Historical लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Historical लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 20 नवंबर 2016

Gurjar Pratihar Vs Arab, Rashtrakuta, Pala Empire & Battle of Rajasthan

Gurjar Pratihar Vs Arab, Rashtrakuta, & Pala Empire



Gurjar Pratihar Dynasty's Geographical Map

गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य ने अपने शुरूआती शासनकाल मे ही पूरी दूनिया को अपनी ताकत से हिला दिया था।इनका शासनकाल 6ठी शताब्दी से 10वी शताब्दी तक रहा। गुर्जर प्रतिहारोने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये और हर बार विजयी हुए। जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है।
अरबो की विशाल आँधी के सामने वीर गुर्जर अपने रणनृत्य का प्रदर्शन करते हुए भिडे जिसे इतिहास राजस्थान के युद्ध /Battle of Rajasthan जोकि गुर्जरो व अरबो के बीच हुए के नाम से जानता है।भारत मे कोई ऐसा स्थान नही बचा जहां गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी तलवार और निर्माण कला का जौहर ना दिखाया हो। गुर्जर प्रतिहारो ने सैकडो सालो तक राष्ट्रकूट और पाला साम्राज्य से भयंकर युध्द किए और हर बार विजयी हुए। गुर्जर प्रतिहारो के दुश्मन चारो ओर थे । एक तरफ हिमालय की और से । दक्षिण मे राष्ट्रकुटो से। पूरब मे बंगाल के पालो से और पश्चिम से अरबो, डकैतों, इराकी,मंगोलो , तुर्कों,से। जिसमें गुर्जरो ने अभूतपूर्व साहस व पराक्रम दिखाते हुए अरबो को बाहर खदेडा ।भारत की हजारो साल से बनने वाली सभ्यता व संस्कृति को अरबो द्वारा होने वाली हानि से गुर्जरो ने बचाया व लगभग साढे तीन सौ सालो तर गुर्जर भारत के रक्षक/प्रतिहार बने रहे । प्रतिहार यानी द्वारपाल।देश के रक्षक। 350 सालो तक लगातार युद्धे के बाद जब, अरब, राष्ट्रकुट और पाल साम्राज्य ने एक साथ मिलकर युद्ध कए वही से गुर्जर प्रतिहारो का पतन होने लगा और विदेशी ताकतो को भारत देश मे घुश्ने का अवसर मिला। इसके बाद के काल को ही मुगल काल कहा जाता है
भारत देश हमेशा ही गुर्जर प्रतिहारो का रिणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उनहोंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है और देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।यहां अनेको गुर्जर राजवंशो ने समयानुसार शासन किया और अपने वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्य चकित किया। भारत मे कोई ऐसा स्थान नही बचा जहां गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी तलवार और निर्माण कला का जौहर ना दिखाया हो। गुर्जर प्रतिहारो ने 100 सालो तक राष्ट्रकूट और पाला साम्राज्य से भयंकर युध्द किए और हर बार विजयी हुए। गुर्जर प्रतिहारो के दुश्मन चारो ओर थे । एक तरफ हिमालय की और से । दक्षिण मे राष्ट्रकुटो से। पश्चिम मे बंगाल के पालो से और विदेशी ताकते गुर्जर प्रतिहारो ने सैकडो मंदिर व किले के निर्माण किए था जिसमे शास्त्रबहु मंदिर, बटेश्वर मंदिर, कुचामल किला, मिहिर किला (गुर्जर किला), पडावली मंदिर, गुर्जर बावडी, चौसठ योगिनी मंदिर आदि इनके अलावा सैकडो इलाके व ठिकाने है जहाँ गुर्जर प्रतिहारो ने अपनी कला बनाई ।

Gurjar Kings of Gurjar Pratihar Empire Wallpaper image


#gurjara #pratihara #historic #historical #history #ancient #india #historyofindia #ancientindia #arab #rashtrakuta #pala #war #world #worldwar #gujjar #gurjar #great #dynasty #empire #reign #battleofrajasthan #historian #bharat #army #gurjarpratihar #map #photo #wallpaper #images #ruler #raja #maharaja #veergurjar #veer #brave #indian #royal #temple #temples #monuments #incredible #historians #itihas #warriors #chalukya #chauhan #chouhan #chauhangurjar #dynasties #empires #rulers #list #top10 #top #religion #region #area #country #art #origin #kushan #hun #huna #hoon 

शनिवार, 30 जुलाई 2016

प्राचीन हूण (गुर्जर) - ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (1400 ई. पूर्व से -200 ईसा पूर्व ) | Historical background of Ancient Huna Gurjars

प्राचीन हूण (गुर्जर) - ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (1400 ई. पूर्व से -200 ईसा पूर्व )

Huna / Hoon Gurjars

शको को उनके मूल स्थान से निकाल कर उस पर अपना अधिकार जमाना हूणो का ही काम था  यही नही  ,  बल्कि मध्य ऐशिया के उतरापथ ओर दक्षिणा पथ दोनो मे जो आज सभी जगह मंगोलियन चैहरे देखे जाते है,  यह भी हूणो की ही दैन हे ।

