मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

भारत को सोने की चिडिया की संज्ञा गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज के शासनकाल मे मिली थी | Bharat (Ancient India) was first adressed as Golden Bird in reign of Gurjar Pratihar King Mihir Bhoj

भारत को सोने की चिडिया की संज्ञा गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज के शासनकाल मे मिली थी

Bharat (Ancient India) was first adressed as Golden Bird in reign of Gurjar Pratihar King Mihir Bhoj
सौने की चिडिया | Golden Bird

गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णू के अवतार के तौर पर जाना जाता है।इनके पूर्वज गुर्जर सम्राट नागभट्ट प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और गुर्जर साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।
मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी । इनके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। यइनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी
भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में इन्हे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे गुर्जर सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है।
विश्व की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें 8,00,000 से  ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिर भोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।

गुर्जर प्रतिहारोने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है। यहां अनेको गुर्जर राजवंशो ने समयानुसार शासन किया और अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्य चकित किया। भारत देश हमेशा ही गुर्जर प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है कि गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य ने दस्युओं, डकैतों, इराकी,मंगोलो , तुर्कों अरबों से देश को बचाए रखा और
देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।

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बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

जुनबिल हूण ( गुर्जर की खाप श्वेत हूण की एक शाखा ) | Zunbil Hun (Branch of White Hun Gurjars)

जुनबिल हूण ( गुर्जर की खाप श्वेत हूण की एक शाखा )

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Zunbil huna Gurjar | Gurjar Vs Arab Wars


जुनबिल हूणो ने लगभग ढाई सौ सालो तक हिन्दुकुश पर्वत के उत्तर में राज किया। ये भाग आजका अफगानिस्तान का बडा भूभाग है।
इन्हें जुन्बिल क्यों कहा जाता था ? गुर्जर हूणो की यह शाखा एक जून देवता की पूजा करती थी यह जून देव सूर्यदेव यानी मिहिर का दूसरा रूप है। जून भगवान की पूजा करने के कारण ही ये जुन्बिल कहलाये।
तत्कालीन जुन्बिल साम्राज्य में जून का एक बेहद सुन्दर व बडा मन्दिर भी था जिसे बाद में अरब आक्रमणकारियो ने तोड दिया था। यह हूणो की वह शाखा थी जो जाबुलिस्तान में थी व इनकी एक शाखा ने गुर्जरदेश में जाबुलपुर यानी जालौर बसाया। 610 ई० से 710 ई० तक जुन्बिलो व अरब आक्रमणकारियो के बीच युद्ध चले । जुन्बिलो ने कई भीषण युद्धो में हराकर अरबो को भगाया मगर ईस्लामिक साम्राज्य की बढती ताकत धार्मिक उन्माद से हर बार आ रही थी ।

जुनबिल हूणो को आज इतिहास में भुला दिया गया है जो कि गुर्जरो के पराक्रम को कम करने का कुत्सित प्रयास है।
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सोमवार, 2 जनवरी 2017

उमराव सिंह परमार गूर्जर, माणकपुर 1857 का गदर | Umrao Singh Parmar Gurjar (Manakpuria) - 1857 Revolt

उमराव सिंह परमार गूर्जर, माणकपुर 1857 का गदर | Umrao Singh Parmar Gurjar (Manakpuria) - 1857 Revolt

Umrao Singh Manikpuria / उमराव सिंह मनिकपुरिया


उत्तर प्रदेश के सहारनपुर क्षेत्र के लोगों ने सबसे पहले 1822-1825 ई0 राजा विजय सिंह गुर्जर व कल्याण सिंह गुर्जर के नेतृत्व में अंग्रेंजी राज को भारत को उखाड़े फैंकने का श्रीगणेश किया था। ऐसे ही 'धनसिंह कोतवाल के नेतृत्व मे 1857 की क्रान्ति की शूरूआत हुई। जैसे ही 1857 की क्रान्ति की ज्वाला धधकी सहारनपुर के गुर्जर अंग्रेंजी हकूमत से उनके साथ हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिये उतावले हो गये । माणकपुर के निवासी उमराव सिंह को जो इस क्षेत्र के प्रभावशाली एवं दबंग व बहादुर व्यक्ति थे वहां की गुर्जर जनता ने उसे अपना राजा घोषित कर दिया ।उनका गोत्र परमार था l जिस प्रकार दादरी के गुर्जर राजा उमराव सिंह भाटी दादरी, राव कदम सिंह गूर्जर परीक्षितगढ़ की राजाज्ञाएं निकलती थी उसी प्रकार माणकपुर के उमराव सिंह गुर्जर की भी राजाज्ञाएं निकलने लगी। ’फिरंगी को मार भगाओ, देश को आजाद कराओ । इन्हें मालगुजारी मत दो, थाणे तहसील पर कब्जा करो, संगठित हो जाओ। इन राजाज्ञाओं का व्यापक असर क्षेत्र पर होने लगा । मालगुजारी राजा उपराव सिंह को दी जाने लगी । नुकड़, सरसावा, मंगलौर, पुरकाजी, बूढ़ा खेड़ी, सोढ़ौली, रणधावा, फतेहपुर, बाबूपुर, साॅपला, गदरदेड़ी, लखनौती पुरकाजी आदि गांवों के गूर्जरों ने संगठित होकर उमराव सिंह के नेतृत्व में सहारनपुर जिले के प्रशासन को एकदम ठप्पा कर दिया और प्रशासन पर क्रान्किारियों का कब्जा हो गया । गुर्जरों के साथ रांघड़ मुसलमान व पुण्डीर भी कन्धे से कंधा मिलाकर अंग्रेंज सरकार से टक्कर ले रहे थे । गंगोह की गुर्जर जनता ने फलुवा गुर्जर को अपना नेता बना कर इस क्षेत्र में भारी उपद्रव व अशान्ति पैदा कर दी थी।

नुकड़ तहसील, थाणा, मंगलौर में भी वही हाल, सरसावा पर भी अधिकार सहारनपुर के सुरक्षा अधिकारी स्पनकी तथा रार्बटसन के साथ राजा उमराव सिंह के नेतृत्व में डटकर टक्कर हुई । इस अंग्रेंज अधिकारियों ने गुर्जरों का दमन करने के लिए सेना का प्रयोग किया । गांवों पर बाकायदा तैयारी कर के सेना, स्पनकी और राबर्टसन के नेतृत्व में चढ़ाई करती थी, लेकिन गुर्जर बड़े हौंसले से टक्कर लेते थे उपरोक्त जिन गांवों का विशेषकर जिक्र किया है उनके जवाबी हमले भी होते रहे । आधुकिनतम हथियारों से लैस अंग्रेंजी सेना व उनके पिटू भारतीय सेना ने इन गांवों को जलाकर राख कर दिया, इनकी जमीन जायदाद जब्त की गई । माणिकपुर के राजा उमराव सिंह, गंगोह के फतुआ गुर्जर तथा इनके प्रमुख साथियों को फांसी दी गई और अनेक देशभक्त गुर्जरों को गांवों में ही गोली से उड़ा दिया गया, या वृक्षों पर फांसी का फन्दा डालकर लटका दिया ।

