल्ली संग्रहालय पर सुरक्षित है और इसी आधार पर इसका नाम चौसठ योगिनी पडा है 
Inside view of Gurjar Pratihar's Chausath yogini Temple

और सबसे बड़ी बात यह है ब्रिटिश वास्तुविद सर एडविन लुटियंस का बनाया गया हमारे भारत देश का संसद भवन भी इसी चौसठ योगिनी मंदिर के आकृति का है। जो इस गुर्जर प्रतिहार के मंदिर से चुराया था लुटियंस ने संसद भवन का डिजाइन। शायद जानकर हैरानी होगी कि भारतीय संसद के भवन का डिजाइन मध्य प्रदेश के 9वीं शताब्दी के एक शिव मंदिर की प्रतिकृति है जो कि मुरैना जिले के वटेश्वर में स्थित है . संसद भवन की जब भी बात होती है तो उसमें सर एडविन लुटियंस का जिक्र जरूर होता है, मगर संसद भवन बनाने की प्रेरणा लुटियंस ने जहां से ली, उसकी चर्चा न तो किताबों में है ना ही संसद की वेबसाइट पर .बल्कि दिल्ली गजट में भी संसद भवन के निर्माण और उसकी परिकल्पना का पूरा श्रेय लुटियंस को ही दिया गया है। हाँ मगर जिस समय संसद भवन का निर्माण हुआ था, उस वक्त अंग्रेजों का शासन था तो ब्रिटिश ने अपने अभिलेख में संसद भवन के डिजाइन को लुटियंस की खुद की सोच माना

मगर इतिहासकारों की मानें तो संसद की प्रतिकृति मध्यप्रदेश के मुरैना के मितावली में स्थित है जहाँ से लुटियंस ने संसद बनाने की प्रेरणा ली। बल्कि इतिहास में इसका कोई जिक्र नहीं है मितावली का यह चौसठ योगिनी शिवमंदिर मुरैना जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जहाँ पहुंचने के लिए सिंगललेन सड़क है, कई जगह जिसकी हालत खराब है। बेशक पर्यटकों को थोड़ी मुश्किल का सामना जरूर करना पड़ता है 
मगर उन्हें महसूस होगा कि यदि वे इस मंदिर को न देखते तो देखने के लिए बहुत कुछ छूट जाता । शिवमंदिर का निर्माण नौवीं सदी में तत्कालीन गुर्जर प्रतिहार राजवंश ने कराया था । मंदिर गोलाकार है, ठीक भारतीय संसद के भवन की तरह और गोलाई में चौसठ कमरे हैं ।  हर कमरे में एक-एक शिवलिंग है . इन कमरों में कभी भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां भी थीं इसका नाम देवी योगिनी की चौसठ मूर्तियों के कारण ही चौसठ योगिनी शिवमंदिर पड़ा। देवी योगिनी की काफी मूर्तियां ग्वालियर किले के संग्रहालय में रखी हैं । परिसर के बीचों-बीच एक बड़ा गोलाकार शिव मंदिर भी है। मुख्य मंदिर में 101 खंभे कतारबद्ध खड़े हैं, जो संसद भवन के गलियारे की याद दिलाते हैं 
chausath Yogini Temple of Gurjar Pratihar Dynasty


मंदिर के निर्माण में लाल-भूरे बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है।एक ओर जहां संसद की सुरक्षा और सुंदरता पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, वहीं अपनी पुरा संपदा को बचाने के लिए न तो केंद्र सरकार औ ना ही प्रदेश सरकार कोई कदम नहीं उठा रही यहां अनेको गुर्जर राजवंशो ने समयानुसार शासन किया और अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्य चकित किया। भारत देश हमेशा ही गुर्जर प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है। गुर्जर प्रतिहार राजवंश ने अरबी, तुर्की, मंगोल से 300 वर्ष मे 200 भयंकर युद्घ किए जिसमे से एक भी नही हारा । 
         
Outside Top view of Gurjar Pratihar's Chausath Yogini Temple

शुक्रवार, 27 मई 2016

कुचामन किले का इतिहास - Kuchaman Fort History

नागौर के कुचामन किले का इतिहास 

Kuchman Fort /Quila of Gurjar Pratihar King Nagbhat  - कुचामन किला - गुर्जर प्रतिहार राजवंश