शको की तरह हूण भी घूमन्तू कबीले थै । मध्य -  ऐशिया मे दोनो एक दूसरे के पडोसी थे । यू- ची के निकाले जाने से पहले शक -  भूमि त्यानशान ओर अल्ताई से पूरब हूणों की गोचर भूमि से मिल जाती है । इसलिये अन्तिम सघर्ष के पहिले भी इनका कभी - कभी आपस मे युध्द ,  वस्तु विनिमय के लिऐ सघर्ष हो जाया करता था । चीन के इतिहास से पता लगता हे कि वहा पर भी धातुयुगीन सांस्कृतिक विकास मे पश्चिम से जाने वाली जाति का विशेष हाथ रहा हे ।

यह जाति शक - हूणो  से समबन्ध रखने वाली थी  , इसमे सन्देह नही  । तातार ओर तुर्क यह दोनो शब्द हूणो के वंशजों के लिये इस्तेमाल हुये हे  , लकिन चीनी इतिहास मे ईसा की दूसरी सदी के पूर्व तातार शब्द का पता नही  लगता है , ओर पाँचवी सदी से पहिले तुर्क शब्द भी उनके लिये अज्ञात था ।
ग्रीक ओर ईरानी स्त्रोत जब सूखने लगते हे  , इसी समय से चीनी स्त्रोत हमारे लिये खुल जाते हे ।

शको व हूणो  के बारे मे चीनी इतिहिसकारो ने बहुत कुछ लिखा हे लेकिन अभी तक उसमे से थोडा ही यूरोप की भाषाओ मे आ सका हे । रूसी विद्वानो का इस सामग्री को प्रकाश मे लाने तथा व्यवस्थित रूप से छानबीन करने का काम बहुत सराहनीय हे ।

किन्तु वह रूसी भाषा मे लिपिबद्ध होने से हमारे लिये बहुत उपयोगी नही हुआ । नवीन चीन ओर सोवियत -  रूस आज सारी शक-हूण भूमी का स्वामी है । वहा इतिहास के अनुसंधान मे जितनी दिलचस्पी दिखाई जाती है  , उससे आशा हे कि उनके बारे मे पुरातत्व  - सामग्री तथा लिखित सामग्री से बहुत सी बाते मालूम होगी  । त्यानशान ( किरगिजिया ) मे नरीन की खुदाई मे हूणो के विशेष तरह के बाण के फल तथा मट्टी के गोल कटोरे ओर दूसरी चीजे भी मिली हे ।

इस्सि कुल सरोवर के किनारे त्यूप स्थान मे भी इस काल की कुछ चीजे मिली है  । जो कि मास्को के राजकीय ऐतिहासिक म्यूजियम मे रखी हुई है ।

कजाक गणराज्य के बैरकारिन स्थान मे निकली कब्र मे भी कुछ चीजे मिली है । वही कराचोको ( ईलीपत्यका ) मे खुदाई करने पर शक - हूणो के पीतल के बाण मिले । जो मिन सुन ओर उनके उत्तराधिकारीयो से सबंध रखने वाले हे । हूणो के पीतल के हथियार पूर्वी यूरोप  ( चेरतोम लिक ) से बेकाल ओर मन्चूरिया की सीमा तक है इनकी गोचर भूमि समय  - समय पर बहुत दूर तक फैली हुयी थी ।
********
डाक्टर बेर्नश्ताम - सप्तनद , अल्ताई ओर त्यानशान के प्राचीन इतिहास ओर पुरातत्व के बडे विद्वान --- का कहना हे कि ईसापूर्व  6  ठी  शताब्दी मे इस सारे इलाके मे घूमन्तु हूण- जनो का निवास था । यह भी पता लगा हे कि हूणो ने कुछ काम खेती का भी सीखा था  , तब भी वह प्रधानतया पशुपालक ही थे ।
************

चीन मे भी अपने इतिहास को बहुत अधिक प्राचीन दिखलाने का आग्रह रहा हे  , किन्तु चीन का यथार्थ इतिहास ईसापूर्व  6 ठी शताब्दी से शुरू होता हे  । उसके पहले की सारी बाते पोराणिक जनश्रुतियो से अधिक महत्व नही रखती हे ।

चीन का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश चिन  ( 255 - 206  ईसापूर्व ) है । इस वंश के सस्थापक चिन-शी-हाग्ड-ती ( 255 - 250  ईसापूर्व ) ने बहुत सी छोटी  - छोटी  सामन्तियो मे बटे हुयै चीन को एक राज्य मे संगठित किया । इससे पहले उतर के घूमन्तू हूण चीन को अपने लूटपाट का क्षेत्र बनाये हुये थे ।

यह अश्वारोही  , मांसभक्षी कूमिशपायी - खतरनाक लडाके बराबर अपने पडोस के चीनी गावो ओर नगरो पर धावा-आक्रमण किया करते थे। उनकी संपत्ति घोडा  , ढोर  ओर भेड थी कभी कभी ऊंट  , गदहे  , खच्चर भी इनके पास देखे जाते थे  ।

वर्तमान मगोलिया  , मंचूरिया तथा इनके उतर के साईबेरिया के भू- भाग  इनकी चरागाह भूमी थी ।