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शहीद झंडु सिंह नंबरदार 1857 | Saheed Jhandu Singh Nambardar

शहीद झंडु सिंह नंबरदार 1857 | Saheed Jhandu Singh Nambardar - Great Freedom Fighter of 1857 Revolt


Saheed Jhandu Singh Nambardar | शहीद झंडु सिंह नंबरदार

(Dr. Sushil Bhati)

10 मई 1857 को मेरठ में क्रान्ति के विस्फोट के बाद मेरठ के आस-पास स्थित गुर्जरो के गांवों ने अंग्रेजी राज की धज्जिया उड़ा दी। अंग्रेजों ने सबसे पहले उन गांवों को सजा देने पर विचार किया जिन्होंने 10 मई की रात को मेरठ में क्रान्ति में बढ़ चढ़कर भाग लिया था और उसके बाद मेरठ के बाहर जाने वाले आगरा, दिल्ली आदि मार्गो को पूरी तरह से रेाक दिया था। जिसकी वजह से मेरठ का सम्पर्क अन्य केन्द्रों से कट गया था। इस क्रम में सबसे पहले 24 मई को 'इख्तयारपुर' पर और उसके तुरन्त बाद 3 जून को 'लिसाड़ी' , 'नूर नगर' और 'गगोल गांव' पर अंग्रेजों ने हमला किया। ये तीनों गांव मेरठ के दक्षिण में स्थित 3 से 6 मील की दूरी पर स्थित थे। लिसारी और नूरनगर तो अब मेरठ महानगर का हिस्सा बन गए हैं। गगोल प्राचीन काल में श्रषि विष्वामित्र की तप स्थली रहा है और इसका पौराणिक महत्व है।  नूरनगर, लिसाड़ी और गगोल के किसान उन क्रान्तिवीरों में से थे जो 10 मई 1857 की रात को घाट, पांचली, नंगला आदि के किसानों के साथ कोतवाल धनसिंह गुर्जर के बुलावे पर मेरठ पहुँचे थे। अंग्रेजी दस्तावेजों से यह साबित हो गया है कि धनसिंह कोतवाल के नेतृत्व में सदर कोतवाली की पुलिस और इन किसनों ने क्रान्तिकारी घटनाओं का अंजाम दिया था। इन किसानों ने कैण्ट और सदर में भारी तबाही मचाने के बाद रात 2 बजे मेरठ की नई जेल तोड़ कर 839 कैदियों को रिहा कर दिया। 10 मई 1857 को सैनिक विद्रोह के साथ-साथ हुए इस आम जनता के विद्रोह से अंग्रेज ऐसे हतप्रभ रह गए कि उन्होंने अपने आप को मेरठ स्थित दमदमें में बन्द कर लिया। वह यह तक न जान सके विद्रोही सैनिक किस ओर गए हैं ?  इस घटना के बाद नूरनगर, लिसाड़ी, और गगोल के क्रान्तिकारियों बुलन्दशहर आगरा रोड़ को रोक दिया और डाक व्यवस्था भंग कर दी। आगरा उस समय उत्तरपश्चिम प्रांत की राजधानी थी। अंग्रेज आगरा से सम्पर्क टूट जाने से बहुत परेषान हुए। गगोल आदि गाँवों के इन क्रान्तिकारियों का नेतृत्व गगोल के झण्डा सिंह गुर्जर उर्फ झण्डू दादा कर रहे थे। उनके नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने बिजली बम्बे के पास अंग्रेज़ी  सेना के एक कैम्प को ध्वस्त कर दिया था। आखिरकार 3 जून को अंग्रेजो ने नूरनगर लिसाड़ी और गगोल पर हमला बोला। अंग्रेजी सेना के पास काराबाइने थी और उसका नेतृत्व टर्नबुल कर रहा था। मेरठ शहर के कोतवाल बिशन सिंह, जो कि रेवाड़ी के क्रान्तिकारी नेता राजा तुलाराव का भाई था, को अंग्रेजी सेना को गाईड का काम करना था। परन्तु वह भी क्रान्ति के प्रभाव में आ चुका था। उसने गगोल पर होने वाले हमले की खबर वहां पहुँचा दी और जानबूझ कर अंग्रेजी सेना के पास देर से पहुँचा। इसका नतीजा भारतीयों के हक में रहा, जब यह सेना गगोल पहुँची तो सभी ग्रामीण वहाँ से भाग चुके थे। अंग्रेजो ने पूरे गाँव को आग लगा दी। बिशन सिंह भी सजा से बचने के लिए नारनौल, हरियाणा भाग गए जहाँ वे अग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए।कुछ दिन बाद अंग्रेजों ने फिर से गगोल पर हमला किया और बगावत करने के आरोप में 9 लोग रामसहाय, घसीटा सिंह, रम्मन सिंह, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, कढेरा सिंह, शिब्बा सिंह बैरम और दरबा सिंह को गिरफ्तार कर लिया। इन क्रान्तिवीरों पर राजद्रोह का मुकदमा चला और दषहरे के दिन इन 9 क्रान्तिकारियों को चैराहे पर फांसी से लटका दिया गया। तब से लेकर आज तक गगोल गांव में लोग दशहरा नहीं मनाते हैं। इन शहीदों की याद में गांववासियों ने, 1857 की क्रान्ति के गवाह के रूप में आज भी उपस्थित प्राचीन पीपल के पेड़ के नीचे, एक देवस्थान बना रखा है। जहाँ दशहरे के दिन अपने बलिदानी पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं। सरकार आज भी इस ओर से उदासीन है गगोल में न कोई सरकारी स्मारक है न ही कोई ऐसा सरकारी महाविद्यालय, अस्पताल आदि हैं जो इन शहीदों को समर्पित हो।
Jhandu Singh Gurjar Nambardar - 1857 freedom Fighter

                                                                                                  संदर्भ


1. डनलप, सर्विस एण्ड एडवैन्चर आफ खाकी रिसाला इन इण्डिया इन 1857-58।
2. नैरेटिव आफ इवैनटस अटैन्डिग दि आउटब्रेक आफ डिस्टरबैन्सिस एण्ड रैस्टोरेशन आफ अथारिटी इन दि डिस्ट्रिक्ट आफ मेरठ इन 1857-58
3. एरिक स्ट्रोक, पीजेन्ट आम्र्ड।
4. एस0 ए0 ए0 रिजवी, फीड स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश  खण्ड-5
5. ई0 बी0 जोशी, मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर।
6. आचार्य दीपांकर, स्वाधीनता संग्राम और मेरठ, जनमत प्रकाशन, मेरठ 1993





