बुधवार, 1 मार्च 2017

गुजरात, गुर्जरात्रा, गुर्जरदेश - Gujarat, Gurjaratra, Gurjardesh

गुजरात,  गुर्जरात्रा, गुर्जरदेश - Gujarat, Gurjaratra, Gurjardesh


गुजरात शब्द सस्कृत के शब्द गुजरात्रा अथवा प्राकृत के गुजराता से निकला हे जिसका अर्थ है गुर्जरो का दैश अथवा गुर्जरो दवारा रक्षित क्षेत्र ।

Ancient Gujarat / प्राचीन गुजरात


गुजरात  ( काठियावाड - भारत ) , गुजरात,  गुजरावाला , गुजरखान ( पाकिस्तान ), गुजरस्थान (गजनी  के पास अफगानिस्थान),  गुजरस्तान (जॉर्जिया ), गुर्जर घार (ग्वालियर ), गुर्जरी बाजार ( पटना - बिहार,  मेरठ - उ.प्र.) गुर्जर ताल  ( बाडमेर - राजस्थान, जौनपुर - उ.प्र  ), गुर्जर नदी  ( बलूचिस्तान -पाकिस्तान ) पोषवाल मन्डी ( जददा-सउदी अरब ) गुर्जर खासी  ( अफगानिस्थान ) खटाना खील व कसाना खील कबाइलि प्रान्त ( अफगानिस्थान ) भाजन गुर्जरी(जलगांव -महाराष्ट्र ) गुर्जर पाल  (भोपाल -मध्यप्रदेश ) गुर्जर नगर  (जम्मू ) गुर्जर घाटी ( जयपुर- राजस्थान ) आदि गुर्जरो के प्रतीक चिन्ह हे।

 पचंतन्त्र मे कथा आती हे जिसके अनुसार गुर्जर दैश जहा ऊटो का मेला लगता था । यह वर्णन मिलता हे कि एक रथकार इस गुर्जर देश मे ऊंट लेने के लिए गया ।
 ( समचीनो यं वयापार: तब सम्पतिश्चैद् कुतो अपिधनिका यत्किचिदद्रव्यमादाय  मया गुर्जदेशे गन्तव्यं करभग्रहणाय। ततशय गुर्जरदेशे गत्वोष्टिं गहीत्वा स्वगृहमागत : । )

गुजरात से लेकर काश्मीर तक का पूरा इलाका "गुर्जर दैश" के नाम से जाना जाता था ।

Ref:
1.  पंचतंत्र अप कथा -14
2. कीलहार्न सस्करण अप-पृष्ठ - 32 ( सर जान मार्शल )






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27 टिप्‍पणियां:

  1. गुज॔रो के बारे मे राजपूत प्रतिहार गलत जानकारी देरा है। मेने http://pratiharas.blogspot.in/2016/03/pratihar-parihar-vansh-and-king-mihir.html?m=1 देखा है कृपया इनके blog पर गुज॔रो का ईतिहास डाले।

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  2. Pratihar vans
    Raja harishchandra Pratihar king of Mandore, Rajasthan / मण्डौर प्रतिहार वंश के संस्थापक राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार



    मित्रों आज की इस पोस्ट के द्वारा हम आपको मण्डौर प्रतिहार वंश के संस्थापक राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार जी के बारे में जानकारी देंगे।।

    मण्डौर वर्तमान में राजस्थान के जोधपुर जिले मे है यहाँ राठौड़ राजपूतों के आगमन के पहले यह स्थान कभी प्रतिहार राजपूतों के अधीन था और यह प्रतिहारों का सबसे प्राचीन राज्य भी था यही से प्रतिहार/परिहार राजपूत वंशजो की शाखाएँ निकलकर विस्तृत हुई जिनमे जालौर, कन्नौज, उज्जैन, ग्वालियर नागौद, अलीपुरा मुख्य रुप से है यहां आज भी प्रतिहार राजपूत अच्छी संख्या में आबाद है। 