हूण कबीलो को चीनी मे

 " हाण्ड-नू "

कहते थे । तुर्क  , किरगिज , मगयार ( हूंगर )  आदि इनके ही उतराधिकारी हुए । हाण्ड- नू ( हूण ) के अतिरिक्त चीनी इतिहास एक ओर घूमन्तु मगोलायित जन का पता देता हे ,
जिसको  " तुड- हू " कहते थे ।

इन्ही के उतराधिकारी पीछे कित्तन  ( खिताई ) , मन्चू आदि हुऐ  । विशाल हूणो के बहुत छोटे - छोटे  उप - जन ( कबीले ) थे जिनके अपने अपने  सरदार हुआ करते थे । हमारे यहा तथा दूसरे  देशो मे भी " ओर्दू  ( उर्दु ) शब्द सेना का पर्याय माना जाता हे । इन घुमन्तू ओ मे एक पूरे जन - जिसमे उसके सभी नर  - नारी , बाल वृद्ध सम्मिलित थे  - को  ओर्दू  कहा जाता था ।

 इनका शासन जनतान्त्रिक था  , सरदारों को जनके ऊपर अपना स्वतंत्र दर्जा कायम करने का अधिकार नही था । हूणो के  बच्चे बचपन से ही पशुओ को चराना सीखते थे,  वहा उससे  भी पहिले अपनी छोटी सी धनुष - बाण से  सियार ओर खरगोश  का शिकार करते  थे  ।

नंगी पीठ  पर  घुडसवारी करना भी बचपन ही से इन्हे सिखाया जाता था ओर अधिक क्षमता प्राप्त करने पर वह घोडे पर बेठे - बेठे  ही धनुष चलाने लगते थे । दूध व मांस का भोजन तथा चमडे की पोशाक इन्हे अपने पशुओ के ऊपर निर्भर करती थी । ऊन के नम्दे भी ये बना लेते थे ।  दया - माया  की इनके यहा कम ही गुंजाइश थी  इनके हथियार धनुष - बाण,  तलवार ओर छुर्रे होते थे ।

 साल मे तीन बार इनकी जन- सभा होती थी  , जबकि सारा ओर्दू ( कबीला ) एकत्रित होकर धार्मिक और सामाजिक कृत्यों को पूरा करता  , वहा साथ ही राजनीतिक ओर दूसरे झगडे भी मिटाता ।

बहुत से सरदारों के ऊपर निर्वाचित राजा को " शान्य" कहा जाता था ।

 1400 - 200 ईसापूर्व  तक चीन मे इन घूमन्तूओ की लूटपाट बराबर होती रहती थी ।
ईसापूर्व तीसरी शताब्दी मे  सान-'शी , शेन- शी , ची- ही मे  इनके  ओर्दू विचरा करते थे । इसी समय हाण्ड - हो नदी के मुडाव पर भी इनका ओर्दू रहा करता था  , जिसके कारण आज भी उस प्रदेश को " ओर्दू स" कहते हे ।

 चिन - शी  - हाण्ड- ती ( 255-206  ईसापूर्व ) ने  चीन के बडे  भू - भाग  को एक राज्य मे परिणत कर सोचा  , कि इन हूणो  की  लूटमार  सै  केसे चीन की रक्षा की जाये  ।
इसके लिये उसने

"चीन की महान दीवार "

के कितने ही भाग को एक रक्षा प्राकार के तोर पर निर्मित करवाया ओर ओर्दू तथा तथा शान - सी आदि प्रदेशो मे से हूणो के डर से काम जल्दी - जल्दी करवाया । समुन्द्र तट से पश्चिम मे लनचाउ तक इस दिवार
 को बनाने मे 5  लाख  आदमी मर -  मर कर वर्षो तक कोडो के नीचे काम करते रहै  ।

निर्माण काल से लेकर हजार वर्षो तक हूणो ओर चीन की सेना का खूनी संघर्ष होता रहा  , उसके परिणाम स्वरूप लाखो खोपडीयां दीवार के सहारे जमा होती गई  ।

 चीन की यह दिवार हूणो के ईसी आक्रमणो से बचने के लिये चीनी राजवंशो के दवारा बनवाई गई ।

सन्दर्भ :--
1 . A Thousand Years of  Tatars : E.  H . Parker, Shanghai - 1895
2. हुन्नू इ गुन्नी : क. इनस्त्रान्त्सेफ,  लेनिनग्राद - 1926 
3. Histoire des Huns : Desqugue - Paris : 1756
4. Excavation in Northan Mangolia - C.  Trever - Leiningrad 
5. The Story of Chang Kien :  Journal of American Oriental Society Sept -"1917 Page - 77
6.  Histoire d' Attila et de ses successures : Am. Thierry - Paris : 1856
7. History of the  Hing - nu in their Relations with China - Wylie : Journal of Anthropological institute - London,  volume III  - 1892 -93
8. Sur I'origine des Hiung - nu :- Shiratori -- Journal Asiatigus : CC -  II no. I,  1923
9. ओचेर्क इस्तोरिइ सेमिरेचय :-- वरतोल्द - 1868