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बाघी बहादुर झंडा गुर्जर | The Legend of Jhanda Gujjar - Fight against British

बाघी बहादुर झंडा गुर्जर | The Legend of Jhanda Gujjar - Fight against British   

बाघी बहादुर झंडा गुर्जर - Jhanda Gurjar
ब्रिटिशराज के दौरान भारत में बहुत से लोगो ने अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों और शोषण के खिलाफ संघर्ष किया और अपने प्राणों तक की आहुति दे दी| इनमे से बहुत से बलिदानियो को तो इतिहास में जगह मिल गयी परन्तु कुछ के तो हम नाम भी नहीं जानते| ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध आम आदमी की लड़ाई लड़ने वाले कुछ ऐसे भी बलिदानी हैं जिन्हें भले ही इतिहास की पुस्तकों में स्थान नहीं मिला परन्तु ये जन आख्यानों और लोक गीतों के नायक बन लोगो के दिलो पर राज करते हैं| ऐसा ही एक क्रांतिकारी और बलिदानी का नाम हैं- झंडा गूजर| मेरठ जिले के बूबकपुर गांव के रहने वाले झंडा की ब्रिटिशराज और साहूकार विरोधी हथियारबंद मुहिम लगभग सौ साल तक लोक गीतों की विषय वस्तु बनी रही| आम आदमी की भाषा में इन लोक गीतों को झंडा की चौक-चांदनी कहते थे, यह अब लुप्तप्राय हैं| अब इसके कुछ अंश ही उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग इस लेख में कई जगह किया गया हैं|  झंडा की लोकप्रियता का आलम यह था कि 1970 के दशक तक ग्रामीण इलाके में जूनियर हाई स्कूल तक के बच्चे झंडा की चौक-चांदनी घर-घर जाकर सुनाते थे और अपने अध्यापको की सहायतार्थ अनाज आदि प्राप्त करते थे| झंडा की चौक-चांदनी की शुरुआत इस प्रकार हैं-


गंग नहर के बायीं ओर बूबकपुर स्थान
जहाँ का झंडा गूजर हुआ सरनाम
झंडा का में करू बयान
सुन लीजो तुम धर के ध्यान.........

लगभग सन 1880 की बात हैं मेरठ के इलाके में झंडा नाम का एक मशहूर बागी था| उस समय अंग्रेजो का राज था और देहातो में साहूकारो ने लूट मचा रखी थी| अंग्रेजो ने किसानो पर भारी कर लगा रखे थे, जिन्हें अदा करने के लिए किसान अक्सर साहूकारो से भारी ब्याज पर कर्ज उठाने को मजबूर था| साहूकारो को अंग्रेजी पुलिस थानों, तहसीलो, और अदालतों का संरक्षण प्राप्त था, जिनके दम पर साहूकार आम आदमी और किसानो को भरपूर शोषण कर रहे थे|

झंडा की बगावत की कहानी भी ऐसी ही साहूकार के शोषण के खिलाफ शुरू होती हैं| झंडा मेरठ जिले की सरधना तहसील के बूबकपुर गांव का रहनेवाला था, यह गांव गंग नहर के बायीं तरफ हैं| वह अंग्रेजो की फौज में सिपाही था| उसके भाई ने पास के गांव दबथुवा के साहूकारो से क़र्ज़ ल रखा था| झंडा ने अपनी तनख्वाह से बहुत-सा धन चुकता कर दिया, परन्तु साहुकारी हिसाब बढ़ता ही गया| एक दिन साहूकार झंडा के घर आ धमका और उसने जमीन नीलम करने की धमकी देते हुए झंडा की भाभी से बतमीज़ी से बात की| झंडा उस समय घर पर ही था, पर वह अपमान का घूंट पीकर रह गया| लेकिन यह घटना उसके मन को कचोटती रही और वह विद्रोह की आग में जलने लगा|

कुछ ही दिन बाद गांव के पश्चिम में नहर के किनारे एक अंग्रेज शिकार खेलने के लिए आया, उसका निशाना बार- बार चूक रहा था| झंडा हँस कर कहने लगा कि “मैं एक गोली में ही शिकार को गिरा दूँगा”| अंग्रेज उसकी बातो में आ गया और उसने चुनोती भरे लहजे में बंदूक झंडा को थमा दी| झंडा ने एक ही गोली से शिकार को ढेर कर दिया और बंदूक अंग्रेज पर तान दी और उसे धमका कर बंदूक और घोडा दोनों लेकर चला गया|

उसके बाद झंडा ने अपना गुट बना लिया| कहते हैं की उसने अंग्रेजी शासन-सत्ता को चुनौती देकर दबथुवा के साहूकारों के घर धावा मारा| उसने पोस्टर चिपकवा कर अपने आने का समय और तारीख बताई और तयशुदा दिन वह साहूकार के घर पर चढ आया| भारी-भरकम अंग्रेजी पुलिस बल को हरा कर उसने साहूकार के धन-माल को ज़ब्त कर लिया और बही खातों में आग लगा दी| साहूकार की बेटी ने कहा की सामान में उसके भी जेवर हैं, तो झंडा ने कहा कि “बहन जो तेरे हैं ईमानदारी से उठा ले”|

झंडा ने आम आदमी और किसानो को राहत पहुचानें के लिए साहूकारों के खिलाफ एक मुहिम छेड दी| अंग्रेजी साम्राज्य और साहूकारों के शोषण के विरोध में हर धर्म और जाति के लोग उसके गुट में शामिल होते गए जिसने एक छोटी सी फौज का रूप ले लिया| झंडा के सहयोगी बन्दूको से लैस होकर घोडो पर चलते थे| उसके प्रमुख साथियों में बील गांव का बलवंत जाट, बूबकपुर का मोमराज कुम्हार, मथुरापुर का गोविन्द गूजर, जानी-बलैनी का एक वाल्मीकि और एक सक्का जाति का मुसलमान थे| रासना, बाडम और पथोली गांव झंडा के विशेष समर्थक थे| रासना के पास ही उसने एक कुटी में अपना गुप्त ठिकाना बना रखा था| इलाके में प्रचलित मिथकों के अनुसार झंडा ने पंजाब और राजस्थान तक धावे मारे और अंग्रेजी सत्ता को हिला कर रख दिया| झंडा की चौक-चांदनी स्थिति कुछ ऐसे बयां करती हैं-

गंग नहर के बायीं ओर
जहाँ रहता था झंडा अडीमोर
ज्यो-ज्यो  झंडा डाका डाले
अंग्रेजो की गद्दी हाले.......