    550 ईस्वीं के लगभग जोधपुर अंचल में हरिश्चन्द्र प्रतिहार द्वारा स्थापित यहां प्रतिहारों की शाखा है। इसकी राजधानी माण्डव्यपुर थी। भीनमाल जोधपुर तथा घटियाला अभिलेखों द्वारा इस शाखा के ग्यारह शासकों की जानकारी मिली है। राजा विप्र हरिश्चंद्र वेदशास्त्र पारंगत प्रतिहार/परिहार वंश के गुरु अर्थात पूर्वज थे। राजशेखर महेन्द्रपाल को 'रघुकुलतिलक' और रघुग्रामणी तथा महिपाल रघुवंशमुक्तामणि जैसे विशेषण देता है। श्री ए.के. व्यास का कथन है कि "विप्र" शब्द क्षत्रिय राजाओं के लिए रीषि अर्थ में प्रयोग किया गया है। यह क्षत्रिय वर्ण का था इसी वंश का इतिहास बाद के अभिलेखों में बाउक के जोधपुर अभिलेख और ककुक्क के अभिलेखों से प्राप्त होता है। इनमें दी गई वंशावलियों में अंतिम राजाओं में अवश्य अंतर है, परंतु वंशावली समान है

    राजा हरिश्चंद्र बहुत ही योग्य और वीर शासक था इसने लगभग 550 ईस्वीं के लगभग राजपूताना जोधपुर के पास के क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और मण्डौर को अपनी राजधानी बनाया। बाउक के जोधपुर अभिलेख के अनुसार राजा हरिश्चंद्र ने मण्डौर नामक स्थान पर शत्रुओं को आतंकित करने वाला दुर्ग भी बनवाया। राजा हरिश्चंद्र की दो पत्नियां थी पहली बडी पत्नी से सहचरी देवी से चार पुत्र भोजभट्ट, कक्क, रज्जिल, दद्द उतपन्न हुए। इन क्षत्रिय कुमारों ने मण्डौर का दुर्ग जीतकर उसकी प्राचीरों को ऊँचा किया। 

    घटियाला अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रतिहार वंश की परंपरा तीसरे भाई रज्जिल प्रतिहार से प्रारंभ हुई। इस प्रकार प्रतिहार सत्ता का प्रारम्भ "मण्डौर - मेढ़ता " से हुआ। संभवतः रज्जिल के बाद नगभट्ट प्रतिहार (600 - 625) हुआ।

    नगभट्ट प्रतिहार ने मेदांतपुर को अपनी राजधानी बनाया।उसके पुत्र तट और भोज दोनो क्रमशः 675 ईस्वीं तक राज्य किया। तट के पराक्रमी पुत्र यशोवर्धन ने शालवंशी प्रथुवर्धन को पराजित किया जिससे वह पूर्व में हार गया था।।

    यशोवर्धन के बाद कंदुक गद्दी पर बैठा। कंदुक ने उतराधिकारी शीलुक ने भट्टी देवराज को परास्त किया। शीलुक के ही शासनकाल में अरब आक्रमणकारी जुनैद आया था। उसके पश्चात (750 - 825) ईस्वीं के मध्य क्रमशः जोट भिलदित्य और कक्क इस वंश में हुए। कक्क ने कन्नौज मालवा शाखा के शासक नागभट्ट द्वितीय के साथ मिलकर गौड़ नरेश को पराजित किया। 837 ईस्वीं के जोधपुर अभिलेख में प्रतिहार वंश से संबंधित विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई। प्रतिहार के बाद उसका सौतेला भाई कक्कुक गद्दी पर बैठा। प्रतिहार राजपूतों के उत्तर भारत में कई राज्य थे। जिनमें अलग अलग प्रतिहार नरेश शासन करत थे। लेकिन वह सभी मण्डौर से ही संबंधित थे। प्रतिहारों की भारत में ज्येष्ठ गद्दी एवं प्राचीन राज्य मण्डौर है। क्योंकि जितने भी प्रतिहार राजपूत है भारत में उन सभी के पूर्वज मण्डौर के ही वंशज है। मण्डौर के बाद भारत मे प्रतिहार राजपूतों की सबसे बडी रियासत नागौद बरमै राज्य है जो 1950 तक काबिज रही यहां आज भी 20 से 25 हजार प्रतिहार निवास करते हैं।