कुचामन का किला राजस्थान के नागौर में स्थित है। यह किला राजस्थान के सबसे पुराने किलों में से है। यह किला पर्वत के सबसे ऊपरी हिस्से पर स्थित है जैसे के एक चील का घोंसला होता है । इसका निर्माण गुर्जर प्रतिहार वंश के महान गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रथम ने 750 ईo में कराया।। 
गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का संस्थापक "गुर्जर सम्राट नागभट्ट" द्वारा निर्मित यह किला राजस्थान में है। गुर्जर प्रतिहार वंश के शासनकाल में ऐसे कई किलो का निर्माण हुआ जिसमे मण्डौर, जालौर, कुचामन, कन्नौज, ग्वालियर के किले गुर्जर प्रतिहार राजाओं के अत्यधिक मात्रा में समृद्धि होने के 
का प्रमाण देते है। छठवीं शताब्दी से लेकर ग्यारहवीं शताब्दी तक इस प्रबल गुर्जर राजवंश ने हिन्दू धर्म को भारत से विलुप्त होने से बचाया है। लेकिन इनके कर्ज का बदला इनके इतिहास को विलुप्त करके दिया हमारे देश मे । 

300 वर्षो तक अगर विदेशी अरबों की आंधी को रोकने का पूर्णतयः श्रेय अगर किसी को जाता है तो वह केवल गुर्जर प्रतिहार राजवंश को है जिसने हरिश्चन्द्र, नागभट्ट, वत्सराज, मिहिरभोज, महेन्द्रपाल, महीपाल, वीरराजदेव जैसे वीर गुर्जर योद्धा दिये। भारत और भारत के वासी सदैव ही इस गुर्जर वंश के रिणी रहेगें। धन्य है ऐसे राजवंश को जिसने देश की रक्षा हेतु अपने प्राण न्यौछावर करदिए । कुचामन का किला अपने प्रखर और भीमकाय परकोटो, 32 दुर्गों, 10 द्वारो और विभिन्न प्रतिरोधक क्षमता वाला किला है। यह एकमात्र अनोखी वास्तुकला वाला किला है। इस किले में जल संरक्षण और प्रबंधन के अच्छे इंतेजाम है।।

किले में कई भूमिगत टैंक आज भी विद्यमान है   कुचामन किले में कई भूमिगत गुप्त ठिकाने, प्राचीन अंधकूप, कारागार हैं जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। वर्तमान मे अब ये हेरिटेज होटल में तब्दील हो गया है और यहा बौलीवुड फिल्मो की सूटिंग होती है।
Kuchaman Fort, Nagor, Rajasthan | गुर्जर प्रतिहार , कुचामन किला , नागौर, राजस्थान

गुरुवार, 26 मई 2016

गुर्जर सम्राट बप्पा रावल / Gurjar Samrat Bappa Rawal

गुर्जर सम्राट बप्पा रावल


Gurjar Samrat Bappa Rawal

गुर्जर सम्राट बप्पा रावल
(शासनकाल 734-753) गुहिल गुर्जर वंश मेवाड का वीर शासक था। उदयपुर रियासत की स्थापना आठवीं शताब्दी में गुहिल गुर्जरो ने की थी। गुहिल गुर्जर वंश गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के अधिन राजवंशो मे से एक था । बप्पा रावल को 'कालभोज' भी कहा जाता था। जनता ने बप्पा रावल के प्रजासंरक्षण, देशरक्षण आदि कामों से प्रभावित होकर ही इसे 'बापा' पदवी से विभूषित किया था। हरियाणा के पानीपत जिले मे इनके नाम पर गाँव बापोली (बप्पा वाली) भी है। जंगा सभी गुर्जर रावल गौत्र के है।
राज्यकाल
महाराणा कुंभा के समय में रचित एकलिंग महात्म्य में किसी प्राचीन ग्रंथ या प्रशस्ति के आधार पर बप्पा रावल का समय संवत 810 (सन 753) ई. दिया है। एक दूसरे एकलिंग माहात्म्य से सिद्ध है कि यह बप्पा रावल के राज्यत्याग का समय था। यदि बप्पा रावल का राज्यकाल 30 साल का रखा जाए तो वह सन् 723 के लगभग गद्दी पर बैठा होगा। गुहिल वंश गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का अधिन गुर्जर वंश था । 
अरबों का आक्रमण
बप्पा रावल की विशेष प्रसिद्धि गुर्जर प्दुर्जर  के साथ अरबो से सफल युद्ध करने के कारण हुई।अरबों ने चारों ओर धावे करने शुरू किए जिनका जवाब गुर्जर प्रतिहारो ने बखूबी दिया। सन् 712 ई. में बप्पा रावल ने मुहम्मद बिन कासिम से सिंधु को जीता। । गुर्जरदेश के महान गुर्जर सम्राट् नागभट (प्रथम) और बप्पा रावल के नाम उल्लेख्य हैं। गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रतिहार (प्रथम) ने अरबों को गुर्जरदेश से मार भगाया। बापा ने यही कार्य मेवाड़ और उसके आसपास के प्रदेश के लिए किया। 