ज्यो-ज्यो झंडा चाले था
अंग्रेजो का दिल हाले था.........

झंडा को आज भी किसान श्रद्धा और सम्मान से याद करते हैं| उसने मुख्य रूप से साहूकारों को निशाना बनाया, वह उनके बही खाते जला देता था| जिनके जेवर साहूकारो  ने गिरवी रख रखे थे उन्हें छीन कर वापिस कर देता था और पैसा गरीबो में बाँट देता था| वो गरीब अनाथ लड़कियों के भात भरता था| उसने अंग्रेजी पुलिस की मौजूदगी में मढीयाई गांव की दलित लड़की का भात दिया था| कहते हैं कि वो जनाने वेश में आया था, भात देकरदेकर निकल गया| अंग्रेज हाथ मलते रह गए| झंडा और साहूकारों की इस लड़ाई में वर्ग संघर्ष की प्रति छाया दिखाई देती हैं| साहूकारों के विरुद्ध झंडा कि ललकार पर चौक- चांदनी कहती हैं-

जब झंडा पर तकादा आवे
झंडा नहीं सीधा बतलावे
साहूकारों से यह कह दीना
मैं भी किसी माई का लाल
मारू बोड उदा दू खाल
हो होशियार तुम अपने घर बैठो
एक बार फिर मेरा जौहर देखो ............

झंडा ने मेरठ इलाके में अंग्रेजी राज को हिला कर रख दिया था| अंग्रेजी शासन ने ज़मींदारो और साहूकारों को झंडा के कहर से बचाने के लिए पूरी ताकत झोक दी| सरकार ने बूबकपुर में ही एक पुलिस चोकी खोल दी| इस स्थान पर आज प्राथमिक स्कूल हैं| लेकिन इस सब के बावजूद झंडा बेबाक होकर बूबकपुर में भूमिया पर भेली चढाने आता रहा| होली-दिवाली पर भी वह अपने गांव जरूर आता था| अंग्रेजी पुलिस और झंडा के टकराव पर चौक-चांदनी कहती हैं-

एक तरफ पुलिस का डंका
दूजी तरफ झंडा का डंका
अंग्रेज अफसर कहाँ तक जोर दिखावे
अपना सिर उस पर कटवावे...........


एक दिन रासना गांव के एक मुखबिर ने पुलिस को झंडा के रासना के जंगल स्थित कुटी में मौजूद होने की सूचना दी| पुलिस ने कुटी को चारो ओर से घेर लिया| झंडा अंग्रेजो से बड़ी बहादुरी से लड़ा| दोनों ओर से भीषण गोला-बारी हुई| गोला-बारी के शांत होने पर जब अंग्रेज कुटी में घुसे तो उन्हें वहाँ कोई नहीं मिला, झंडा वहाँ से जा चुका था| परन्तु उस घटना के बाद उसका नाम फिर कभी नहीं सुना गया| आज भी ये स्थान झंडा वाली कुटी के नाम से मशहूर हैं| यहाँ देवी माँ का एक मंदिर हैं और एक आश्रम हैं| यहाँ चैत्र के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मेला लगता हैं, जिसमे आस-पास के गांवों के लोग आते हैं जो भी आज भी झंडा को याद करते हैं और उसकी चर्चा करते हैं|

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

गुर्जर तथा अरब महासंघर्ष (भाग 1) | Gurjar Vs Arab war (Part 1) History

गुर्जर तथा अरब महासंघर्ष (भाग 1) | Gurjar Vs Arab war (Part 1)

Gurjar Vs Arab War History | Part 1 | Arab Invasion in India | Battle of Rajasthan | Gujarat | Punjab | Kathiyavad | India | Arab War | Author : Malkiat Singh Jinderh



गुर्जर तथा अरब महासंघर्ष (भाग 1) | Gurjar Vs Arab war

कुछ लोग अरब ओर गुर्जरो के बीच हुए संघर्ष को Battle Of Rajasthan भी कहते हैं। लेकिन यह संघर्ष इक बड़े युद्ध का इक हिस्सा था जो राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश, गुजरात, काठियावाड़ ओर पंजाब में भी लड़ा गया। इस संघर्ष को ठीक ढंग से समझने के लिए पहले हमें इसकी पृष्ठभूमि को समझना होगा।

पृष्ठभूमि (भाग 1) :-

712 AD में मोहम्मद बेन क़ासिम के सिंध पर हमले से पहले अरब दुनिया की इक बड़ी ताकत बन चुके थे। उत्तरी अफ्रीका के सभी देश, यूरोप में स्पेन तक, मध्य एशिया में त्रासोक्सीयाना तक ओर पूर्व में मकरान (बलूचिस्तान) खलीफा के झंडे के नीचे आ चुके थे। खलीफा की सत्ता फैलाने में मवालियों (Newly Convert Muslims) का भी अहम किरदार था जो ईरान ओर तुर्की आदि के गैर अरब लोग थे। इस प्रकार भारत पर अरब आक्रमण कोई छोटा-मोटा वाक्या नही था बल्कि उस वक़्त की सबसे महान विश्वशक्ति का आक्रमण था जिससे गुर्जरो को उलझना पड़ा। क़ासिम के वक़्त शक्ति से स्त्रोत मिश्र, इराक़, ईरान, तुर्की आदि विकसित सैनिक शक्तियों से प्रपौत थे जबकि गुर्जर उस वक़्त महज इक छोटे से इलाके में निहित कबीलाई संघ मात्र था।
बलूचिस्तान ओर सिंध का इलाक़ा ईरान की सस्सानि राजसत्ता के अधीन था ओर हूणों के साथ संघर्ष में कमजोर हो चुकी सस्सानि राजसत्ता इन इलाक़ो को ठीक ढंग से अपने अधिकार में ना रख सकी ओर यहां के मुकामी जागीरदार जिनको कस्बों ओर गांव का मुखिया बनाया गया था ओर जो अधिकतर ईरानी मूल के ही थे अमली तौर पर अपनी सत्ता स्थापित करली थी। इनको राई कहा जाता था। 416 AD में राइयों ने अपने इक प्रमुख राई देवा जी को अपना राजा घोषित कर दिया था। सस्सानि लगातार इस इलाके पर दोबारा अपनी सत्ता कायम करने के लिए कोशिश करते रहे। ऐसी ही इक कोशिश में राजा मेहरसेन II ईरान के निमरोज़ से आई इक सेना का मुक़ाबला करते हुए मारा गया। राई वंश का आखरी राजा राई सहसी II उसके इक ब्राह्मण मंत्री चच द्वारा रची इक साजिस में कत्ल कर दिया गया था। चच ओर राई सहसी की रानी सुहनदि में गुप्त ढंग से इश्क़बाजी चल रही थी। 