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    1. बेटा तु पहले मंडोर को राजपुत ही साबित कर दे , राजपुत शब्द ही १२वी सदी मे आया ,हर किसी को बाप बनाना‌ बंद करो समझा

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  3. प्रतिहार वंश के महान राजा

    (1) राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार
    (2) राजा नागभट्ट प्रतिहार
    (3) राजा यशोवर्धन प्रतिहार
    (4) राजा वत्सराज प्रतिहार
    (5) राजा नागभट्ट द्वितीय प्रतिहार
    (6) राजा मिहिर भोज प्रतिहार
    (7) राजा महेन्द्रपाल प्रतिहार
    (8) राजा महिपाल प्रतिहार
    (9) राजा विनायकपाल प्रतिहार
    (10) राजा महेन्द्रपाल द्वितीय प्रतिहार
    (11) राजा विजयपाल प्रतिहार
    (12) राजा राज्यपाल प्रतिहार
    (13) राजा त्रिलोचनपाल प्रतिहार
    (14) राजा यशपाल प्रतिहार
    (15) राजा वीरराजदेव प्रतिहार (नागौद राज्य के संस्थापक ) 

    भारत के शौर्य एवं बलिदान की भावभूमि वाले इतिहास में क्षत्रियों का प्रतिहार वंश मण्डौर, उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, नागौद आदि को एक के बाद एक अपनी शक्ति का केंद्र बनाकर सदियों तक पूरे उत्तरी भारत पर शासन करता रहा खासकर मारवाड़ मे सीहाजी के पाली प्रवेश से पूर्व तथा प्रवेश के बाद तक मण्डौर पर प्रतिहारों का एकछत्र शासन रहा है। वि. सं. 1300 (ईस्वी सन 1243) पूर्व तक प्रतिहार ही मारवाड़ के शासक थे। 
    प्रतिहारों का इतिहास व शासन कोई एक - दो शताब्दियों का नहीँ होकर सैकड़ो शताब्दियों का है। अतः इनके इतिहास में अंतराल व भ्रांतियाँ आना स्वाभाविक ही है।

    प्रतिहार सूर्यवंशी क्षत्रिय है जो कि अयोध्या के नरोत्तम राजा रामचंद्र के अनुज लक्ष्मण के वंशज है। क्योंकि वनवास के काल में लक्ष्मण ने राम और सीता जी के प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य किया था। अतः उन्हें प्रतिहार की उपाधि से विभूषित किया गया था। यह मत मरुनरेश बाउक प्रतिहार के नौवीं सदी के शिलालेखों में भी वर्णित है।

    राजा मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में वि. सं. 900 में प्रतिहार राजपूतों को सुमित्रा पुत्र लक्ष्मण का वंशज बताया गया है।

    सौमित्रिस्तिव्रदंड : प्रतिहरण विधेर्य: प्रतिहार आसीत।।

    बाउक प्रतिहार के नौवीं शताब्दी के शिलालेखानुसार --

    स्वभ्राता रामभद्रस्य प्रतिहायॆ कृतयत:।।
    श्री प्रतिहार बडशोययतशचोतिमानुयात।।

    मित्रों ऐसे हजारों शिलालेखों और अभिलेखों मे प्रतिहार राजपूतों को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया है। क्योंकि अग्नि और सूर्य एक समान है जिस कारण ही प्रतिहार/परिहार राजपूत अग्निवंशी भी कहलाते है। पर यह मूलतः सूर्यवंशी क्षत्रिय है।
    == प्रतिहार क्षत्रिय वंश की शाखाएँ ==