बुधवार, 25 मई 2016

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के सिक्के और धन व्यवस्था का इतिहास / Coins of Gurjar Samrat Mihir Bhoj

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के सिक्के और धन व्यवस्था का इतिहास 

Coin of Gurjar Samrat Mihir Bhoj
गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णू के अवतार के तौर पर जाना जाता है।इनके पूर्वज गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और गुर्जर साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।
मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी । इनके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यइनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी
भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में इन्हे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे गुर्जर सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।
विश्व की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें 8,00,000 से  ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिर भोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।
Coins of Gurjar Samrat Mihir Bhoj - Gurjar Pratihar Empire

गुर्जर प्रतिहारोने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है। यहां अनेको गुर्जर राजवंशो ने समयानुसार शासन किया और अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्य चकित किया। भारत देश हमेशा ही गुर्जर प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है कि गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य ने दस्युओं, डकैतों, इराकी,मंगोलो , तुर्कों अरबों से देश को बचाए रखा और
देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।
गुरूकुल झज्जर में रखी हुई है गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के शासन काल की मुद्राएँ।



गुरुवार, 19 मई 2016

गुर्जर प्रतिहार शैली के बटेश्वर मंदिरो का इतिहास / History of Bateshwar Temples of Gurjara Pratihara

गुर्जर प्रतिहार शैली में बने बटेश्वर मंदिरों का इतिहास 

गुर्जर प्रतिहार वंश द्वारा बनाए गए 200 बटेश्वर मंदिर का चित्र / Bateshwar Temple in Region of Gurjar Pratihar Rajvansh

गुर्जर प्रतिहार राजवंश के शासन काल के समय बनवाये गये बटेश्वर मंदिर, पडावली मंदिर, चौसठ योगिनी इत्यादी सैकडो मंदिर बने।

एस. के. द्विवेदी ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य पर भी चर्चा की और बताया की आज अगर हिन्दू धर्म भारत में बचा हुआ है उसका श्रेय गुर्जर प्रतिहार राजवंश को जाता है। जिन्होंने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है।

गुर्जर प्रतिहारो का इतिहास सौ 300 वर्षों का न होकर हजारो वर्षो का यह कटु सत्य है कि इस धरती पर स्थाई रुप से किसी राजवंश ने शासन नही किया है। यहां अनेको गुर्जर राजवंशो ने समयानुसार शासन किया और अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्य चकित किया।
भारत देश हमेशा ही गुर्जर प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है।
आइये जानते है बटेश्वर के इतिहास को जो गुर्जर प्रतिहार शैली पर बना है जो अपने आप मे एक अदभुत कला है।

बटेश्वर मंदिर का इतिहास : 

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज और उनके बनाए हुए मंदिरा का चित्र / Gurjar Samrat Mihir Bhoj - Bateshwar Temple 

Bateshwar Temples were bulit by Gurjar Pratihara in 8-10th Century 

मध्यप्रदेश के मुरैना से लगभग पचीस किलोमीटर दूर चम्बल के बीहड़ों में एक जगह पड़ती है "बटेश्वर तीर्थ" वहां आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच गुर्जर प्रतिहार राजवंश द्वारा बनवाई गई अब तक सबसे बेहतरीन कला है करीब एक ही जगह पर 200 मंदिरों का निर्माण किया गया था।।
इन मंदिरों का निर्माण गुर्जर प्रतिहार राजवंश के सम्राट मिहिर भोज के शासनकाल से प्रारम्भ हुआ और गुर्जर सम्राट विजयपाल प्रतिहार के शासनकाल के समय इन मंदिरों का निर्माण कार्य पूरा हुआ।। भगवान् शिव और विष्णु को समर्पित ये मंदिर खजुराहो से भी 300 वर्ष पूर्व बने थे चम्बल में डाकुवों के आतंक के कारण ये और भी उपेक्षित रहे और लगभग सारे के सारे गिर चुके थे।।