राई सहसी की हत्या के बाद चच ने सुहनदि से शादी रचाली ओर खुदको (632 AD) राजा घोसित कर दिया। गुस्सा खाकर चित्तोड़ का राजा महर्थ चच से अपने जीजा का राज बापिस लेने ओर अपनी बहन सुहनदि को सज़ा देने सिंध पर आक्रमण करने आया पर लड़ाई में मारा गया। चच के बाद उसका बेटा चंद्र राजा बना ओर उसके बाद चंद्र का बेटा दाहिर राजा बना।
642 AD में नेहवंद की जंग में अरब सेना ने सस्सानि राजा Yazirgerd III को मुकम्मल रूप में हरा दिया ओर Yazid मेर्व में अपने इक गवर्नर Muhayeh के पास भाग गया। Muhayeh ने Yazid के रोज़ाना महंगी मांगो से तंग आकर उसके खिलाफ विद्रोह कर दिया ओर बडगीस के नेज़ाकि हूणों की मदद से yazid को हरा दिया। Yazid ने भागकर इन चक्की वाले (Miller) की चक्की में पनाह ली पर चक्की वाले ने Yazid की दौलत के लालच में Yazid की हत्या करदि ओर इस तरह ईरान में अरबों की सत्ता को चुनौती देने वाला कोई नही बचा।
भारत प्रवेश करने के लिए अरबों को अफ़ग़ानिस्तान से होकर गुजरना था जो उस वक़्त सभ्यता के हिसाब से भारत का ही अंग माना जाता था ओर अरबों के 'अल हिन्द' संकल्पना के अंतर्गत ही आता था। इसके साथ ही मकरान पर कब्जा निश्चित करने के लिए साथ लगते ज़ाबुलिस्तान ओर ज़मिनद्वार (Helmand) पर भी कब्जा करना जरूरी था। ज़ाबुलिस्तान ओर ज़मीनद्वार पर उस वक़्त ज़ुनबिल हेप्थालो (हूण) का राज था जो भारतीय गुर्जरो के ही भाई बंध थे ओर ज़ाबुलिस्तान में ही पीछे रह रहे थे। यह लोग सूर्य उपासक थे जिसे वो जून कहते थे। जून यानी सूरज का इक बड़ा मंदिर साकावंद (ज़ाबुलिस्तान में) था जहां साल दर साल मेला लगता था ओर जो हेप्थाल इस मेले के दिन सूर्य पूजा करने सकवंद के मंदिर जाते थे उनको ज़ुनबिल कहा जाता था। अरब लोग इनको ज़िब्लिस कहते थे। ज़ाबुलिस्तान पर कब्जा करने की गर्ज से सुहैल बिन अब्दी के अधीन अरब सेना ने 643 AD में ज़ुनबिलों पर हमला किया। ज़ुनबिलो को पहली बार अरब सेना की ताकत का अंदाज़ा हुआ ओर इस जंग में उनको पीछे हटना पड़ा लेकिन आगे के लिए वो चौकन्ने हो गए। अगले ही साल 644 AD में खलीफा राशिदुन के इशारे पर अरब सेना ने मकरान के तटवर्ति इलाके पर आक्रमण किया ओर रासिल के स्थान पर भारतीय सेना को पराजित किया। मकरान पर अब भारतीयों का कोई दावा नही रह गया था। 652 AD में अहनाफ इब्न कैस ने हेरात पर हमला करके वहां हारा हूणों को पराजित कर दिया। यह हमला ज़ुनबिलों को उत्तर पश्चिम की तरफ से घेरने के लिए किया गया था।
661 AD में अरब जनरलों सिनन इब्न सलमा ने मकरान के चगाई इलाके को अपने अधीन किया। 672 AD में अरब जनरल राशिद इब्न अम्र ने मशकेय ओर 681 AD में मुंजिर इब्न जरूद अल अबादि ने किक्कान, बुकान को अधीन करके लगभग 673 AD तक मकरान सिंध पर हमला करने के लिए आधार शिविर बन चुके थे, सिर्फ ज़ुनबिलो से निपटना बाकी था।
ज़ाबुलिस्तान पर अधिकार करने के लिए अरब सेना ने 668, 672 ओर 673 AD में तीन बार कोशिश की लेकिन ज़ुनबिल मजबूती से उनका सामना करते रहे ओर तीनो बात अरब सेना को अपना हर्जा खर्चा लेकर पीछे हटना पड़ा। कुफा ओर बसरा का गवर्नर अल हज्जाज इब्न यूसफ अल हकम इब्न अकील अल तकाफि (अल हज्जाज) ज़बुलिस्तान पर अधिकार करने के लिए बहुत तत्पर था। 681 AD में उसने यज़ीद बिन सलाम के अधीन सेना भेजी पर जंजाह के स्थान पर ज़ुनबिल हूणों ने इस सेना को ना सिर्फ हरा दिया बल्कि ऐसा घेरा की अरबों को ज़ुनबिलो को 5 लाख दिरहम देकर अपने फौजियों की जान माल की हिफाज़त करनी पडी। ज़ुनबिलो ने 685 में सिस्तान पर धावा बोल दिया पर कामयाब नही हुए। अरब सेना ने इक बार फिर 693 में ज़बुलिस्तान पर हमला किया लेकिन इस बार फिर हरा दी गई।
ज़ुनबिलों ने दर्रा बोलान से होकर मकरान में अरब ठिकानों पर धावे बोलने शुरू किये तो खतरे को भांप कर अल हज्जाज ने उबैदुल्ला इब्न बकरा नामी सिपाहसालार को 698 AD में 20 हजार की फौज देकर ज़ुनबिलो पर हमला करने भेजा। यह सारी फौज कुफा ओर बसरा से भेजी गयी थी क्यूंकि इस फौज की बहादुरी के डंके दूर-दूर तक बजते थे। उधर ज़ुनबिल पीछे हटकर काबुल शाही (जो हेप्थाल ही थे, इनको तुर्की शाही भी कहा गया है) फौज से मिल गयी ओर उबैदुल्लाह की फौज को आगे बढ़ने दिया। जैसे ही अरब सेना काबुल के पास पहुंची तो ज़ुनबिल ओर काबुलशाही फौज ने ऐसा हमला किया की कुफा ओर बसरा की फौज के 20 हजार में से 15 हजार फौजी मौत के घाट उतार दिये गए। इस्लामी लश्कर की यह शिकस्त खलीफा ओर गवर्नर अल हज्जाज के लिए नागवार थी। अल हज्जाज के लिए नागवार इसलिए भी थी की अभी अभी ही उसको सिस्तान ओर ख्बारीजम का गवर्नर भी बना दिया गया था ओर यह हर उसके रुतबे ओर चोट थी। अगली ही बार 700 AD में अब्दुर रहमान इब्न मोहम्मद अल असथ को फिर से कुफा ओर बसरा से 20 हजार की फौज देकर ज़ुनबिलो के खिलाफ भेजा। इस बार फौजियों को असथ ने अपनी मर्जी से चुना था। अल असथ ज़ुनबिलों को हर हालात में हरा देने मि डींगे हांक कर आया था। बिलाशक वो इक काबिल जनरल था। ज़बुलिस्तान आकर उसने कुछ कामयाबियां हासिल कीं, पर ज़ुनबिलो को जीतना इतना आसान ना देखकर उसने आस पास के इलाक़ो में अपनी किलेबंदी शुरू की ओर गर्मी का मौसम आने का इन्तेजार करने लगा। इस देरी से अल हज्जाज परेशान हो गया ओर उसने रुकके में अल असथ ओर दूसरे सिपाहसालारों को बहुत बुरा भला कहा ओर उनकी शान के खिलाफ शब्द इस्तेमाल किये। अल असथ इराक़ के मक़बूल खानदान असथ का सदस्य था जो इक गरीब पठार त्रश ओर रुतबे में छोटे खानदान से गवर्नर के ओहदे पर पहुंचे अल हज्जाज से अपनी तोहीन बर्दास्त ना कर सका ओर उसने विद्रोह कर दिया ओर पहले मकरान को अपने अधीन लिया फिर अपने लश्कर के साथ बसरा रवाना हुआ जहां उसने अल हज्जाज की सेना को हराकर बसरा पर कब्जा किया ओर कुफा की तरफ बढ़ने लगा। ज़ुनबिलों ने अल असथ की मदद की ओर सिस्तन पर अपना दावा जताया। खलीफा असथ से नाराज था क्योंकि उसने सरकारी  अधिकारो के खिलाफ गद्दारी की थी, खलीफा की मदद से अल हज्जाज ने सीरिया से सेना बुलाई ओर कुफा की जंग में 704 AD में असथ को हरा दिया।असथ सिस्तन की तरफ भागा ओर ज़ुनबिलो से पनाह मांगी। अल हज्जाज पहले ही ज़ुनबिलो से 7 साल तक की जंगबन्दी का समझोता कर चुका था, ज़ुनबिलो ने असथ का क़तल कर दिया। (कुछ इतिहासकार बताते है की असथ ने खुदखुशी करली थी)। इस प्रकार कुछ देर तक भारत के दरवाजों पर अरब आक्रमण रुक गया था। ज़ुनबिलों ओर काबुल शाही हप्थालो की शक्ति के कारण अरब सेना भारतीय प्रवेश द्वार दर्रा खैबर, दर्रा बोलान ओर दर्रा गोमल तक नही पहुँच पा रही थी, उनके पास बलूचिस्तान, सिंध ओर राजस्थान के मुरुथल ओर दुर्गम इलाके से ही भारत प्रवेश का रह गया था। मुहम्मद बिन क़ासिम के बाद भी ज़ुनबिलो ने 728, 769 ओर 785 में अरब सेना के हमलों को कामयाब नही होने दिया बल्कि 728 के हमले में अरब सेना इक बार फिरसे बुरी तरह हार गई थी। ज़ुनबिल हूणों को 865 AD में सफरीद जनरल याक़ूब ने काबू किया तब तक ज़ुनबिलों के चारो तरफ अरब अपनी धाक जमा चुके थे ओर ज़ुनबिल अकेले ही चारो तरफ से घिरे हुए थे। ज़ुनबिलो को बड़ा धक्का उस वक़्त लगा था जब उनके अपने भाई बंध हप्थाल नेज़ाकि हूण अरब सेना की सहायता करने की अपनी गलत नीतियों के कारण अरबों के आगे धरा शाही हो गए थे। नेज़ाकि हूण (जिनका नाम उनके इक राजा नेज़ाक के नाम पर पड़ा) उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान क्व बदगीस में हुकूमत कर रहे थे। ज़ुनबिलो की तरह नेज़ाकि हूण भी काबू नही आ रहे थे। आखिर कुतैबा ने नेज़ाकियों से समझोता कर लिया ओर नेज़ाकि अरब सेना की ट्रांसोक्सीयाना में हुई लड़ाइयों में उनसे कंधे से कंधे मिलाकर  लड़ने लगे हालांकि वो खुद मुस्लिम नही हुए थे। आखिर जब ट्रांसोक्सीयाना में अरब नेज़ाकियों की मदद से जीत कर बहुत मजबूत हो गए तो उन्होंने दूसरी कोमों की मदद से नेज़ाकियों को शिकस्त दे दि ओर एक जंग में नेज़ाकि राजा मारा गया।