    (1) डाभी
    (2) बडगुजर (राघव)
    (3) मडाढ और खडाढ
    (4) इंदा
    (5) लल्लुरा / लूलावत
    (6) सूरा 
    (7) रामेटा / रामावत
    (8) बुद्धखेलिया
    (9) खुखर 
    (10) सोधया
    (11) चंद्र
    (13) माहप
    (14) धांधिल 
    (15) सिंधुका
    (16) डोरणा
    (17) सुवराण
    (18) कलाहँस
    (19) देवल 
    (20) खरल 
    (21) चौनिया
    (22) झांगरा
    (23) बोथा
    (24) चोहिल
    (25) फलू
    (26) धांधिया
    (27) खखढ
    (28) सीधकां 
    (29) कमाष / जेठवा
    (30) सिकरवार

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    1. तेरे लिखने से क्या होता है बे चप्पल चोर

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    2. बेटा प्रतिहार गुर्जरो मे‌ गोत्र होता है , राजपुत कोई जाति नही थी १२वी सदी मे‌ जब गुर्जर राजा कमजोर हुए तब गुर्जरो की गोत्रो व अन्य जातियो के मिलकर एक संगठन/वर्ग बनाया जिसे राजपुत ( राजा के पुत्र) बोला गया जो बाद मे जाति मे बदल गया

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  4. ये नही पता है कि मिहिर भोज प्रतिहार के वंशज नागौद राज्य के प्रतिहार राजपूत है मित्रों मिहिर भोज प्रतिहार कन्नौज को देश की राजधानी बनाकर 50 वर्षो तक शासन किया। इनके मृत्यु के बाद कुछ वर्षों तक इनके पुत्र महेन्द्रपाल प्रतिहार ने शासन किया। फिर गजनी के मोहम्मद ने कन्नौज पर आक्रमण कर नगर जलाकर अपने राज्य मिला लिया था महेन्द्रपाल और उनकी छोटी सेना सामना न कर विंध्य क्षेत्र (बुंदेलखण्ड) यहाँ आ गये थे। फिर परिहार दल ने व्यारमा नदी के तट पर भगवान शिव का ध्यान पूजन कर मंदिर का निर्माण किया और एक नये राज्य की स्थापना की जिसका नाम बरमै राज्य रखा। नागौद प्रतिहार वंश की गद्दी आज भी बरमै गद्दी के नाम से जानी जाती है।

    (3) मित्रों आज कल प्रतिहार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ में परिहार के नाम से जाने जाते है एवं राजस्थान के प्रतिहार आजकल पडिहार एवं गुजरात के प्रतिहार लोग पढियार नाम से जाने जाते है।

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  5. Pratihara / Pratihar / Parihar Rulers of india

    Refrence : -
    (1) प्रतिहारों का मूल इतिहास लेखक - देवी सिंह मंडावा
    (2) विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास लेखक - डा अनुपम सिंह
    (3) परिहार वंश का प्रकाश लेखक - मुंशी देवी प्रसाद
    (4) नागौद परिचय लेखक - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी
    (5) मण्डौर का इतिहास लेखक - श्री सिंह

    जय चामुण्डा देवी।।
    नागौद रियासत

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    1. बेटा तुम लोग कितना भी गुर्जरो का इतिहास चुराने का प्रयास कर लो लेकिन अभिलेख, शिलालेख व उस समय का इतिहास को कैसे झुटलाओगे? बेटा उस समय के प्रमाण चीख चीख कर बोलते है की हम गुर्जर थे

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  6. राजपूत कोई जाति नहीं है।गुर्जरो के सामंत ,ठिकानेदार आदि जोकि गुर्जर व अन्य थे, राजपूत कहलाए ।
    शासक गुर्जर ही थे ।इतिहास में राजपूत शब्द नहीं मिलता।

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    1. यह चप्पल चोर नहीं समझेंगे

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    2. आज के समय मे गुजरो में प्रतिहारों के कितने गांव हैं नोएडा के गुजरो को छोड़कर आज भी गुजरो की स्थिति दयनीय है गाय भैंस पालकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं

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    3. तुम राजपुतो से तो बेहतर ही है

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  7. राजपूत,राजपूत नहीं थे। राजपुताने पर शासन करने के कारण ये राजपूत कहलाए ।

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