• मंदिरो का पुनर्निमाण :

के के मुहम्मद बताते हैं कि जब पुनर्निर्माण का कार्य चल ही रहा था तो पहाड़ी के ऊपर के एक मंदिर में एक व्यक्ति उन्हें मिला जो बैठा बीड़ी पी रहा था.. के के साहब को गुस्सा आया और उन्होंने उस से कहा कि "तुमको पता है कि ये मंदिर है.. और तुम यहाँ बैठ के बीड़ी पी रहे हो?".. वो आगे बढे उसे वहां से निकालने के लिए तभी उनके एक अधिकारी ने पीछे से आके उनको पकड़ लिया और बीड़ी पीने वाले व्यक्ति की तरफ इशारा करके बोला "अरे आप इन सर को नहीं जानते हैं.. इन्हें पीने दीजिये".. के के मुहम्मद समझ गए कि ये निर्भय सिंह गुर्जर है.. और कहते हैं कि "मैं उसके चरणों में बैठ गया और उसे समझाने लगा कि एक समय था कि आपके ही वंश के लोगों ने इन मंदिरों को बनाया था.. और अगर आपके ही पूर्वजों की इन अनमोल धरोहर और मूर्तियों को अभी न बचाया गया तो ये समय के साथ गायब हो जायेंगी.. इसलिए क्या आप हमारी मदद नहीं करेंगे इनके पुनर्निर्माण में?".. निर्भय को के के मुहम्मद कि बात समझ आ गयी और उसने अपना पूरा सहयोग दिया उन्हें इन मंदिरों के पुनर्निर्माण में।

के के मुहम्मद कि वजह से आज सौ से भी अधिक मंदिर वहां अपने पुराने रूप में लाये जा चुके हैं.. के के मुहम्मद  इन मंदिरों को अपना तीर्थ मानते हैं.. और चाहते हैं कि आने वाले समय में इस स्थान को तीर्थ यात्रा के रूप में मान्यता मिले.. भारत के विभिन्न स्थानों पर जाने कितने मंदिरों का जीर्णोद्वार किया है के के मुहम्मद ने अब तक.. उनको मंदिरों और भारतीय मान्यातों का बहुत गूढ़ ज्ञान और श्रद्धा है.. और बिना श्रद्धा के इस तरह का पुनर्निर्माण संभव नहीं होता है। भारतीय पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर (ASI) "के.के मुहम्मद" ने इन मंदिरों को पुनर्स्थापित करने का जिम्मा उठाया हैं।।
और आज गुर्जर प्रतिहारो द्वारा बनावाये दो सौ भी अधिक मंदिर वहां अपने पुराने रूप में लाये जा चुके हैं। के के मुहम्मद इन मंदिरों को अपना तीर्थ मानते हैं और चाहते हैं कि आने वाले समय में इस स्थान को तीर्थ यात्रा के रूप में मान्यता मिले ।के.के. जी ने भारत के विभिन्न स्थानों पर कई मंदिरों का जीर्णोद्वार किया है।।

के के मुहम्मद मंदिरों और भारतीय मान्यातों का बहुत गूढ़ ज्ञान और श्रद्धा रखते है, और बिना श्रद्धा के इस तरह का पुनर्निर्माण संभव नहीं होता है ।।

बटेश्वर मंदिर के अलावा भी गुर्जर प्रतिहारो ने कई चीजो का निर्माण किया था जिसमे पडावली मंदिर, चौसठ योगिनी मंदिर आदि इनके अलावा सैकडो इलाके व ठिकाने है जहाँ गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी कला बनाई । 

मंगलवार, 17 मई 2016

गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य द्वितीय / Gurjar Samrat Vikramaditya Chalukya

गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य द्वितीय


सातवी सदी में गुर्जरत्रा ही नहीं बल्कि पूरे भारत के सबसे बडे राजा थे सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य । तत्कालीन भारत के वे सम्राट थे जो गुर्जरसंघ के गुर्जराधिपति थे। वे चालुक्य गुर्जर राजवंश के गुर्जर सम्राट पुलकेशिन चालुक्य जनाश्रयी के बाद सबसे प्रतापी व महान राजा हुए।
भारतवर्ष के इतिहास में विक्रमादित्य नाम के कई राजा हुए जो अपने नाम के अर्थ यानी पराक्रम के सूर्य को सार्थक करते हुए अमरता व महानता को प्राप्त हुए ।
पहले विक्रमादित्य राजा जिन्हें अधिकांश इतिहासकारो ने काल्पनिक माना है उज्जैन के विक्रमादित्य थे, जिन्हें विक्रम संवत का प्रवर्तक माना जाता है।
दूसरे विक्रमादित्य गुप्तवंश के चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य जोकि महान शासक थे।
तीसरे विक्रमादित्य चालुक्य गुर्जर वंश के हुए जोकि महान यौद्धा व शासक थे। सातवी सदी में ये गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रतिहार के साथ भारत के सबसे पराक्रमी यौद्धा व शासको में गिने जाते हैं ।
ये चालुक्यो की बादामी शाखा के शासक थे। उसी समय पश्चिमोत्तर भारत यानी गुर्जरदेश की सीमाओ पर अरबी आक्रमणकारियो के लगातार आक्रमण हो रहे थे व गुर्जरो के सारे राजवंश उनसे जूझ रहे थे।
मुहम्मद बिन कासिम के बाद जुनैद पूरे लाव लश्कर के साथ, बेहद बडी सेना के साथ,जेहाद के जुनून में रंगा हुआ, इराक,ईरान,अफगानिस्तान, तुर्की, सीरिया आदि देशो की मिलीजुली विशालकाय सेना के साथ गुर्जरत्रा की सीमाओ पर क्रूरता बर्बरता की हदे पार करने को खडा था।
ठीक उसी समय उत्तर भारत में गुर्जरो का एक बेहद वीर व पराक्रमी व महत्वाकाँक्षी युवक वीर नागभट्ट प्रतिहार गुर्जरो का एक नया साम्राज्य खडा करने को युद्ध पर युद्ध लड रहा था। उधर दक्षिणी भारत में चालुक्य साम्राज्य गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य के हाथो में था। मरूगुर्जरदेश में चित्तौड के मान सिहँ मोरी के युवा सेनापति कालभोज गुहिलोत यानी बप्पा रावल जो कि गहलौत वंश के गुर्जर थे। बहुत से इतिहासकार मान सिहँ मोरी को भी गुर्जर वंश का स्वीकारते हैं।
इस अरबी तूफान को गुर्जर कुचलने को आतुर हो उठे व गुर्जरो ने पराक्रम व वीरता की नयी इबारत लिखने को कमर कस ली।
युद्ध सालो तक चला जिसे राजस्थान के युद्ध के नाम से इतिहासकार पुकारते हैं।
अब समय आ गया था निर्णायक युद्ध का, परिणाम का।
गुर्जरो की संयुक्त सेना गुर्जरत्रा से बाहर निकलकर अरबो पर टूट पडी। 

गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रतिहार ।।
गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य ।।
वीर गुर्जर सेनापति बप्पा रावल ।
वीर गुर्जर पुलकेशिन अवनिजनाश्रयी ।।
वीर गुर्जर नरेश शिलादित्य मैत्रक ।।

इन सब वीर गुर्जरो ने अरबो को वो तांडव दिखाया कि अरबी इतिहासकार लिखते हैं कि गुर्जरो ने व उनके राजाओ ने अरबो को भागने के लिये कोई जगह ही नहीं छोडी। 
अरब मैदानो को छोडकर भाग गये व जुनैद को नागभट्ट ने भाले की नोक पर टांग दिया। सालो तक अरबो ने भारत पर आक्रमण की हिम्मत नहीं जुटायी।
गुर्जरो की संयुक्त सेना का नेतृत्व वीर नागभट्ट प्रतिहार ने किया था। नागभट्ट प्रतिहार उस समय उज्जैन के सम्राट थे।
गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य सच्चे अर्थो में विक्रमादित्य थे यानी पराक्रम के सूर्य।
उन्ही के बलबूते गुर्जरत्रा के सभी गुर्जर नरेश एक जगह आये व नागभट्ट का नेतृत्व स्वीकार किया राष्ट्र रक्षा के लिये।
कोटि कोटि नमन गुर्जर सम्राट विक्रमादित्य चालुक्य को।