जब अरब सेना ज़ुनबिलो से निपटने में लगी हुई थी तो अरब सागर में सेरान्द्वीप (श्रीलंका) से ईरान की खाड़ी तक अरब के व्यापारिक समुंद्री जहाँजो को लुटे जाने की खबरें खलीफा के पास आ रही थीं। अरबों के जहाँजो को लूटने वाले मेड़ जाती के लोग थे जो देवल, कच्छ और काठियावाड़ के अपने तीन केंद्रों से इन कार्यवाहियों को अंजाम दे रहे थे। चचनामा में देवल के मेड़ों को नागमराह कहा गया। विंक (Al Hind - The Making Of Indo Islamic World) ने लिखा है की मेड़ लोग साक (सीथियन) जाती के लोग थे जो अरबों के जहांजो को लूटने से पहले सस्सानियों के जहाँजों को लूटा करते थे। और यह लूटमार सेरेंद्वीप से लेकर इराक में दरिया दजला (टाइग्रिस) के डेलटे तक कहीं भी हो सकती थी उस वक़्त अरब मेड़ों को अपना सहयोगी मानते थे क्यूंकि वो भी उस वक़्त सस्सानियों से ईरान छीन लेने की कोशिश में लगे हुए थे। बात तब ज्यादा बढ़ गयी जब सेरेंद्वीप के राजा की तरफ से खलीफा अल वालिद के लिए कीमती उपहार लेकर जा रहा इक अरब जहाज नागमराह लोगों ने लूट लिया। इस जहाज में सेरेंद्वीप के कुछ नए बने मुसलमान अपनी बीवियों के साथ मक्का और मदीना की जियारत के लिए भी जा रहे थे जिनको बंधक बना लिया गया था। जहाज को बचाने के लिए कई अबेसीनियन (Modern Ethopia & Eriteria) हब्शी गुलाम मारे गए थे। जहाज को देवल की बंदरगाह पर लाया गया और बंधकों को राजा दाहिर की तरफ से देवल के गवर्नर प्रताप राई ने अपनी हिरासत में ले लिया। बंधकों की अदला बदली के दौरान ईक सेरेंद्वीपी औरत बच कर किसी तरह मकरान में अरब सेना के इक बेस पर पहुँच गयी और वहां से इक क़ासिद के हाथ खलीफा को ख़त लिखा जिसमें उसने बंधकों की रिहाई और जहांजो की हिफाज़त की विनती की (The Ummayyad Khaliphate By Alaxander Berzin)। खलीफा ने अल हज्जाज को कार्यवाही करने के लिए कहा। अल हज्जाज ज़ुनबिलों से निपटे बिना सिंध पर कोई फौजी अभियान भेजना नहीं चाहता था। उसने दाहिर के पास दूत भेजकर मांग की क़ि बंधकों को रिहा किया जाये। लूटेरों को सजा दी जाये और नुकसान का मुआवजा दिया जाए। दाहिर ने यह कहकर वापिस भेज दिया की लूटेरे उसकी रियाया नहीं हें ओर उनपर उसका कोई जोर नहीं है। हज्जाज जनता था की बंधक प्रताप राई के पास हैं और ये दाहिर का ही गवर्नर नियुक्त किया गया है। हज्जाज ने बहाना बनाया की अगर लुटेरे दाहिर के राज के अधीन नहीं हैं तो वो खुद उनको सजा देगा। पहले उबैदुल्लाह के नेतृत्व में और फिर बुड़ैल के अधीन जंगी बेड़ा (Naval Fleet) देवल पर हमला करने भेजा गया पर प्रताप राई ने मेडों की सहायता से दोनों बार अरबों को देवल के तट पर हरा दिया और दोनों ही बार अरब कमांडर मारे गए। अल हज्जाज ने ज़मीन के रास्ते सिंध पर हमला करने का मन बना लिया। वैसे भी उसका अफ़ग़ानिस्तान में पैर मजबूत करने के बाद भारत प्रवेश करने का इरादा था पर अब यह पहल की बात हो गई थी।
इमाम अद् दिन मुहम्मद इब्न क़ासिम अथ तक़ाफ़ि का जन्म 672 AD को अल हज्जाज के भाई क़ासिम बेन यूसफ के घर तैफ (अब सऊदी अरब में) हुआ था। अल हज्जाज ने अपनी बेटी ज़ुबैदा की शादी उसी से की थी, यानि वो अल हज्जाज का भतीजा था और दामाद भी। उसकी फौजी ट्रेनिंग अल हज्जाज के लश्कर में ही हुई थी। अल हज्जाज ने सिंध को फतह करने का काम उसी को सौंपा। क़ासिम उस वक़्त 17 साल की उम्र का था जब वो ईरान में शिराज के उस अरब लश्कर का 710 AD में कमाण्डर जिसे सिंध की तरफ रवाना होना था। (Al Hajjaj To Qasim By Deroyl)

जब मुहम्मद बेन क़ासिम शिराज से मकरान के लिए रवाना हुआ तो उसकी फौज में 6 हजार सीरियन घुड़सवार थे। ईरान के मवालियों की ओर अबीसीनियन और सूडान के हब्शियों की पूरी पलटनें भी उसके साथ थीं। मकरान में दाखिल होते ही मकरान के गवर्नर ने 6 हजार रुखसवार (Camel Core) उसके साथ करदी और देवल को समुन्द्र की तरफ से घेरने के लिए इक जंगी बेड़ा भी रवाना कर दिया इस जंगी बेडे के पास 6 हजार गुलेलें भी थीं जो भारी भरकम पत्थरों को फेंक सकती थी। स्पष्ट था की जमीनी ओर समुन्द्री दोनों रास्तों से देवल पर हमला होगा। मकरान (बलूचिस्तान) में क़ासिम ने फंनज़्बुर ओर अरमान बेला (लास बेला) अरब सिपहसालारों को शक्ति से युद्ध में अरब सेना का साथ देने के लिए मजबूर किया क्यूंकि यह दोनों मकरान के गवर्नर से नाराज चल रहे थे ओर मनमर्जीयाँ कर रहे थे। 712 AD में क़ासिम ने अपनी सेना के साथ मकरान से सिंध में प्रवेश किया। उसके सिंध में दाखिल होते ही देवल की बंदरगाह को घेर कर खड़े हुए जंगी बेडे ने गुलेलें धरती पर उतार दी ओर उनको पानी के पास जंगी जहाँजों की सरपरस्ती में ऐसी जगह पर लगाया जहाँ उन पर जबाबी हमला मुमकिन नहीं था। गुलेलों से भारी भरकम पत्थर शहर पर फैंके गए। कुछ ही दिनों में देवल शहर बर्बाद कर दिया गया। शहर की आबादी शहर छोड़ कर भाग गई। प्रताप राई शहर की हिफाज़त करना मुश्किल में पाकर अपनी सेना के साथ दाहिर की राजधानी अलोर (अरोर) की तरफ कूच कर गया। बेड़े से उतरकर अरब सेना देवल में दाखिल हो गई। सबसे पहले देवल के भव्य मंदिर को जमीन पर गिरा दिया गया जो शहर की गतिविधियों का मुख्या केंद्र था। आस पास के मेड़ और दूसरे जाट जो अरब जहाँजो की लूट-पाट में शामिल थे सज़ा से बचने के लिए कच्छ की तरफ भागने शुरू हो गए। क़ासिम के देवल पहुँचने से पहले ही देवल फतह कर लिया गया था। देवल से क़ासिम उत्तर में नारून और सदुसन (सहवान) की तरफ चल दिया। यह जाटों का इलाक़ा था। यहाँ क़ासिम का कोई विरोध नहीं हुआ। देवल सिंध नदी के पूर्वी किनारे पर था जबकि नारून पश्चिमी किनारे पर। (10वीं सदी ईस्वीं में इक जबर्दस्त भूचाल के कारण सिंध नदी द्वारा रास्ता बदल लिया जाने पर नरून आज तक नदी के पूर्वी किनारे पर है) नारून को आधार बनाकर अरब सेना ने काका, कोलक, बाझरा, ओर सिबिस्तन को अपने अधीन किया। सिबिस्तन के सिबिया गोत के जाट अरबों के समर्थक बन गए। राजा दाहिर अलोर के पास रोहड़ी नाम की जगह (सिंध नदी के पूर्वी तट पर) पर अरब सेना का मुक़ाबला करने के लिए मोर्चाबंदी किए हुए खड़ा था। नदी के इस पार या उस पार जाने के लिए नदी के बीचों बीच बेट नाम के इक जज़ीरे पर अधिकार करना जरूरी था। बेत पर मोरेया बसाया नाम के इक जाट शासक का अधिकार था जिसने सहज ही क़ासिम से समझोता कर लिया ओर नदी पार करने के हित अरब सेना को बेत का इस्तेमाल करने का ना सिर्फ अधिकार दे दिया बल्कि अपने अधीन जाटों को दाहिर के खिलाफ लड़ने के लिए अरब सेना के साथ भी कर दिया (Wink; Al Hind)। जाटों और मल्लाहों की सहायता से क़ासिम की पूरी फौज ने नदी पार की और रोहड़ी पहुँच गया। क़ासिम की सेना के नदी पार करने की खबर सुनते ही अलोर के इलाके के गुर्जरो और मेड़ो ने उत्पाद मचा दिया। इनकी लूट मार की वजह से रास्ते बंद हो गए और इस अराजकता का नुकसान अरबों से ज्यादा दाहिर को ही हो रहा था। जाट दो गुटों में बँट गए थे। नदी के पश्चिम की तरफ के जाट क़ासिम के साथ थे जबकि पूर्व की तरफ के जाट दाहिर के साथ मैदानी जंग में डटे हुए थे। भट्टा (जैसलमेर और बीकानेर का इलाक़ा) राजा दाहिर से अपना पुराना बदला लेने के लिए सेना समेत क़ासिम की सहायता कर रहा था। दाहिर की बहन की शादी भट्टा के राजा से तय की गई थी। शादी के वक़्त जब दाहिर ने देखा की इतना इलाक़ा भट्टा के राजा को दहेज़ में देना पड़ेगा जिससे उसका इलाक़ा दाहिर के अधीन इलाके से भी बड़ा हो जायगा तो ऐन मौके पर उसने अपनी बहन का डोला रोक दिया और अपनी बहन से खुद शादी करली (चचनामा)। इससे भट्टा का राजा बहुत नाराज था। अरब सेना के पास दुनिया में सबसे बढ़िया नस्ल के अरबी घोड़े थे जबकि दाहिर की सेना मुख्या तौर पर हाथियों पर आधारित थी। भारत में अरबी नस्ल के घोड़ो से कुछ ही कम बढ़िया नस्ल के तुर्की घोड़े सिर्फ गुर्जरों के पास थे। अरबों के तीरंदाजों के पास मंगोली कमानें थी जो तेज रफ़्तार से दूर तक बाण फेंक सकती थी। ऐसे तीर कमान भारत में सिर्फ गुर्जरों के पास थे और किसीके पास नही थे। दाहिर और भीनमाल के गुर्जरो में आपसी ऐसा कोई तालमेल नहीं था जिससे दाहिर फायदा उठा सकता हालांकि दोनों राज्यो की सरहदें आपस में टकराती थीं। गुलेलें भारत में पहली दफा अरब लेकर आये थे, भारतियों के किसी भी राज्य के पास यह नही थी। उस वक़्त दुनिया पर अरबों की जीत की इक धारणा बनी हुई थी ओर लोगों को यकीन था की अरब ही जीत प्राप्त करेंगे जिससे युद्ध के वक़्त अरबों के विरोधी राज्यो के राज्याधिकारी और व्यापारी वर्ग गुप्त तौर पर अरबों से सांठ गाँठ करते थे और आम जनता अरबों के जीत जाने की हालात में आने वाली किसी विप्ता के डर से अपने शासकों के प्रति उदासीन हो जाती थीं।

बाकी अगले भाग में पृष्ठभूमि (भाग 2) मे ..........



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रविवार, 20 नवंबर 2016

Gurjar Pratihar Vs Arab, Rashtrakuta, Pala Empire & Battle of Rajasthan

Gurjar Pratihar Vs Arab, Rashtrakuta, & Pala Empire



Gurjar Pratihar Dynasty's Geographical Map

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य ने अपने शुरूआती शासनकाल मे ही पूरी दूनिया को अपनी ताकत से हिला दिया था।इनका शासनकाल 6ठी शताब्दी से 10वी शताब्दी तक रहा। गुर्जर प्रतिहारोने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये और हर बार विजयी हुए। जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है।
अरबो की विशाल आँधी के सामने वीर गुर्जर अपने रणनृत्य का प्रदर्शन करते हुए भिडे जिसे इतिहास राजस्थान के युद्ध /Battle of Rajasthan जोकि गुर्जरो व अरबो के बीच हुए के नाम से जानता है।भारत मे कोई ऐसा स्थान नही बचा जहां गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी तलवार और निर्माण कला का जौहर ना दिखाया हो। गुर्जर प्रतिहारो ने सैकडो सालो तक राष्ट्रकूट और पाला साम्राज्य से भयंकर युध्द किए और हर बार विजयी हुए। गुर्जर प्रतिहारो के दुश्मन चारो ओर थे । एक तरफ हिमालय की और से । दक्षिण मे राष्ट्रकुटो से। पूरब मे बंगाल के पालो से और पश्चिम से अरबो, डकैतों, इराकी,मंगोलो , तुर्कों,से। जिसमें गुर्जरो ने अभूतपूर्व साहस व पराक्रम दिखाते हुए अरबो को बाहर खदेडा ।भारत की हजारो साल से बनने वाली सभ्यता व संस्कृति को अरबो द्वारा होने वाली हानि से गुर्जरो ने बचाया व लगभग साढे तीन सौ सालो तर गुर्जर भारत के रक्षक/प्रतिहार बने रहे । प्रतिहार यानी द्वारपाल।देश के रक्षक। 350 सालो तक लगातार युद्धे के बाद जब, अरब, राष्ट्रकुट और पाल साम्राज्य ने एक साथ मिलकर युद्ध कए वही से गुर्जर प्रतिहारो का पतन होने लगा और विदेशी ताकतो को भारत देश मे घुश्ने का अवसर मिला। इसके बाद के काल को ही मुगल काल कहा जाता है
भारत देश हमेशा ही गुर्जर प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है और देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।यहां अनेको गुर्जर राजवंशो ने समयानुसार शासन किया और अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्य चकित किया। भारत मे कोई ऐसा स्थान नही बचा जहां गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी तलवार और निर्माण कला का जौहर ना दिखाया हो। गुर्जर प्रतिहारो ने 100 सालो तक राष्ट्रकूट और पाला साम्राज्य से भयंकर युध्द किए और हर बार विजयी हुए। गुर्जर प्रतिहारो के दुश्मन चारो ओर थे । एक तरफ हिमालय की और से । दक्षिण मे राष्ट्रकुटो से। पश्चिम मे बंगाल के पालो से और विदेशी ताकते गुर्जर प्रतिहारो ने सैकडो मंदिर व किले के निर्माण किए था जिसमे शास्त्रबहु मंदिर, बटेश्वर मंदिर, कुचामल किला, मिहिर किला (गुर्जर किला), पडावली मंदिर, गुर्जर बावडी, चौसठ योगिनी मंदिर आदि इनके अलावा सैकडो इलाके व ठिकाने है जहाँ गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी कला बनाई ।

Gurjar Kings of Gurjar Pratihar Empire Wallpaper image


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